अंटार्कटिका की बर्फ की चादर (Antarctic Ice Sheet) इस सदी में घटेगी, इसकी संभावना बहुत ज़्यादा है। Nature Geoscience में 30 सितंबर 2026 को छपे अध्ययन के अनुसार यह संभावना कम से कम 92% है, तब भी जब उत्सर्जन में तेज़ कटौती हो जाए।

पहले तस्वीर धुंधली थी: Nature Geoscience के मुताबिक IPCC की छठी रिपोर्ट में उत्सर्जन और अंटार्कटिक बर्फ की प्रतिक्रिया के रिश्ते पर सहमति कम मानी गई थी। अब मॉडलों को उपग्रह से मापी गई बर्फ-हानि से कसकर यह अनुमान निकाला गया है।

इस लेख में दो चीज़ें अलग से हैं। अंटार्कटिका के सालाना नुकसान को स्विमिंग पूल के पैमाने पर रखा गया है, और भारतीय तटों के नज़रिए से पूछा गया है कि इस खबर का हमारे लिए क्या मतलब बनता है।

अंटार्कटिका अभी कितनी बर्फ खो रहा है?

Nature Geoscience के अनुसार अंटार्कटिका की चादर में इतना पानी जमा है कि पूरी पिघल जाए तो वैश्विक समुद्र स्तर 57.9 मीटर बढ़ जाए। यह सैद्धांतिक पैमाना है, भविष्यवाणी नहीं। असल में अब तक हुआ नुकसान इस आंकड़े के सामने बहुत छोटा है:

  • 2006–2018: समुद्र स्तर की कुल बढ़त में अंटार्कटिका का हिस्सा लगभग 10% (IPCC के हवाले से अध्ययन)
  • 2002–2021: GRACE और GRACE Follow-On उपग्रहों के आंकड़ों पर आधारित औसत नुकसान 158 ± 14 अरब टन (Gt) प्रति वर्ष
  • अध्ययन के पैमाने पर 362.5 Gt बर्फ = 1 मिमी समुद्र स्तर, यानी लगभग 0.44 मिमी प्रति वर्ष

इसे रोज़ के पैमाने पर रखें। पानी के बराबर द्रव्यमान मानें तो 158 अरब टन लगभग 158 घन किलोमीटर होता है। एक ओलंपिक स्विमिंग पूल में करीब 2,500 घन मीटर पानी आता है, यानी हर साल लगभग 6.3 करोड़ पूल के बराबर बर्फ अंटार्कटिका से निकल रही है। यह हमारी अपनी गणना है, बर्फ और पानी के घनत्व का फ़र्क इसमें छोड़ा गया है।

‘Committed’ का मतलब क्या है और 92% कहां से आया?

अध्ययन में ISMIP6 नाम की मॉडल-तुलना परियोजना के 41 सिमुलेशन ढांचों से एक मशीन-लर्निंग emulator (नकल-मॉडल) बनाया गया। फिर इसे उपग्रह से मापी गई बर्फ घटने की दर से कसा गया। कसने के बाद वही मॉडल-विकल्प ज़्यादा भारी हुए जो मापे गए नुकसान से मेल खाते हैं।

उत्सर्जन परिदृश्यकसने से पहलेकसने के बाद
SSP1–1.9 (सबसे कम उत्सर्जन)0.800.92
SSP5–8.5 (बहुत ऊंचा उत्सर्जन)0.850.95 या ज़्यादा

ये बर्फ घटने की संभावनाएं हैं, यानी 0.92 का मतलब 92%। ‘Committed’ को ‘सौ फीसदी तय’ पढ़ना गलत होगा। लेखक खुद इसे ‘बहुत संभव’ (very likely) कहते हैं। सबसे कम उत्सर्जन वाला रास्ता Phys.org पर छपे Rutgers के विवरण के अनुसार वह है जिसमें CO₂ उत्सर्जन 2050 के आसपास नेट-ज़ीरो हो जाता है।

क्या उत्सर्जन घटाने से बर्फ का नुकसान कम होता है?

हां, पर पूरा रुकता नहीं। Nature Geoscience के अनुसार ज़्यादा उत्सर्जन से ज़्यादा नुकसान की संभावना कम से कम 0.89 है। यानी कटौती नुकसान की मात्रा घटाती है, उसे शून्य नहीं करती। यही बात 1.5°C पार होने की स्थिति पर भी लागू होती है: हर अतिरिक्त डिग्री का असर अलग दर्ज होता है।

अध्ययन के drift-corrected मॉडलों में 2100 तक 0–2°C की गर्मी पर प्रति डिग्री लगभग 0.12 सेमी बढ़त दिखती है, जबकि 2–4.5°C के दायरे में यह 1.79 सेमी प्रति डिग्री हो जाती है। ये अनुमान (projection) हैं, मापे हुए आंकड़े नहीं।

गर्म हवा से बर्फबारी बढ़ती है और चादर में द्रव्यमान जुड़ता है, पर समुद्र का गर्म पानी नीचे से बर्फ गलाता है। अध्ययन के अनुसार बर्फबारी से भरपाई की संभावना बहुत कम है। केवल एक मॉडल (UKESM1-0-LL) में सदी के भीतर शुद्ध बढ़त दिखी, जिसे अध्ययन अस्थायी बताता है।

सबसे तेज़ रास्ता कैसे बनता है और उसमें कितनी बढ़त है?

Nature Geoscience के अनुसार SSP5–8.5 के सबसे ऊंचे 1% परिदृश्यों में 2100 तक अंटार्कटिका से 15.7 सेमी (दायरा 9.8–25.4 सेमी) समुद्र स्तर बढ़त बन सकती है। ये वही संयोजन हैं जो उपग्रह से मापी दर से भी मेल खाते हैं। अध्ययन इस रास्ते को कई कड़ियों की श्रृंखला बताता है:

  • समुद्र का तापमान उम्मीद से ज़्यादा तेज़ी से बढ़े
  • उसी गर्मी से बर्फ के तैरते हिस्सों (ice shelf) के नीचे ज़्यादा पिघलाव हो
  • ज़मीन से बर्फ की पकड़ कमज़ोर हो और बर्फ तेज़ी से समुद्र में सरके
  • शेल्फ ढहने लगें और जमी बर्फ का किनारा (grounding line) तेज़ी से पीछे हटे

यह औसत नहीं, सबसे ऊंचा छोर है। मध्य परिदृश्य इससे काफी नीचे रहते हैं, इसलिए इसे डर की तरह नहीं, योजना बनाने वालों के लिए ऊपरी सीमा की तरह पढ़ना ठीक रहेगा।

वैज्ञानिक अभी किन बातों पर एकमत नहीं हैं?

Nature Geoscience के अनुसार अनिश्चितता का बड़ा हिस्सा मॉडल बनाने के चुनावों से आता है:

मॉडल का चुनाव2100 तक अंतर
बर्फ फिसलने का नियम: Budd बनाम Weertman5.0 ± 4.2 सेमी
शेल्फ के नीचे पिघलाव का तरीका7.8 ± 5.2 सेमी
मॉडल का रेज़ोल्यूशन: 1 किमी बनाम 8 किमी4.3 ± 2.8 सेमी कम

अध्ययन में marine ice cliff instability (MICI) शामिल नहीं है। Nature Geoscience के अनुसार यह प्रक्रिया अटकल भरी है और इसकी वैधता पर बहस जारी है। विश्लेषण 2100 तक सीमित है, क्योंकि उसके बाद के नतीजों में मॉडल-समूह मज़बूत नहीं पड़ता। छोटी अवधि के उपग्रह आंकड़े उन प्रक्रियाओं को कम कस पाते हैं जो आगे चलकर बड़ा असर डाल सकती हैं।

भारत के तटों के लिए इसका क्या मतलब है?

पहली बात: अध्ययन में छह शहर हैं, भारत का कोई नहीं। लंदन, सिंगापुर, न्यूयॉर्क, शंघाई, ब्यूनस आयर्स और मेलबर्न। अंटार्कटिका से बर्फ हटने का समुद्र पर असर हर जगह एक जैसा नहीं पड़ता। Nature Geoscience के अनुसार बर्फ के नुकसान की भौगोलिक बनावट से आने वाली अनिश्चितता लंदन और सिंगापुर में 1% से कम, ब्यूनस आयर्स में 17% और मेलबर्न में 21% है।

हमारा आकलन है कि भूमध्य रेखा के पास सिंगापुर का उदाहरण भारतीय तटों के लिए हल्का संकेत भर है, पक्का जवाब नहीं। भारत के हर शहर के लिए अलग स्थानीय अध्ययन चाहिए। अंटार्कटिका कुल बढ़त में लगभग 10% हिस्सा देता है; बाकी IPCC के अनुसार समुद्र के गर्म होकर फैलने, ग्रीनलैंड और हिमालय जैसे पर्वतीय ग्लेशियरों से आता है।

इसलिए NCM 2.0 जैसी तटीय योजनाओं के लिए सीख सीधी है: स्थानीय ज्वार-मापी आंकड़ों के साथ ऊपरी सीमा वाले परिदृश्य भी रखे जाएं, क्योंकि बंदरगाह और पुल दशकों चलते हैं।

आगे क्या देखें?

  • ISMIP6 के अगले प्रयोगों में MICI जैसी छूटी प्रक्रियाओं का जुड़ना
  • बर्फ फिसलने के नियम और शेल्फ-पिघलाव पर नए उपग्रह और ज़मीनी माप, जिनकी मांग लेखकों ने की है
  • दूसरी टीमों द्वारा नतीजे दोहराना: आंकड़े और कोड Zenodo पर सार्वजनिक हैं

नतीजा दो हिस्सों में पढ़ा जा सकता है। अंटार्कटिका का घटना अब काफी हद तक बंधा हुआ है, पर कितना घटेगा यह आज की उत्सर्जन दिशा पर टिका है। इसी अंतर में नीति की गुंजाइश बची है।

स्रोत: Nature Geoscience (Lin et al., 2026), Phys.org (Rutgers University विवरण), EurekAlert, IPCC AR6