13 अक्टूबर 2026 की सुबह 6:33 बजे (EDT), यानी भारतीय समय में शाम 4:03 बजे, Falcon 9 से उड़ा Dragon अपनी ट्रंक में दो लिपटे हुए रोल-आउट सोलर ऐरे (Roll-Out Solar Array, ROSA) लेकर ISS की ओर रवाना हुआ। ये ऐसे सोलर पैनल हैं जो नापने वाले टेप की तरह लपेटकर रखे जाते हैं और कक्षा में खुलकर बिजली बनाते हैं। Spaceflight Now के अनुसार यह स्टेशन के लिए ऐसे पैनलों की चौथी और आख़िरी जोड़ी है।

इस उड़ान की कई खबरें कार्गो और experiments पर रुक जाती हैं। यहां हम पैनल को कदम-दर-कदम देखेंगे: वह लिपटता कैसे है, स्टेशन तक कैसे पहुंचता है और खुलकर बिजली कैसे देता है। फिर देखेंगे कि भारत के अपने स्टेशन की योजना के लिए इसमें क्या सबक है।

टेप से शुरू करें: पैनल को लपेटा क्यों जाता है

नापने वाला टेप याद करें। खुला हो तो लंबा और जेब में बेकार, पर लपेटने पर छोटा डिब्बा बन जाता है, और खींचते ही सीधा खड़ा हो जाता है। ROSA इसी सोच पर चलता है: पतले पैनल को लपेटकर रॉकेट में कम जगह में रखा जाता है।

NASA के अनुसार ROSA अपने आप खुलता है, क्योंकि इसकी composite booms (मिश्रित पदार्थ की छड़ों) में स्प्रिंग जैसी ऊर्जा जमा रहती है। NASA यह भी बताता है कि पारंपरिक पैनल सख़्त, बड़े, भारी और चलाने में जटिल होते हैं, जबकि यह डिज़ाइन उस बोझ को घटाता है।

Spaceflight Now में NASA के ऑपरेशंस इंटीग्रेशन मैनेजर गौरंग पटेल ने बताया कि इस तकनीक का पहला अंतरिक्ष प्रदर्शन 2017 में CRS-11 मिशन पर हुआ था। यानी आज की उड़ान नौ साल पुराने प्रयोग का आख़िरी अध्याय है।

कदम 1 और 2: ट्रंक में सफर, फिर स्टेशन पर पहुंचना

पहला कदम लॉन्च है। NASASpaceFlight के अनुसार Dragon के दबाव-रहित ट्रंक में 1,195 kg सामान था, और यही हिस्सा आख़िरी iROSA जोड़ी का घर बना। इसके अलावा कैप्सूल के अंदर 2,867 kg कार्गो है, जिसमें 593 kg के science experiments भी हैं। Spaceflight Now के अनुसार कुल मिलाकर 40 से ज़्यादा वैज्ञानिक अध्ययन इस उड़ान पर हैं।

Falcon 9 का पहला चरण (booster B1096) आठवीं उड़ान पूरी कर 7.5 मिनट से कम में Landing Zone 40 पर लौट आया, यानी रॉकेट का हिस्सा दोबारा इस्तेमाल के लिए बच गया।

दूसरा कदम सफर और डॉकिंग है। Dragon को स्टेशन तक पहुंचने में करीब 52 घंटे लगते हैं, और NASASpaceFlight के अनुसार डॉकिंग 15 अक्टूबर को 15:00 UTC (भारतीय समय रात 8:30 बजे) के लिए तय है। तुलना के लिए, क्रू वाला यान इसी स्टेशन तक करीब 8 घंटे में पहुंचा था; इसकी कहानी Crew-13 का रिकॉर्ड डॉकिंग समय में है।

पैनल स्टेशन पर लगाने की तैयारी पहले से हो चुकी है। Spaceflight Now के अनुसार NASA ने इसके लिए कई स्पेसवॉक किए। पटेल के शब्दों में पुराने पैनलों में मानक अपग्रेड की सुविधा नहीं थी, इसलिए नॉन-स्टैंडर्ड इंटरफ़ेस पर modification kits लगानी पड़ीं।

कदम 3: खुलना, बिजली बनाना और आंकड़े

आख़िरी पैनल NASASpaceFlight के अनुसार स्टारबोर्ड तरफ S6 truss के चैनल 3B और पोर्ट तरफ P4 truss के चैनल 2A पर लगेंगे। 2021 की पहली जोड़ी के समय NASA ने रोबोटिक आर्म Canadarm2 से पैनल को कैरियर से निकालकर स्पेसवॉकर तक पहुंचाया था।

खुलने के बाद पैनल पुराने ऐरे को हटाता नहीं, उनके सामने फैलता है (NASA)। आंकड़े एक नज़र में:

क्याआंकड़ास्रोत
स्टेशन पर पहले से लगे iROSA6NASASpaceFlight
इस उड़ान में आए2 (चौथी और आख़िरी जोड़ी)Spaceflight Now
हर पैनल की बिजली20 से 28 kWNASASpaceFlight
आख़िरी जोड़ी से स्टेशन की अतिरिक्त बिजली20 से 30%NASASpaceFlight
हर पैनल का अनुमानित जीवन10 साल से ज़्यादाSpaceflight Now

इन पैनलों की ज़रूरत इसलिए पड़ी कि स्टेशन के मूल सोलर ऐरे उम्र के साथ कमज़ोर हो चुके हैं, NASASpaceFlight के अनुसार।

भारत के लिए मतलब: अपने स्टेशन की बिजली का सवाल

ISRO की भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की योजना में बिजली सबसे पहली ज़रूरत होगी। ISS का अनुभव दिखाता है कि मूल पैनल कमज़ोर पड़ें तो अपग्रेड का रास्ता डिज़ाइन में पहले से चाहिए, वरना नॉन-स्टैंडर्ड इंटरफ़ेस पर किट लगाने जैसी मशक्कत करनी पड़ती है।

हमारा आकलन: इन दो पैनल की कुल रेटिंग 2 × (20 से 28 kW), यानी 40 से 56 kW बैठती है। यह 1 kW वाले 40 से 56 रूफटॉप सिस्टम के बराबर है, हालांकि कक्षा में रात का हिस्सा आने से 24 घंटे का औसत इससे कम रहेगा।

लपेटने वाली बनावट कम जगह में ज़्यादा बिजली रखती है, इसलिए भारतीय स्टेशन के लिए यह एक विकल्प हो सकती है, पर यह सिर्फ़ संभावना है, किसी घोषित योजना का हिस्सा नहीं।

जो अभी पता नहीं: तारीख़ें और असली उत्पादन

स्पेसवॉक की तारीख़ें अभी सामने नहीं आई हैं। Tech Times के अनुसार नई पैनलों को ट्रस पर लगाने के लिए आगे स्पेसवॉक करने होंगे।

आंकड़े भी स्रोतों में थोड़े अलग हैं: Spaceflight Now 20 kW से ज़्यादा बताता है, NASASpaceFlight 20 से 28 kW, और NASA के एक पेज में पहली जोड़ी के लिए शुरुआती जीवन में 28 kW से अधिक का ज़िक्र है। असली उत्पादन कक्षा में लगने के बाद ही नापा जा सकेगा।

आख़िरी सवाल उम्र का है। NASASpaceFlight के अनुसार ये पैनल स्टेशन के आख़िरी सालों और रिटायरमेंट तक बिजली का मार्जिन बनाए रखने के लिए हैं, यानी इनकी उपयोगिता ISS के बचे जीवन पर टिकी है।

आगे क्या देखें: डॉकिंग, स्पेसवॉक और वापसी

  • डॉकिंग: 15 अक्टूबर, 15:00 UTC (रात 8:30 बजे IST), Harmony मॉड्यूल के zenith पोर्ट पर।
  • स्पेसवॉक: पैनल निकालकर लगाने की तारीख़ों की घोषणा।
  • वापसी: Dragon करीब एक महीना डॉक रहेगा और फिर कैलिफ़ोर्निया के तट के पास उतरेगा (NASASpaceFlight)।

इन तीनों में डॉकिंग सबसे पास की घटना है, पर असली कसौटी स्पेसवॉक है, क्योंकि पैनल तभी खुलेंगे। तारीख़ें खिसकीं तो स्टेशन का बिजली-मार्जिन उतने समय पुराने पैनलों पर ही टिका रहेगा।

Spaceflight Now के अनुसार ROSA का एक संस्करण 2028 में NASA के SR-1 Freedom को बिजली देने में भी इस्तेमाल होगा।

टेप की तरह लिपटे पैनल, अब स्टेशन के हवाले

फिलहाल पैनल Dragon की ट्रंक में हैं और खुलने से पहले स्पेसवॉक का रास्ता बाकी है। ISS के आख़िरी बिजली-अपग्रेड का दारोमदार इसी पर है कि ये लिपटी पट्टियां कक्षा में ठीक से खुल जाएं।

स्रोत: NASA, Spaceflight Now, NASASpaceFlight, Tech Times