ISRO ने 16 अक्टूबर 2026 को Gaganyaan के Crew Module (CM) और Service Module (SM) को अलग करने वाले सेपरेशन टेस्ट पूरे होने की घोषणा की। यह वही पल है जिसके बाद कैप्सूल पृथ्वी के वायुमंडल में लौटना शुरू करता है, और इससे G1 की तारीख तय नहीं होती। पहले ISRO ने कैप्सूल को आपात स्थिति में निकालने (TV-D1, 21 अक्टूबर 2023) और पैराशूट से उतारने (10 अप्रैल 2026) के परीक्षण दिखाए थे; अब बारी अलग होने के पल की है।
इस खबर की कई रिपोर्टें ISRO की प्रेस-विज्ञप्ति दोहराकर रुक जाती हैं। यहां हम सवाल-जवाब में समझेंगे कि यह टेस्ट असल में क्या परखता है, और यह भी अलग रखेंगे कि क्या हो चुका है और क्या सिर्फ़ लक्ष्य है।
Orbital Module क्या है, और अलग क्यों होता है?
ISRO के अनुसार Gaganyaan का Orbital Module दो हिस्सों से बना है: Crew Module, जहां अंतरिक्ष यात्री बैठेंगे, और Service Module। दोनों एक separation system से जुड़े रहते हैं, और बिजली व तरल पदार्थों की आपूर्ति umbilical connections (जोड़ने वाले तार-पाइप) से होती है।
उड़ान से पहले दोनों जुड़ते हैं और कक्षा वाले चरण तक एक ही इकाई की तरह काम करते हैं। पृथ्वी के वायुमंडल में लौटना शुरू करने से पहले CM, SM से अलग होता है। ISRO के मुताबिक यह कई क्रमबद्ध घटनाओं का सिलसिला है, जिसमें pyrotechnic devices (विस्फोटक आवेश वाले उपकरण) और जेटिसन तंत्र शामिल हैं।
रोज़ की मिसाल लें तो यह चलती ट्रेन का वह पल है जब डिब्बा इंजन से कटता है और उसके बिजली-पानी के पाइप भी ठीक से अलग होने चाहिए। क्रम में एक कड़ी चूकी तो आगे की पूरी वापसी पर असर पड़ सकता है।
ISRO ने असल में क्या टेस्ट किया?
ISRO के अनुसार तिरुवनंतपुरम के Vikram Sarabhai Space Centre (VSSC) में पूरे CM-SM ढांचे की नकल वाला test setup बनाया गया, जिसमें बहुत सारे instrument लगे थे।
टेस्ट में CM और SM के बीच कई umbilical connections कटने का दृश्य दोहराया गया। ISRO ने कहा कि इससे अलग करने वाली व्यवस्था के design की पर्याप्तता परखी गई।
यहां एक बात साफ रहे: यह ज़मीन पर किया गया सिम्युलेशन है, अंतरिक्ष की उड़ान नहीं। असली अलगाव G1 की कक्षीय उड़ान में ही होगा।
झटके में किन पुर्ज़ों की परीक्षा हुई?
अलग होते समय लगने वाले झटके से सब कुछ सही-सलामत रहना चाहिए। ISRO ने Crew Module के छह तरह के उप-तंत्र गिनाए, जिनकी मज़बूती और shock-survivability (झटका झेलने की क्षमता) दिखी:
- Avionics systems: कैप्सूल का इलेक्ट्रॉनिक दिमाग।
- Inertial Navigation Systems: दिशा और स्थिति बताने वाले सेंसर।
- Thermal Protection System: पीछे वाले (aft) और शंकु वाले (conical) heat shield का ताप-कवच।
- Deployable Umbilical Shield: umbilical वाले हिस्से की ढाल।
- Uprighting System के pyrotechnic devices: कैप्सूल को सीधा करने वाले तंत्र के आवेश।
- Thermal & Humidity Control System के pyrotechnic devices: तापमान और नमी नियंत्रण वाले तंत्र के आवेश।
ताप-कवच का नाम सूची में इसलिए ध्यान खींचता है कि लौटते समय कैप्सूल सबसे ज़्यादा गर्मी इसी के भरोसे झेलता है, और अलग होने के बाद भी उसका सही रहना ज़रूरी है।
क्या यह पहले के टेस्टों से अलग है?
हां, क्योंकि यह वापसी की श्रृंखला का पहला कदम परखता है। तीन टेस्ट साथ रखकर देखें:
| टेस्ट | तारीख | क्या परखा गया |
|---|---|---|
| TV-D1 | 21 अक्टूबर 2023 | उड़ान के दौरान Crew Escape System, यानी आपात निकास |
| Crew Module air drop test | 10 अप्रैल 2026 | कैप्सूल का पैराशूट से उतरना |
| CM-SM separation tests | 16 अक्टूबर 2026 को घोषित (VSSC) | वायुमंडल में लौटने से पहले Crew Module का अलग होना, ज़मीनी सिम्युलेशन |
पहले दो टेस्ट कैप्सूल को बचाने और उतारने पर थे। यह टेस्ट उस पल पर है जो पैराशूट वाले चरण से पहले आता है: कक्षा से वापसी की शुरुआत।
इसका भारत के लिए क्या मतलब है?
भारत के पहले मानव-अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए यह उस कड़ी का सबूत है जो बाहर से कम दिखती है, पर वापसी में सबसे ज़रूरी है। ISRO के अनुसार इन परीक्षणों से G1 के लिए आवश्यक भरोसा मिलता है। G1 की बाकी तैयारियों की तस्वीर क्रू मॉड्यूल की तैयारी वाले लेख में है।
हमारा आकलन: G1 की पहली योजना दिसंबर 2020 की थी (Wikipedia)। दिसंबर 2020 से अक्टूबर 2026 तक 70 महीने बीत चुके हैं, और ISRO के 2026 वाले लक्ष्य के हिसाब से साल खत्म होने में सिर्फ़ 74 दिन बचे हैं। इसलिए हर ज़मीनी टेस्ट का वज़न है, पर वह तारीख देने के लिए काफ़ी नहीं।
Gaganyaan को विदेशी ground tracking सहयोग भी मिलना है; उसका पहलू ISRO-ESA समझौते की कहानी में है।
अब भी क्या पता नहीं है?
सबसे पहले, तारीख। ISRO की विज्ञप्ति में G1 को सिर्फ़ 2026 में लॉन्च का लक्ष्य बताया गया है, कोई तारीख नहीं।
दूसरे, आंकड़े। विज्ञप्ति में टेस्ट की संख्या, झटके का माप या अलग होने में लगे समय जैसे नंबर नहीं हैं, इसलिए सफलता का मार्जिन बाहर से नहीं आंका जा सकता।
तीसरे, ज़मीन और कक्षा का फ़र्क। टेस्ट VSSC के सेटअप में हुआ है; असली कक्षा की स्थितियों में यही क्रम कितना साफ चलता है, यह G1 ही बताएगा।
आगे क्या देखें?
- G1 की तारीख: ISRO की आधिकारिक घोषणा।
- बाकी ज़मीनी टेस्ट: ISRO का अगला अपडेट, क्योंकि यह टेस्ट G1 की तैयारी की एक कड़ी है, आख़िरी नहीं।
- G1 की उड़ान में असली अलगाव: यही अंतिम सबूत होगा कि ज़मीन का नतीजा कक्षा में दोहराया गया।
अलग होने का पल, पहले ज़मीन पर
फिलहाल इतना तय है कि अलग होने वाला तंत्र ज़मीन पर अपना पहला इम्तिहान पार कर चुका है। उसकी असली परीक्षा तब होगी जब G1 का कैप्सूल कक्षा से लौटते समय अपने सर्विस मॉड्यूल को छोड़ेगा।
स्रोत: ISRO, ANI, Open Magazine, Wikipedia, Gulf News