चांद पर आज कोई चुंबकीय क्षेत्र नहीं है, जैसे धरती के इर्द-गिर्द है। तो क्या चांद पर कभी चुंबकीय क्षेत्र हुआ ही नहीं था? यह सवाल अक्सर पूछा जाता है, और चीन के Chang'e-6 मिशन से लाए गए सैंपल ने अब इसका एक नया सुराग दिया है।
जवाब है: हां, अरबों साल पहले चांद का अपना चुंबकीय क्षेत्र था, जो बाद में बुझ गया। वैज्ञानिक अब भी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि वह कैसा था, और उसकी जानकारी कहां दबी है।
Chang'e-6 के सैंपल में क्या मिला
Hefei Institutes of Physical Science के शोधकर्ताओं ने Chang'e-6 मिशन से लाई गई मिट्टी में मौजूद शीशे जैसे कणों (impact glass) के अंदर लोहे की जांच की। PNAS journal में प्रकाशित स्टडी के अनुसार सिर्फ तीन लोहे वाले कणों में टीम को γ-Fe (गामा-आयरन) नाम का एक दुर्लभ रूप मिला, जो किसी प्राकृतिक चांद के सैंपल में पहली बार देखा गया है।
यह पहचान करने के लिए टीम ने focused ion beam तकनीक से बेहद पतली परत काटी, फिर transmission electron microscopy और रासायनिक जांच से हर कण की बनावट परखी। इसी बारीक जांच से पता चला कि इन दो impact-glass सैंपल में γ-Fe असल में सबसे ज़्यादा मात्रा वाला लोहा निकला।
The Brighter Side of News के अनुसार सामान्य तौर पर γ-Fe सिर्फ बहुत ज़्यादा गर्मी में टिकता है; ठंडा होने पर यह आम तौर पर दूसरे रूप, α-Fe, में बदल जाता है। इसे ठंडी चांद की सतह पर इस रूप में पाना वैज्ञानिकों के लिए बड़ी हैरानी की बात थी।
यह खोज अहम क्यों है: चांद की 'चुंबकीय डायरी'
ScienceDaily के अनुसार बड़े γ-Fe कणों के अंदर एक स्थिर चुंबकीय 'वर्टेक्स' (vortex) बना मिला, जो बाहर से चुंबकीय क्षेत्र आने पर भी स्थिर बना रहा। इसका मतलब है कि यह लोहा अपने आसपास के चुंबकीय हालात की जानकारी लंबे समय तक दर्ज रख सकता है, कुछ वैसा ही जैसे कोई पुरानी डायरी किसी खास पल को कैद कर लेती है।
इससे पहले चांद पर ज़्यादातर मिला लोहा α-Fe रूप में था, जो कमरे के तापमान पर भी स्थिर रहता है। γ-Fe और α-Fe अलग-अलग हालात में बनते हैं, इसलिए दोनों मिलकर चांद के टकराव और गर्मी के इतिहास की अलग-अलग परतों की कहानी बता सकते हैं।
धरती पर आज भी चुंबकीय क्षेत्र बना रहता है, इसकी वजह और बनावट पर हमारी पुरानी स्टोरी में बात हो चुकी है। चांद का अपना चुंबकीय क्षेत्र अरबों साल पहले खत्म हो गया, पर γ-Fe जैसे खनिज उस पुराने दौर की जानकारी आज तक छिपाए हुए हो सकते हैं।
भारत का कनेक्शन: Chandrayaan-3 भी उसी दक्षिणी ध्रुव इलाके में उतरा था
यह सैंपल चांद के South Pole-Aitken Basin से लाए गए थे, जो चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास का एक बहुत बड़ा प्रभाव-क्षेत्र (impact basin) है। भारत का Chandrayaan-3 मिशन अगस्त 2023 में इसी दक्षिणी ध्रुव के पास, Shiv Shakti Point पर उतरा था।
Chandrayaan-3 के अपने उपकरण RAMBHA-LP ने भी चांद की सतह से जुड़ी एक अहम खोज की थी, जिसकी बात हमारी RAMBHA-LP वाली स्टोरी में हो चुकी है। दक्षिणी ध्रुव का यह इलाका अब दुनिया भर के लिए रिसर्च का केंद्र बन गया है, जिसमें भारत की भूमिका पर हमारी एक और स्टोरी भी है।
Chandrayaan-4: भारत खुद चांद की मिट्टी लाने की तैयारी में
सितंबर 2024 में भारत सरकार ने Chandrayaan-4 मिशन को ₹2,104 करोड़ के बजट के साथ मंज़ूरी दी थी। यह ISRO का पहला ऐसा मिशन होगा, जो चांद से मिट्टी और पत्थर के नमूने लाकर सीधे भारत की धरती पर उतारेगा।
इस मिशन में दो LVM-3 रॉकेट से पांच अलग-अलग मॉड्यूल भेजे जाएंगे, और लैंडिंग उसी Shiv Shakti Point के आसपास होने की योजना है, जहां Chandrayaan-3 उतरा था। अगर यह सफल रहा, तो भारत अमेरिका, पूर्व सोवियत संघ और चीन के बाद चांद से नमूने लाने वाला चौथा देश बन जाएगा।
इसमें Descender Module, Ascender Module, Transfer Module, Propulsion Module और Re-entry Module मिलकर काम करेंगे, और नमूनों से भरा कैप्सूल आखिर में भारत की ज़मीन पर उतरेगा। इसरो के अनुसार यह मिशन चांद की कक्षा में रेंडेवू और डॉकिंग जैसी तकनीकों का भी बड़ा टेस्ट होगा, जो आगे इंसानों को चांद पर भेजने के लिए ज़रूरी हैं।
अगर भारत को भी ऐसा कण मिले तो क्या होगा
हमें लगता है कि Chandrayaan-4 अगर उसी दक्षिणी ध्रुव इलाके से नमूने लाता है, तो भारतीय वैज्ञानिकों को भी γ-Fe जैसे दुर्लभ खनिज जांचने का मौका मिल सकता है, क्योंकि दोनों मिशनों की लैंडिंग जगह एक ही बड़े क्षेत्र में है। यह सिर्फ एक संभावना है, कोई पुष्टि नहीं, क्योंकि चांद की सतह पर एक ही इलाके में भी मिट्टी की बनावट जगह-जगह बदल सकती है।
अभी तक भारत के पास अपने लाए हुए चांद के नमूने जांचने का मौका नहीं रहा है; Chandrayaan-3 ने सिर्फ सतह पर मौजूद रहकर डेटा भेजा था, नमूना वापस नहीं लाया। Chandrayaan-4 सफल होने पर यह पहली बार बदलेगा, और भारतीय प्रयोगशालाओं को भी सीधे चांद की मिट्टी पर अपने उपकरण आज़माने का मौका मिलेगा।
अभी क्या पता नहीं, आगे क्या देखा जाएगा
- γ-Fe किस तापमान तक अपनी चुंबकीय जानकारी ठीक से बचा पाता है, यह अभी ठीक से मापा नहीं गया है।
- यह सिर्फ तीन कणों में मिला है; चांद की बाकी मिट्टी में यह कितना आम या दुर्लभ है, अभी साफ नहीं है।
- Chandrayaan-4 का लॉन्च अभी तय नहीं हुआ है; मौजूदा अनुमान 2027-28 के आसपास के हैं।
टीम आगे और सैंपल जांचना चाहती है, ताकि यह समझा जा सके कि γ-Fe चांद के किस दौर की, किस तरह की घटना की जानकारी बचाए रखता है। यह भी देखा जाना बाकी है कि क्या यह खनिज चांद के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग मात्रा में मिलता है, या यह सिर्फ South Pole-Aitken Basin जैसी खास जगहों की बात है।
चांद का अपना चुंबकीय क्षेत्र भले ही अरबों साल पहले बुझ गया हो, पर उसकी मिट्टी में दबे ऐसे छोटे-छोटे सुराग अब भी उस पुरानी कहानी के पन्ने खोल सकते हैं। भारत के लिए असली दिलचस्पी तब शुरू होगी, जब वह खुद अपने हाथों से ऐसी मिट्टी वापस ला पाएगा।
स्रोत: PNAS, ScienceDaily, The Brighter Side of News, ISRO