क्वांटम कंप्यूटर (quantum computer) अब तक सिर्फ 'ब्रेडिंग' (braiding) से हर तरह की गणना पूरी नहीं कर पाया था। 24 सितंबर 2026 को University of Chicago, Harvard, Stony Brook और Quantinuum की टीम ने Nature में छपे प्रयोग से यह सीमा तोड़ दी।
उन्होंने 'नॉन-एबेलियन एनियॉन' (non-Abelian anyons) नाम के अजीबोगरीब क्वांटम कणों से पहली बार एक पूरा 'यूनिवर्सल गेट सेट' बनाकर दिखाया — ऐसा सिस्टम जो किसी भी तरह का क्वांटम ऑपरेशन कर सके।
नॉन-एबेलियन एनियॉन (non-Abelian anyons) होते क्या हैं?
ये कण प्रकृति में अकेले नहीं मिलते। University of Chicago के अनुसार, वैज्ञानिक कई सामान्य क्विबिट्स (qubits) को आपस में उलझाकर (entangle) एक ऐसा सामूहिक रूप बनाते हैं जो नए कण जैसा बर्ताव करता है। जब दो एनियॉन एक-दूसरे के इर्द-गिर्द घुमाए जाते हैं, तो घुमाने का क्रम भी मायने रखता है — इसी वजह से इन्हें 'नॉन-एबेलियन' कहा गया है।
जानकारी किसी एक क्विबिट में नहीं, बल्कि कई उलझे हुए क्विबिट्स में फैली रहती है, इसलिए यह छोटी-मोटी गड़बड़ियों से कुछ हद तक खुद-ब-खुद बची रहती है। शोधकर्ता Ruben Verresen ने इसे 'छोटी वैकल्पिक दुनिया बनाने' जैसा बताया है, जो हमारी अपनी दुनिया के कुछ नियम दोहराती है। क्वांटम कंप्यूटिंग की बुनियादी बातें पहले से जानते हों तो यह विचार आसानी से समझ आएगा।
इस तरीके का सैद्धांतिक आधार Caltech के Carlos Mochon ने 2003 में अपनी PhD के दौरान रखा था, जब वे John Preskill के मार्गदर्शन में काम कर रहे थे। उस विचार को असली क्वांटम हार्डवेयर पर उतारने में दो दशक से ज़्यादा का अतिरिक्त सैद्धांतिक और प्रायोगिक काम लगा।
Quantinuum के H2 प्रोसेसर पर हुआ क्या?
टीम ने Quantinuum के H2 ट्रैप्ड-आयन (trapped-ion) प्रोसेसर पर 54 क्विबिट्स को उलझाकर S3 समूह के एनियॉन बनाए। S3 का मतलब है त्रिभुज को घुमाने-पलटने के छह तरीके। University of Chicago के मुताबिक यह सबसे छोटा नॉन-एबेलियन समूह है, इसलिए हार्डवेयर पर संभालना अपेक्षाकृत आसान रहा।
इससे पहले नॉन-एबेलियन कण फ्रैक्शनल क्वांटम हॉल (fractional quantum Hall) जैसी ठोस-अवस्था प्रणालियों में ही मिलने की उम्मीद थी, पर वहां इन्हें नियंत्रित करना अब तक बेहद मुश्किल रहा है।
- braiding से एक 'एंटैंगलिंग गेट' (entangling gate) बनाया गया
- fusion से पहला माप-आधारित ऑपरेशन दिखाया गया
- fusion से दूसरा माप-आधारित ऑपरेशन, जिससे 'मैजिक स्टेट' सीधे तैयार हुई
टीम ने एनियॉन जोड़ियों से 'टोपोलॉजिकल क्यूट्रिट' (qutrit) बनाए, जिनमें सामान्य क्विबिट के दो के बजाय तीन स्तर की जानकारी रखी जा सकती है। तीनों ऑपरेशन मिलकर कोई भी क्वांटम गणना करने की क्षमता देते हैं, जिसमें Shor जैसे बड़े एल्गोरिद्म भी शामिल हैं।
सिर्फ Braiding से बात क्यों नहीं बनी थी?
2024 में इसी टीम ने Quantinuum के H2 पर D4 समूह (square यानी वर्ग की समरूपता) के एनियॉन बनाए थे, जो नॉन-एबेलियन क्रम का पहला प्रदर्शन था। पर सिर्फ braiding से हर तरह का ऑपरेशन नहीं मिल पाया। Verresen के अनुसार वह 'वैकल्पिक दुनिया' यूनिवर्सल गणना के लिए काफी ताकतवर नहीं थी।
| पहलू | 2024 का प्रयोग | 2026 का प्रयोग |
|---|---|---|
| समूह | D4 (वर्ग की समरूपता) | S3 (त्रिभुज की समरूपता) |
| क्विबिट्स | 27 | 54 |
| सिर्फ braiding से यूनिवर्सल? | नहीं | नहीं |
| braiding + fusion से यूनिवर्सल? | टेस्ट नहीं हुआ | हां |
'यूनिवर्सल गेट सेट' इतना बड़ा दावा क्यों है?
आम क्वांटम कंप्यूटरों में गलती सुधारने (error correction) के लिए जानकारी कई क्विबिट्स में बांटी जाती है, पर इससे हर ऑपरेशन नहीं मिलता। बाकी बचे ऑपरेशन के लिए 'मैजिक स्टेट' चाहिए होती है, जिसे बनाने में 'डिस्टिलेशन' (distillation) नाम की महंगी प्रक्रिया लगती है और कई क्विबिट्स खप जाते हैं। Quantinuum के Henrik Dreyer के अनुसार नॉन-एबेलियन कोड 'दौड़ का डार्क हॉर्स' हैं क्योंकि ये बिना डिस्टिलेशन के भी काम कर सकते हैं।
हमारी राय में इसे एक ताले से समझा जा सकता है: ताला अक्सर सिर्फ चाबी घुमाने से नहीं खुलता, साथ में डायल कोड भी मिलाना पड़ता है। braiding अकेले 'चाबी घुमाने' जैसा था; fusion ने वह 'डायल कोड' जोड़ा, जिससे पूरा ताला यानी यूनिवर्सल गणना खुल गई।
क्विबिट्स को लाखों तक पहुंचाने की दौड़ में Silicon Quantum Chip की नई सफलता भी एक अलग रास्ता दिखा चुकी है — यानी यूनिवर्सल गणना तक पहुंचने के कई रास्ते एक साथ खुल रहे हैं।
भारत के लिए इसका मतलब क्या है?
भारत के National Quantum Mission के तहत IIT Delhi का 'Quantum Materials and Devices' हब टोपोलॉजिकल सामग्री (topological materials) पर काम करता है, जिस पर एनियॉन-आधारित सिस्टम टिके होते हैं। मिशन का लक्ष्य 2031 तक 50-1000 क्विबिट्स के बीच क्वांटम कंप्यूटर बनाना है, फिलहाल यह ज्यादातर सुपरकंडक्टिंग और फोटोनिक मंच पर केंद्रित है, ट्रैप्ड-आयन पर नहीं। इसी मिशन के तहत भारत पहले ही 1,000 किलोमीटर लंबा क्वांटम संचार नेटवर्क भी दिखा चुका है।
अगर नॉन-एबेलियन तरीका आगे स्थिर साबित हुआ, तो भारत के शोधकर्ताओं के पास डिस्टिलेशन जैसी महंगी प्रक्रिया से बचने का एक और विकल्प खुलेगा। पर अभी यह सिर्फ Quantinuum के हार्डवेयर पर, बिना एरर-करेक्शन के दिखाया गया प्रयोग है — भारत में इसे दोहराने के लिए उतना ही साफ ट्रैप्ड-आयन मंच चाहिए होगा, जो अभी मिशन की प्राथमिकता में नहीं है।
क्वांटम दुनिया की तस्वीर आखिर कैसे बनती है, यह एक अलग superconductor प्रयोग में भी दिखा था।
अभी क्या अधूरा है, आगे क्या देखना है?
Verresen ने खुद कहा कि इस प्रयोग में सक्रिय एरर-करेक्शन (active error correction) शामिल नहीं था, यह सिर्फ यह दिखाता है कि तरीका सिद्धांत में काम करता है। University of Chicago के अनुसार अगला बड़ा कदम इन्हीं ऑपरेशनों को सक्रिय एरर-करेक्शन के साथ जोड़ना होगा।
आगे तीन चीज़ों पर नज़र रहेगी: नॉन-एबेलियन 'क्वांटम मेमोरी' को स्थिर रखने के नए तरीके, बड़े क्विबिट काउंट पर यही प्रयोग दोहराना, और यह जांचना कि तरीका दूसरे हार्डवेयर मंच जैसे सुपरकंडक्टिंग चिप पर भी चलता है या नहीं। इनमें से किसी की तारीख अभी तय नहीं है। ये तीनों कदम मिलकर तय करेंगे कि नॉन-एबेलियन तरीका सिर्फ एक दिलचस्प भौतिकी प्रयोग रहता है, या असली फॉल्ट-टॉलरेंट क्वांटम कंप्यूटर की नींव बनता है।
फिलहाल यह प्रयोग एक सबूत भर है, कोई तैयार कंप्यूटर नहीं। पर यह दिखाता है कि क्वांटम कंप्यूटिंग की दौड़ में सिर्फ एक रास्ता नहीं है — braiding और fusion का यह मेल आने वाले सालों में एक अलग राह खोल सकता है।
स्रोत: Nature, University of Chicago, Quantinuum, DST National Quantum Mission