CERN ने अपने Large Hadron Collider (LHC) के 28 सबसे अहम सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट हटाने का काम शुरू कर दिया है, ठीक उसी मशीन के, जिसे बनाने में तीन दशक पहले भारत के इंजीनियरों ने भी हाथ बंटाया था।

CERN के अनुसार यह काम High-Luminosity LHC (HiLumi LHC) नाम के बड़े अपग्रेड का हिस्सा है, और अभी मशीन का Long Shutdown 3 नाम का बड़ा रखरखाव चल रहा है।

CERN में क्या हो रहा है, और क्यों?

CERN के मुताबिक 7 सितंबर 2026 से टीमें ATLAS और CMS प्रयोगों के दोनों तरफ LHC के हिस्से खोलना शुरू कर चुकी हैं। 17 सितंबर को CERN के महानिदेशक Mark Thomson खुद टनल में गए, जहां पहले मैग्नेट का जोड़ काटा गया।

ये वही 28 "इनर ट्रिपलेट" मैग्नेट हैं, जो टकराव से ठीक पहले पार्टिकल बीम को बेहद संकरा करते हैं। HiLumi LHC के प्रोजेक्ट लीडर Markus Zerlauth के अनुसार ये मैग्नेट 2005-2007 के बीच लगाए गए थे, यानी करीब 20 साल पुराने हैं।

ये पुराने मैग्नेट इतने खास क्यों थे?

LHC 27 किमी के घेरे में फैला है और इसमें डाइपोल, क्वाड्रुपोल जैसे कई तरह के हज़ारों मैग्नेट लगे हैं। पर इनर ट्रिपलेट का काम अलग है, ये पार्टिकल बीम को टकराने से ठीक पहले इतना संकरा करते हैं कि टक्कर की संभावना कई गुना बढ़ जाए।

CERN के अनुसार अब इनकी जगह niobium-tin से बने नए मैग्नेट लगेंगे, जिनका चुंबकीय क्षेत्र करीब 40% ज़्यादा मजबूत होगा। इससे बीम को पहले से भी ज़्यादा संकरा किया जा सकेगा।

Niobium-tin के तार अब तक किसी बड़े कण त्वरक में असल मशीन का हिस्सा नहीं बने थे। CERN के अनुसार यह LHC के इतिहास में पहली बार है जब यह सामग्री सीधे मशीन में लगाई जा रही है, अब तक चल रहे niobium-titanium मैग्नेट से यह कहीं ज़्यादा मजबूत चुंबकीय क्षेत्र झेल सकती है।

चीज़आंकड़ा
हटाए जा रहे मैग्नेट28 (inner triplets)
पुराने मैग्नेट की उम्रकरीब 20 साल (2005-2007 में लगे)
नए मैग्नेट की ताकतकरीब 40% ज़्यादा मजबूत चुंबकीय क्षेत्र
कुल बदला जा रहा हिस्साकरीब 1.2 किमी

हमारा आकलन: LHC की सुरंग 27 किमी लंबी है, जो दिल्ली की करीब 51 किमी लंबी Ring Road से भी छोटी पड़ती है, फिर भी इसके अंदर मैग्नेट को करीब -271.3°C तक ठंडा रखा जाता है, यानी खुले अंतरिक्ष के औसत तापमान से भी ठंडा।

नए मैग्नेट से बदलेगा क्या, और कब तक?

ज़्यादा मजबूत मैग्नेट का मतलब है ज़्यादा टक्कर, और ज़्यादा टक्कर का मतलब है ATLAS और CMS जैसे डिटेक्टरों के लिए विश्लेषण करने को कहीं ज़्यादा डेटा। यही HiLumi LHC का पूरा मकसद है।

यह काम Long Shutdown 3 के तहत हो रहा है, जो 2026 के मध्य से शुरू होकर करीब चार साल चलेगा। मौजूदा योजना के मुताबिक अपग्रेड की गई मशीन करीब 2030 में फिर से चालू होगी।

भारत का LHC से नाता कब और कैसे जुड़ा?

यह नाता अचानक नहीं बना। CERN के मुताबिक भारत के भौतिक विज्ञानी, खासकर TIFR से, 1960 के दशक से ही CERN के प्रयोगों में हिस्सा लेते रहे हैं। 1991 में DAE और CERN के बीच पहला सहयोग समझौता हुआ।

इसी नींव पर 1996 में भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) ने LHC के निर्माण में शामिल होने और CMS व ALICE डिटेक्टर बनाने में योगदान देने का फैसला लिया। इंदौर के RRCAT जैसे संस्थानों ने खुद पुर्जे बनाकर CERN भेजे थे।

आज भारत इस मशीन से किस तरह जुड़ा है?

भारत को 2002 में CERN Council में Observer का दर्जा मिला, और 16 जनवरी 2017 को भारत पूरी तरह CERN का Associate Member State बन गया। इससे भारतीय वैज्ञानिकों को CERN में सीधी नौकरी करने का रास्ता भी खुला।

  • 1991: DAE-CERN का पहला सहयोग समझौता
  • 1996: LHC निर्माण और CMS-ALICE में भारत का जुड़ाव तय
  • 2002: CERN Council में Observer का दर्जा
  • 2017: 16 जनवरी को भारत Associate Member State बना

CERN के अनुसार भारत आज भी Worldwide LHC Computing Grid के लिए TIFR (मुंबई) और VECC (कोलकाता) में दो Tier-2 सेंटर चलाता है, जहां LHC के डेटा का एक हिस्सा प्रोसेस होता है।

ALICE डिटेक्टर के लिए भारतीय टीमों ने Photon Multiplicity Detector और Forward Muon Spectrometer के लिए ट्रैकिंग चैंबर बनाए थे, साथ ही इसके लिए खास MANAS नाम की चिप भी डिज़ाइन की गई थी। ये पुर्जे आज भी उसी डिटेक्टर का हिस्सा हैं, जिससे मिलने वाला डेटा दुनिया भर के भौतिकविद पढ़ते हैं।

इस अपग्रेड में भारत के लिए मौका और सीमाएं क्या हैं?

HiLumi LHC को बनाने में करीब 20 देशों के 50 संस्थान जुड़े हैं, ज़्यादातर यूरोप से। CERN की अपनी सूची में इस खास अपग्रेड के लिए विशेष योगदान देने वाले देशों में भारत का नाम इटली, स्पेन या जापान जैसे देशों के साथ अलग से नहीं आता।

फिर भी भारत के दशकों पुराने रिश्ते, TIFR और VECC जैसे संस्थानों का अनुभव, और Associate Member का दर्जा आगे की बड़ी परियोजनाओं में सीधी हिस्सेदारी की गुंजाइश बनाए रखते हैं, खासकर तब जब CERN अपने अगले, और भी बड़े, Future Circular Collider पर बात आगे बढ़ाएगा।

Associate Member बनने से भारतीय कंपनियों को भी सीधे CERN के ठेकों में बोली लगाने का रास्ता खुला, जो पहले सिर्फ पूर्ण सदस्य देशों तक सीमित था। यह भारत के advanced manufacturing उद्योग के लिए एक मौका है, भले ही अभी इसका आकार छोटा हो।

अभी क्या पता नहीं, और आगे क्या होगा?

अभी साफ नहीं है कि सभी 28 मैग्नेट कब तक बदले जाएंगे, और बीच में कोई तकनीकी अड़चन कितना समय और जोड़ सकती है। CERN के मुताबिक बाकी मैग्नेट अभी टेस्ट बेंच पर परखे जा रहे हैं, इंस्टॉलेशन का बड़ा हिस्सा आना अभी बाकी है।

HiLumi LHC पूरी तरह चालू होने के बाद वैज्ञानिक Higgs boson को और बारीकी से परखने के अलावा Dark Matter जैसे रहस्यों की तलाश तेज करेंगे। भौतिकी की सीमाएं परखने का यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता, Quantum Scale पर Einstein की थ्योरी टेस्ट जैसे प्रयोग भी इसी दिशा में चल रहे हैं।

1996 में जिन भारतीय इंजीनियरों ने LHC के लिए पुर्जे भेजे थे, वही मशीन आज अपना एक हिस्सा खोलकर नया रूप ले रही है। अगली बार जब यह मशीन जागेगी, 2030 के आसपास, तब शायद भौतिकी की कोई नई पहेली सुलझाने के करीब हो।

स्रोत: CERN, ScienceDaily, CERN Courier

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