1995 में IPCC ने पहली बार कहा था कि इंसानी गतिविधियों का जलवायु पर 'पहचाने जाने लायक असर' है। 30 साल बाद, 12 अक्टूबर 2026 को छपी एक बड़ी वैज्ञानिक समीक्षा कहती है कि अब यह सबूत 'निर्विवाद' हो चुका है, भले ही अमेरिका की एक सरकारी रिपोर्ट ने हाल में इस पर सवाल उठाने की कोशिश की हो।

क्या हुआ: नई समीक्षा में है क्या?

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया (UEA) के प्रोफेसर बेंजामिन सैंटर और उनके साथियों, MIT, कोलोराडो स्टेट और एडिनबरा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने मिलकर यह समीक्षा 'Earth's Future' जर्नल में प्रकाशित की। इसमें 2009 के बाद से जलवायु विज्ञान में हुई तरक्की का ब्यौरा दिया गया है।

सैंटर के मुताबिक, 2009 की 'एंडेंजरमेंट फाइंडिंग' (वह कानूनी फैसला जिसमें अमेरिकी पर्यावरण एजेंसी EPA ने माना था कि ग्रीनहाउस गैसें जन-स्वास्थ्य के लिए खतरा हैं) के बाद से छपा विज्ञान अब पहले से भी ज़्यादा मज़बूत है, सबूत अब 'निर्विवाद' हैं।

समीक्षा में बताया गया है कि वैज्ञानिकों ने अब यह भी जांचा है कि क्या ज्वालामुखी विस्फोट या सूरज की ऊर्जा में उतार-चढ़ाव जैसे प्राकृतिक कारण इंसानी असर को गलत तरीके से दिखा सकते हैं। बार-बार जांचने के बाद भी इंसानी फिंगरप्रिंट का सबूत कमज़ोर नहीं पड़ा, बल्कि और पुख्ता हुआ है।

'क्लाइमेट फिंगरप्रिंट' का मतलब क्या है?

फिंगरप्रिंटिंग एक ऐसी तकनीक है जो जलवायु में आए बदलावों के पैटर्न और समय को देखकर यह तय करती है कि वह बदलाव इंसानी गतिविधियों से आया या प्राकृतिक कारणों से। सिर्फ तापमान बढ़ने भर से यह तय नहीं होता, असली सबूत यह देखने में है कि गर्माहट किस ऊंचाई पर, किस मौसम में और किस पैटर्न में बढ़ी या घटी।

पिछले सालों में यह तकनीक इतनी आगे बढ़ गई है कि अब इंसानी असर पूरे जलवायु तंत्र में पहचाना जा सकता है, सिर्फ औसत तापमान में नहीं। CO₂ बढ़ने के बावजूद भारत में गर्मी घटने जैसी उलझी पहेलियां भी इसी बारीक पैटर्न-आधारित विज्ञान से सुलझाई जाती हैं, सिर्फ कुल तापमान देखकर नहीं।

1995 से अब तक: सबूत कैसे मज़बूत हुआ?

सालघटनास्थिति
1995IPCC की दूसरी असेसमेंट रिपोर्टपहली बार 'पहचाने जाने लायक इंसानी असर' की बात कही गई
2009EPA की एंडेंजरमेंट फाइंडिंगग्रीनहाउस गैसों को जन-स्वास्थ्य के लिए खतरा कानूनी तौर पर माना गया
2026सैंटर एट अल. की समीक्षासबूत अब पूरे जलवायु तंत्र में, 'निर्विवाद' स्तर तक पहुंचा

यानी हर दशक के साथ सबूत सिर्फ ज़्यादा नहीं हुआ, बल्कि उसकी बारीकी भी बढ़ी, अब मौसम की किसी एक घटना में भी इंसानी असर ढूंढने (attribution) की कोशिश की जाती है, जो 1995 में मुमकिन नहीं था।

यह समीक्षा ज़रूरी क्यों हो गई: DOE रिपोर्ट का विवाद

जुलाई 2025 में अमेरिका के ऊर्जा विभाग (DOE) ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें दावा किया गया कि 2000 के बाद से समताप मंडल (stratosphere) उतनी ठंडी नहीं हुई जितनी मॉडल बताते हैं, और इसलिए 'इंसानी फिंगरप्रिंट' जैसी कोई चीज़ मौजूद ही नहीं।

सैंटर और साथियों ने अगस्त 2026 में एक अलग पेपर में दिखाया कि DOE का यह दावा फरवरी 2026 के एक अप्रकाशित प्रेजेंटेशन की एक तस्वीर पर आधारित था, जिसे गलत तरीके से पेश किया गया। उनका कहना है कि यह रिपोर्ट मूल्यांकन विज्ञान के सामान्य नियमों का पालन किए बिना बनाई गई।

यह हमारा हिसाब है, कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं: जुलाई 2025 से अक्टूबर 2026 तक, यानी करीब 15 महीने से यह विवादित रिपोर्ट बिना वापस लिए, अब भी नीति बनाने में संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल हो रही है, भले ही कई वैज्ञानिक समीक्षाओं में इसकी गलतियां गिनाई जा चुकी हों।

भारत के लिए इसका मतलब क्या है?

भारत सीधे अमेरिकी EPA के नियमों के दायरे में नहीं आता, पर यह विवाद दिखाता है कि जलवायु विज्ञान पर अंतरराष्ट्रीय सहमति कितनी नाज़ुक बहस का विषय बन सकती है। भारत के मानसून और मौसम पर गर्म होती दुनिया का असर समझने के लिए भी वैज्ञानिक इसी तरह के फिंगरप्रिंट और एट्रिब्यूशन तरीकों पर निर्भर रहते हैं।

अगर दुनिया के सबसे बड़े उत्सर्जकों में से एक देश में जलवायु विज्ञान की बुनियाद पर ही सवाल उठते रहें, तो इसका असर COP जैसी वैश्विक जलवायु वार्ताओं पर भी पड़ सकता है, जहां भारत जैसे देशों की जलवायु प्रतिबद्धताएं भी तय होती हैं।

भारत जैसे देश, जो खुद भी बाढ़, लू और मानसून में बदलाव जैसी चरम मौसमी घटनाओं से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह भी अहम है कि किसी एक घटना को जलवायु परिवर्तन से कितना और कितनी तेज़ी से जोड़ा जा सकता है, इसी फिंगरप्रिंटिंग साइंस की मदद से समझा जाता है।

अभी बहस किस पर टिकी है?

DOE रिपोर्ट अब तक वापस नहीं ली गई है, भले ही कई वैज्ञानिकों ने इसमें गंभीर खामियां गिनाई हों। यह साफ नहीं कि आगे इसे नीति-निर्माण में औपचारिक रूप से इस्तेमाल किया जाता रहेगा या नहीं।

यह भी साफ नहीं कि इस वैज्ञानिक बहस का असर 2009 की एंडेंजरमेंट फाइंडिंग की कानूनी स्थिति पर आखिर में किस तरह पड़ेगा, यह फैसला विज्ञान से ज़्यादा राजनीति और अदालतों पर निर्भर करेगा।

सैंटर खुद मानते हैं कि उनकी टीम के मॉडल भी हर जगह पूरी तरह सटीक नहीं हैं, पर उनका कहना है कि बुनियादी निष्कर्ष, यानी इंसानी गतिविधियों का जलवायु पर स्पष्ट असर, 50 साल से ज़्यादा समय से मॉडलों द्वारा बताया जा रहा है और अब सैटेलाइट डेटा में भी साफ दिखता है।

आगे क्या देखें?

अमेरिका में एंडेंजरमेंट फाइंडिंग को लेकर आगे जो भी नीतिगत या कानूनी कदम उठाए जाएंगे, उन पर इस समीक्षा का हवाला ज़रूर आएगा। साथ ही, यह देखना दिलचस्प होगा कि नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ जैसी संस्थाएं इस विवाद पर आगे क्या रुख अपनाती हैं।

इसी तरह के क्लाइमेट लायबिलिटी मुकदमे अमेरिका की अदालतों में भी चल रहे हैं, जहां जलवायु विज्ञान की विश्वसनीयता सीधे कानूनी फैसलों से जुड़ जाती है। ऐसे में फिंगरप्रिंट जैसे ठोस वैज्ञानिक सबूत आने वाले समय में अदालती बहसों में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।

विज्ञान का सबूत 30 साल में सिर्फ मज़बूत नहीं हुआ, बल्कि बार-बार राजनीतिक चुनौतियों से होकर भी गुज़रा है। यह समीक्षा उसी लंबी लड़ाई की एक और कड़ी है, आखिरी नहीं।

स्रोत: Earth's Future (UEA), Phys.org, EurekAlert, Earth.com