जिस शव का चेहरा न बचा हो और DNA जांच के लिए तुलना का कोई नाम ही न हो, उसकी पहचान कहां से शुरू हो? IIT मंडी का SPOT-Face AI मॉडल खोपड़ी के X-ray से संभावित चेहरों की रैंकिंग बनाता है। भारतीय डेटासेट पर परीक्षण में सही चेहरा पहली ही रैंक पर करीब आधे मामलों में आया।

यह फैसला सुनाने वाली मशीन नहीं, जांच का दायरा छोटा करने वाला औजार है। नीचे खोपड़ी वाले परीक्षण की तुलना स्केच वाले परीक्षण से और AI की तुलना पारंपरिक तरीकों से की गई है, ताकि 50% का मतलब साफ दिखे।

सवाल असल में क्या है

Amar Ujala के अनुसार देश में हर साल करीब 50 हजार शवों की पहचान नहीं हो पाती। SPOT-Face शोधपत्र की भूमिका के अनुसार जब फिंगरप्रिंट और कोमल ऊतक जैसे आम सबूत नहीं बचते, तब एक और सवाल उठता है: DNA को किसके DNA से मिलाया जाए। खोपड़ी की पहचान इसी दायरे को छोटा करने में काम आती है।

SPOT-Face कैसे काम करता है

arXiv पर उपलब्ध शोधपत्र के अनुसार मॉडल हर तस्वीर को करीब 300 छोटे टुकड़ों (superpixel) में बांटता है। हर टुकड़ा एक बिंदु बनता है और पास के टुकड़े आपस में जुड़कर ग्राफ बनाते हैं। फिर ग्राफ न्यूरल नेटवर्क (GNN) इन ग्राफ की खासियतें निकालता है।

इसके बाद क्रॉस-अटेंशन और ऑप्टिमल ट्रांसपोर्ट खोपड़ी और चेहरे के हिस्सों को आपस में मिलाते हैं। एक रोजमर्रा की उपमा लें: दो अलग शैली में बने एक ही शहर के नक्शे, जिनमें चौराहे मिलाकर पता लगाया जाए कि दोनों एक ही शहर के हैं। आखिर में मॉडल चेहरों की सूची प्राथमिकता के क्रम में देता है।

दो परीक्षण, दो नतीजे: खोपड़ी बनाम स्केच

शोधकर्ताओं ने मॉडल को दो डेटासेट पर परखा। एक में भारतीय खोपड़ी के X-ray और चेहरे की तस्वीरें थीं, दूसरे में चीनी चेहरों के स्केच और तस्वीरें। नतीजे शोधपत्र की तालिकाओं से हैं।

पैमानाखोपड़ी से चेहरा (भारतीय डेटासेट)स्केच से चेहरा (चीनी डेटासेट)
डेटासेट का आकार51 व्यक्ति, कुल 102 जोड़ियां188 जोड़ियां
पहली रैंक पर सही चेहरा (R@1)50.0%88.4%
शीर्ष पांच में सही चेहरा (R@5)72.0%89.0%
mAP@565.4%88.9%

शोधपत्र के अनुसार खोपड़ी वाला काम कठिन है, क्योंकि खोपड़ी की तस्वीर में रंग और बनावट जैसे चेहरे के गुण होते ही नहीं। इसलिए खोपड़ी और चेहरे के बीच की खाई स्केच और चेहरे की खाई से बड़ी है। Dynamite News ने भी यही अंतर रिपोर्ट किया है।

एक और तुलना टीम की अपनी है। क्रॉस-अटेंशन और ऑप्टिमल ट्रांसपोर्ट दोनों हटाने पर खोपड़ी वाला R@1 सिर्फ 31.3% रहा, दोनों जोड़ने पर 50.0%। यानी 18.7 अंक की बढ़त, जो सापेक्ष रूप से करीब 60% सुधार है। यह गणना हमारी है।

पारंपरिक तरीका बनाम AI

पहलूक्ले पुनर्निर्माण / सुपरइम्पोजीशनSPOT-Face
तरीकाकलाकार खोपड़ी पर मिट्टी की परत चढ़ाते हैं, या खोपड़ी और चेहरे की तस्वीर एक-दूसरे पर रखी जाती हैंखोपड़ी और चेहरों की तस्वीरों का ग्राफ-आधारित मिलान
नतीजाएक अनुमानित चेहरा या ओवरलेसंभावित चेहरों की रैंकिंग
निर्भरताविशेषज्ञ का अनुभव और समयतस्वीरों का डेटासेट और मॉडल की ट्रेनिंग
सीमाशोधपत्र इन्हें अनुमानित विश्लेषण कहता हैपहली रैंक पर 50%, पुष्टि का विकल्प नहीं

PubMed Central की एक समीक्षा के अनुसार सुपरइम्पोजीशन को कई देशों की अदालतों ने कंकाल पहचान के लिए माना है, पर हाल में इसकी सटीकता और भरोसेमंदी पर सवाल भी उठे हैं। Dynamite News के अनुसार SPOT-Face अज्ञात शव की पहचान की पुष्टि करने वाला स्वतंत्र विकल्प नहीं है। उसके नतीजे दूसरे फॉरेंसिक सबूतों और विशेषज्ञ विश्लेषण के साथ ही पढ़े जाएंगे।

भारत के लिए मतलब

यह हमारा आकलन है कि इसकी असली कीमत शॉर्टलिस्ट में है। अगर लापता लोगों की तस्वीरों के बड़े भंडार से पांच संभावित नाम छांटे जा सकें, तो पुलिस की जांच और DNA मिलान दोनों कम खर्च में शुरू हो सकते हैं। पांच में सही चेहरे की दर इस डेटासेट में 72% रही।

ऐसे सार्वजनिक सेवा वाले AI प्रयोग भारत में और भी हो रहे हैं, जैसे IIT जोधपुर का ग्रामीण स्वास्थ्य AI। फर्क यह है कि फॉरेंसिक में गलत मिलान की कीमत किसी निर्दोष परिवार की उम्मीद या जांच की दिशा से चुकानी पड़ सकती है।

एक छोटा हिसाब समझने में मदद करेगा। मान लीजिए किसी जिले में 200 अज्ञात शवों की फाइलें हैं और लापता लोगों की 10,000 तस्वीरें। हर खोपड़ी के लिए 10,000 चेहरे देखना इंसान के बस का नहीं, पर रैंकिंग वाला औजार पहले 5 या 10 चेहरे सामने रख सकता है। तब मेहनत सही चेहरे को 50-72% संभावना के साथ पास लाने में लगेगी, पूरे ढेर को खंगालने में नहीं। यह उदाहरण हमने खुद बनाया है, असली आंकड़े नहीं।

जो अभी पता नहीं

परीक्षण का हिस्सा बहुत छोटा है। शोधपत्र ने डेटा को 70:20:10 में बांटा, यानी परीक्षण के लिए 102 जोड़ियों का करीब 10%, लगभग 10 जोड़ियां। इतने कम नमूनों पर 50% का आंकड़ा काफी हिल सकता है। Dynamite News ने भी लिखा कि परीक्षण का आकार सीमित था।

इसी टीम के पहले शोधपत्र (arXiv, 2025) के अनुसार X-ray स्वयंसेवकों के क्लिनिकल स्कैन थे, बरामद अज्ञात खोपड़ियां नहीं। उसमें 40 स्वयंसेवक दर्ज हैं, जबकि SPOT-Face में 51। टूटी, जली या सड़ी हुई खोपड़ियों पर नतीजे अभी नहीं हैं।

आगे क्या देखें

Dynamite News के अनुसार शोधकर्ता अब सटीकता बढ़ाने और बड़े डेटासेट पर परीक्षण में लगे हैं। तीन चीजें देखने लायक हैं: अलग-अलग आबादी और चेहरों की विविधता पर नतीजे, असली फॉरेंसिक सबूतों पर परीक्षण, और क्या कोई पुलिस या फॉरेंसिक प्रयोगशाला इसे सहायक औजार के रूप में आजमाती है।

फिलहाल यह एक शोध-प्रोटोटाइप है, जिसने मुश्किल समस्या पर ठोस शुरुआत की है। असली कसौटी तब होगी जब यह एक अनजान, क्षतिग्रस्त खोपड़ी के सामने खड़ा होगा।

SPOT-Face क्या है?

यह IIT मंडी के शोधकर्ताओं का AI मॉडल है, जो खोपड़ी के X-ray और चेहरे की तस्वीरों का मिलान कर संभावित चेहरों की रैंकिंग बनाता है। इसे पीएचडी शोधार्थी रवि शंकर प्रसाद और डॉ. दिनेश सिंह ने बनाया है।

क्या AI अब अज्ञात शव की पहचान कर देगा?

नहीं। Dynamite News के अनुसार यह पहचान की पुष्टि करने वाला स्वतंत्र विकल्प नहीं है। यह सिर्फ संभावित विकल्पों को प्राथमिकता देता है, और फैसला दूसरे सबूतों और विशेषज्ञों के साथ होगा।

50% सटीकता का मतलब क्या है?

पहली रैंक पर सही चेहरा आने की दर 50% रही, और शीर्ष पांच में 72%। यह परीक्षण के बहुत छोटे हिस्से पर मापा गया आंकड़ा है, असली मामलों की सफलता दर नहीं।

यह शोध कहां प्रकाशित हुआ है?

Amar Ujala के अनुसार शोधपत्र अंतरराष्ट्रीय पैटर्न रिकग्निशन सम्मेलन (ICPR) 2026 की कार्यवाही में छपा है। Dynamite News के अनुसार इसका प्रारंभिक संस्करण 14 जनवरी 2026 को arXiv पर आया था।

स्रोत: arXiv (SPOT-Face शोधपत्र), Dynamite News Hindi, Amar Ujala, PubMed Central