लैटिन अमेरिका और कैरिबियन में निगरानी वाली वन्यजीव आबादी 1970 से 2022 के बीच औसतन 95% घटी, जबकि यूरोप और मध्य एशिया में 23%। यह वन्यजीव आबादी में गिरावट का वही फर्क है जो WWF की नई Living Planet Report 2026 में सामने आया, और इसी से पूरी रिपोर्ट का असली मतलब समझ आता है।
क्षेत्र बनाम क्षेत्र: 95% से 23% तक
WWF और ज़ूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन (ZSL) की यह रिपोर्ट 7-8 अक्टूबर 2026 को जारी हुई। यह 5,790 रीढ़दार (vertebrate) प्रजातियों की 35,803 आबादी के रुझान पर आधारित है। नीचे इलाकेवार औसत गिरावट है:
| क्षेत्र | औसत गिरावट (1970-2022) |
|---|---|
| लैटिन अमेरिका और कैरिबियन | 95% |
| अफ्रीका | 80% |
| एशिया-प्रशांत (भारत इसी में) | 49% |
| उत्तरी अमेरिका | 28% |
| यूरोप और मध्य एशिया | 23% |
WWF खुद चेताता है कि इसे इलाकों की सेहत की रैंकिंग न समझा जाए। यूरोप और उत्तरी अमेरिका में 1970 से पहले ही काफी नुकसान हो चुका था, इसलिए उनकी गिरावट कम दिखती है। अफ्रीका जैसे इलाकों का डेटा भी छोटा है, इसलिए वहां के आंकड़े ज़्यादा ऊपर-नीचे हो सकते हैं।
ज़मीन, पानी और समुद्र: कौन ज़्यादा घटा
WWF के अनुसार रहने की जगह के हिसाब से फर्क और भी बड़ा है। मीठे पानी की प्रजातियों की आबादी औसतन 85% घटी, ज़मीन पर रहने वालों की 69% और समुद्री जीवों की 59%।
- मीठा पानी (नदी, झील, वेटलैंड): 85% गिरावट
- ज़मीन: 69% गिरावट
- समुद्र: 59% गिरावट
मीठे पानी का हाल सबसे खराब इसलिए माना जाता है कि नदियों पर बांध, प्रदूषण और ज़्यादा पानी निकालने का असर सीधे वहां रहने वाली प्रजातियों पर पड़ता है। भारत में लोकटक झील पर जलवायु और माइक्रोप्लास्टिक के असर की हमारी रिपोर्ट इसी दबाव का एक स्थानीय उदाहरण है।
गिरावट की वजहें भी कई हैं। The Press Pad के सार के अनुसार रिपोर्ट में सबसे ज़्यादा दर्ज खतरा आवास का नुकसान और बिगड़ना है, उसके बाद ज़रूरत से ज़्यादा दोहन, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और बाहरी प्रजातियां। रिपोर्ट खाद्य व्यवस्था को इसका बड़ा कारण मानती है।
गिरावट बनाम वापसी: बाघ की 3,200 से 5,700 तक की कहानी
रिपोर्ट सिर्फ गिरावट नहीं गिनाती। इसके अनुसार निगरानी वाली आबादी में से करीब आधी स्थिर है या बढ़ रही है। WWF के मुताबिक बाघ वाले देशों (भारत समेत) में जंगली बाघों की संख्या 2010 में करीब 3,200 थी और 2025 में करीब 5,700, यानी 70% से ज़्यादा की बढ़त।
रिपोर्ट हरे समुद्री कछुओं, ब्लूफिन ट्यूना और दक्षिणी अफ्रीका के कुछ हाथी समूहों की वापसी का भी ज़िक्र करती है। साथ ही साफ कहती है कि इन सफलताओं का मतलब यह नहीं कि ये प्रजातियां हर जगह सुरक्षित हैं। बाघों को आवास के बंटवारे और इंसान से टकराव का खतरा अब भी है, जिसे हमने वायनाड के मामले में देखा था।
अफ्रीका की तस्वीर में भी दोनों पहलू साथ दिखते हैं। WWF Africa के अनुसार आठ अफ्रीकी गिद्ध प्रजातियों की आबादी 62% घटी, जबकि दक्षिणी अफ्रीका के कुछ हाथी समूह बढ़ रहे हैं और कांगो बेसिन में कुछ गोरिल्ला आबादी स्थिर या सुधरती दिखी है। यानी एक ही महाद्वीप में गिरावट और वापसी दोनों दर्ज हैं।
73% का मतलब क्या है, और क्या नहीं
सबसे आम गलतफहमी यह है कि दुनिया के 73% जानवर खत्म हो गए। रिपोर्ट के अनुसार यह औसत है: अगर किसी निगरानी वाली आबादी में 1970 में 1,000 जीव थे और 2022 में 270, तो उसे 73% गिरावट कहा जाएगा। यह गिनती सैकड़ों-हज़ारों आबादियों के औसत से निकलती है।
हमारा हिसाब है कि यह औसत सालाना करीब 2.5% की गिरावट के बराबर है, जो रिपोर्ट में भी दर्ज है। 52 साल तक हर साल 2.5% घटने पर आबादी लगभग 27% बचती है। अफ्रीका के लिए रिपोर्ट सालाना करीब 3.1% बताती है, जो 80% के आसपास गिरावट देती है। दोनों आंकड़े आपस में मेल खाते हैं।
आम पाठक के लिए एक आसान तुलना: जैसे किसी मोहल्ले की दस दुकानों में से पांच की बिक्री बढ़ रही हो और पांच की भारी गिर रही हो, तो औसत गिरावट बड़ी दिख सकती है, पर यह नहीं कि मोहल्ले की हर दुकान बंद हो गई। रिपोर्ट के औसत को भी इसी तरह पढ़ना चाहिए।
भारत के लिए मतलब
भारत एशिया-प्रशांत वाले 49% के भीतर आता है, पर यह भारत का अपना आंकड़ा नहीं है। रिपोर्ट का वैश्विक 73% भी भारत के वन्यजीवों में मापी गई गिरावट नहीं है। इसलिए किसी हेडलाइन में भारत के लिए "73% गिरावट" पढ़ें, तो उसे सही नहीं मानना चाहिए।
असली सबक यह है कि सफलता और संकट साथ-साथ चल सकते हैं। बाघ जैसी चर्चित प्रजाति बढ़ रही है, जबकि नदियों और झीलों की कम चर्चित प्रजातियों पर दबाव सबसे ज़्यादा है। हमने राष्ट्रीय उद्यानों में नाइट्रोजन जमाव पर भी लिखा था, जो जैव विविधता पर एक और अदृश्य दबाव है।
जो अभी पता नहीं
रिपोर्ट भारत के लिए अलग से कोई सूचकांक नहीं देती, इसलिए यहां की भूमि, नदी और समुद्री प्रजातियों की औसत गिरावट का आंकड़ा अभी हमारे पास नहीं है। Tech Times के अनुसार 73% के आकार पर वैज्ञानिक बहस भी रही है, और WWF Africa के मुताबिक क्षेत्रीय डेटा वैश्विक डेटा से छोटा है।
यह भी साफ नहीं कि बाघ जैसी वापसी दूसरी प्रजातियों में दोहराई जा सकेगी या नहीं। रिपोर्ट के अनुसार इसके लिए भोजन, ऊर्जा और वित्त की व्यवस्था में बदलाव चाहिए, पर यह कितना और कब होगा, यह तय नहीं।
रिपोर्ट "सकारात्मक मोड़ बिंदु" (positive tipping points) की बात करती है, यानी ऊर्जा, भोजन और वित्त की प्रणालियों में ऐसे बदलाव जो खुद आगे के सुधार को आसान बना दें। यह विचार अभी नीतिगत सुझाव है, किसी देश की तय योजना नहीं।
आगे क्या देखें
पहला, संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन में सरकारें इस रिपोर्ट के बाद अपने लक्ष्य कैसे कसती हैं। दूसरा, भारत अपनी जैव विविधता कार्ययोजना (NBSAP 2024-2030) पर कैसे आगे बढ़ता है। तीसरा, क्या अगली रिपोर्ट में भारत के लिए अलग आंकड़े मिलते हैं। सम्मेलन की तारीख हमारे पास पुष्ट नहीं है।
73% का आंकड़ा डराने वाला है, पर पूरी कहानी नहीं। आधी आबादी स्थिर या बढ़ती भी है, और यही फर्क बताता है कि संकट तय नहीं, चुना हुआ है।
स्रोत: WWF Living Planet Report 2026, ZSL, WWF प्रेस विज्ञप्ति, WWF Africa, Time News, The Press Pad