न्यूट्रिनो (neutrino) को Antarctica की बर्फ़ में दबे IceCube detector से पकड़ा जाता है, जिसमें 5,000 से ज़्यादा sensor लगे हैं। इसी काम पर Francis Halzen को 6 अक्टूबर 2026 को भौतिकी का Nobel मिला। आम धारणा है कि सबसे छोटे कण को पकड़ने के लिए सबसे महीन यंत्र चाहिए। यहाँ उल्टा हुआ: कण इतना शर्मीला है कि उसे पकड़ने के लिए एक घन किलोमीटर बर्फ़ लगानी पड़ी।

इस लेख में पूरी प्रक्रिया चार कदमों में खुलेगी, बर्फ़ के आकार का रोज़मर्रा के पैमाने से हिसाब होगा, और आखिर में देखेंगे कि भारत का अपना neutrino प्रोजेक्ट इस कहानी में कहाँ बैठता है।

बर्फ़ को detector बनाने का तरीका

Rochester विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के अनुसार Halzen सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी थे। Supernova 1987A से निकले कण देखकर उनका ध्यान neutrino खगोल-विज्ञान की तरफ गया। दिक्कत यह थी कि neutrino पदार्थ से लगभग टकराते ही नहीं। इसलिए detector बहुत विशाल और पारदर्शी माध्यम में चाहिए था।

शुरुआती प्रयोग में कम गहराई पर बर्फ़ के बुलबुले रोशनी बिखेर देते थे। Rochester की रिपोर्ट बताती है कि लगभग एक मील से नीचे बर्फ़ बेहद साफ़ मिली। फिर AMANDA नाम के प्रयोग ने विचार को सही साबित किया, और IceCube उसी का कहीं बड़ा रूप बना।

पहला कदम: गर्म पानी की ड्रिल से बर्फ़ में गहरे छेद किए जाते हैं और उनमें डोर (string) पर बंधे प्रकाश-संवेदी sensor उतारे जाते हैं। The Conversation के एक लेख के अनुसार छेद दोबारा जम जाते हैं और sensor बर्फ़ में जड़ हो जाते हैं। यानी बर्फ़ ही detector है और उसका ढाँचा भी।

पैमाने का हिसाब: एक घन किलोमीटर यानी 100 करोड़ घन मीटर। एक ओलंपिक तैराकी-तालाब करीब 2,500 घन मीटर का होता है, तो यह लगभग 4 लाख तालाबों के बराबर है। RICE IAS के अनुसार sensor 5,160 हैं। उन्हें बराबर फैला मानें तो हर sensor के हिस्से करीब 2 लाख घन मीटर बर्फ़ आती है।

एक टक्कर से नीली चमक तक

दूसरा कदम टक्कर है। ज़्यादातर neutrino बर्फ़ के आर-पार निकल जाते हैं। कभी-कभार कोई बर्फ़ के परमाणु के प्रोटॉन या न्यूट्रॉन से टकराता है। IceCube पर arXiv के समीक्षा-पत्र (preprint) के अनुसार गुज़रने वाले लगभग दस लाख में से करीब एक neutrino ऐसा करता है।

तीसरा कदम चमक है। टक्कर से आवेशित कण निकलते हैं, जो बर्फ़ में प्रकाश की गति से भी तेज़ दौड़ते हैं। तब हल्की नीली रोशनी बनती है, जिसे चेरेनकोव विकिरण (Cherenkov radiation) कहते हैं। Sensor इसी चमक को दर्ज करते हैं।

चौथा कदम दिशा खोजना है। मान लीजिए शांत तालाब में कंकड़ गिरा। अलग-अलग किनारों पर लहरें अलग समय पर पहुँचेंगी, और समय के फ़र्क से आप गिरने की जगह निकाल लेंगे। यहाँ लहरों की जगह रोशनी है। Rochester की रिपोर्ट के अनुसार चमक के पैटर्न और समय से neutrino की ऊर्जा और दिशा निकलती है। दिशा पता चलने से ही यह यंत्र दूरबीन बन जाता है।

करोड़ों कणों में से असली संदेशवाहक कैसे छँटे

मुश्किल यह है कि detector सिर्फ़ अंतरिक्ष वाले neutrino नहीं पकड़ता। Nobel Committee की आम जानकारी के अनुसार Antarctica के ऊपर के वायुमंडल से आए दस करोड़ से ज़्यादा कण हर दिन दर्ज होते हैं। असली खगोलीय घटनाएँ इसी शोर में छुपी हैं, इसलिए शोधकर्ता चुनिंदा घटनाएँ छाँटते हैं।

छँटाई के नतीजे चार पड़ावों में दिखते हैं:

सालक्या मिलास्रोत
2013सौर मंडल के बाहर से आए उच्च-ऊर्जा neutrinos का पहला मज़बूत प्रमाणThe Conversation
201722 सितंबर को करीब 290 TeV का एक neutrino, जिसकी दिशा सक्रिय blazar TXS 0506+056 से मेल खाईScience (IceCube Collaboration)
2022सक्रिय आकाशगंगा NGC 1068 की दिशा से करीब 80 neutrinosNobel Committee, arXiv समीक्षा
2023हमारी अपनी आकाशगंगा Milky Way से neutrino उत्सर्जन का पहला पताarXiv समीक्षा (preprint)

Science में छपे विश्लेषण के अनुसार 2017 का मेल सुझाता है कि blazar उच्च-ऊर्जा neutrinos का स्रोत हो सकते हैं। यानी एक मज़बूत संकेत, पक्का फ़ैसला नहीं।

हम भारतीयों के लिए क्या बदलेगा

ये पंक्तियाँ हमारी राय हैं, स्रोतों की नहीं। भारत का अपना neutrino सपना अलग रास्ते पर है। India-based Neutrino Observatory (INO) का प्रस्ताव तमिलनाडु के थेनी ज़िले के पोट्टीपुरम में है, जहाँ 50,000 टन का चुंबकीय ICAL detector लगना है। Drishti IAS के अनुसार प्रोजेक्ट पर्यावरण और वन्यजीव चिंताओं के कारण अटका है।

दोनों का काम अलग है। IceCube अंतरिक्ष से आए ऊँची ऊर्जा वाले कण देखता है। INO मुख्यतः वायुमंडल में बने neutrino का अध्ययन करता, जिसमें neutrino के द्रव्यमान-क्रम की गुत्थी आती है। ICRC 2023 में रखे IceCube के एक शोध-पत्र की संस्थान-सूची में Institute of Physics, Bhubaneswar भी दिखता है, यानी भारतीय शोधकर्ता इस क्षेत्र में पहले से सक्रिय हैं।

दुर्लभ संकेत के इंतज़ार की ऐसी ही कहानी ज़मीन के नीचे छुपे Dark Matter प्रयोग में भी है। और बड़ी भौतिकी मशीनों से भारत का पुराना नाता CERN के LHC मैग्नेट वाली कहानी में दिखता है।

एक सावधानी भी। Nobel के अगले दिन एक कंपनी की प्रेस-विज्ञप्ति ने इस पुरस्कार को neutrino से ambient energy बनाने की बात से जोड़ा। Nobel का उद्धरण सिर्फ़ IceCube और अंतरिक्षीय neutrinos की खोज के बारे में है, बिजली बनाने के बारे में नहीं।

अनसुलझे सवाल

  • कौन-से खगोलीय पिंड कितने neutrino भेजते हैं, यह तस्वीर अधूरी है। अभी गिनती के स्रोत जुड़े हैं।
  • TXS 0506+056 का 2014-15 वाला neutrino-उछाल gamma-ray के बिना आया था। यानी रोशनी और neutrino का रिश्ता हर बार एक-सा नहीं दिखता (arXiv समीक्षा, preprint)।
  • ब्रह्मांडीय किरणों (cosmic rays) का मूल स्रोत अब भी खुला सवाल है। University of Wisconsin-Madison की रिपोर्ट के अनुसार Halzen को उम्मीद है कि IceCube इसे सुलझाएगा।

आगे किन बातों पर नज़र रहे

पहला, IceCube का अपग्रेड। Rochester की रिपोर्ट के अनुसार 2025 से नए photosensor दक्षिणी ध्रुव पर लगाए जा रहे हैं। दूसरा, IceCube-Gen2, जो 8 घन किलोमीटर बर्फ़ तक फैलेगा। Sky & Telescope के अनुसार NSF ने 2023 में इस योजना को रोक दिया था। अब देखना है कि Nobel से हलचल बनती है या नहीं।

तीसरा, आकाशगंगा में अगला नज़दीकी supernova। Supernova 1987A के समय दुनिया भर के detectors ने सिर्फ़ 24 neutrinos दर्ज किए थे। Rochester के Segev BenZvi के अनुसार Milky Way के केंद्र के पास तारा फटे तो IceCube लगभग दस लाख neutrinos गिन सकता है। तारीख कोई नहीं बता सकता।

बर्फ़ में जमे sensor अब भी हर पल इंतज़ार में हैं। Halzen ने 1988 में Antarctic बर्फ़ से neutrino पकड़ने का प्रस्ताव रखा था, और 38 साल बाद वही विचार Nobel तक पहुँचा। ब्रह्मांड को अब रोशनी के साथ-साथ इन 'भूत कणों' से भी पढ़ा जा सकता है।

स्रोत: Nobel Prize Outreach, University of Rochester, Science (IceCube Collaboration), The Conversation, Sky & Telescope, Drishti IAS

यह भी पढ़ें