1.5°C ओवरशूट (climate overshoot) का सीधा मतलब है कि पृथ्वी का दीर्घकालिक तापमान पेरिस समझौते की 1.5°C वाली सीमा को पार करेगा, पर ज़रूरी नहीं कि वहीं अटका रहे; कटौती तेज़ हो तो वह शिखर (peak) छूकर नीचे भी लौट सकता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने 2 सितंबर 2026 को 'Limiting Overshoot' रिपोर्ट जारी की, जिसमें, Eos की रिपोर्ट के अनुसार, पहली बार इस सीमा के नीचे टिके रहने को 'मुश्किल' नहीं, 'नामुमकिन' माना गया है।

इस रिपोर्ट पर अंग्रेज़ी में कई सारांश हैं, पर 'सीमा पार' की खबर पढ़कर पाठक अक्सर या घबरा जाता है या हार मान लेता है। यहाँ हम तीन आम भ्रम तोड़ेंगे, बचे हुए कार्बन बजट का एक मोटा हिसाब लगाएँगे और रिपोर्ट को भारत के 2025-26 के अपने आँकड़ों के बगल में रखकर देखेंगे।

पहला भ्रम: ओवरशूट का मतलब है लक्ष्य छोड़ देना

UNEP की रिपोर्ट ऐसा नहीं कहती। वह ओवरशूट को एक पल नहीं, एक रास्ता (pathway) मानती है, जिसके चार पड़ाव हैं: सीमा पार होना (exceedance), शिखर पर ठहराव (peak), गिरावट (decline) और स्थिरता (stabilisation)। यानी 1.5°C को अब 'नीचे से' नहीं, 'ऊपर से' पकड़ना होगा: पहले पार, फिर वापसी।

एक सवाल स्वाभाविक है। 2024 में तो साल का औसत तापमान 1.5°C से ऊपर जा चुका था (WMO के अनुसार लगभग 1.55°C), फिर 'पार होना' अब क्यों कहा जा रहा है? वजह यह है कि पेरिस लक्ष्य किसी एक साल पर नहीं, कई दशकों के औसत पर आँका जाता है। एक गर्म साल झलक है; दशकों का औसत असली पैमाना।

अभी की स्थिति क्या है? रिपोर्ट के सारांशों के अनुसार मानव-जनित तापमान लगभग 1.4°C ऊपर है और हर दशक करीब 0.25°C बढ़ रहा है। WMO की 28 मई 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक 2026-2030 के पाँच साल के औसत के 1.5°C से ऊपर रहने की संभावना 75% है, और कम से कम एक साल के इस सीमा से ऊपर जाने की संभावना 91%। हमारा मोटा हिसाब: 1.5 तक 0.1°C बाकी है और रफ़्तार 0.025°C प्रति साल है, तो करीब 4 साल, यानी 2030 के आसपास। UNSW के विशेषज्ञ भी 2030 का ही ज़िक्र करते हैं।

एक मोटा हिसाब: बचा हुआ कार्बन बजट कितने साल चलेगा

Greenpeace ने UNEP रिपोर्ट पर अपनी टिप्पणी में बताया है कि 2026 से आगे केवल लगभग 130 अरब टन (Gt) CO₂ और छोड़ी जा सकती है, तभी 1.5°C पर टिकने की 50% संभावना बचती है। रिपोर्ट के एक सारांश में सालाना वैश्विक उत्सर्जन करीब 40 अरब टन CO₂ बताया गया है। इसे ऐसे सोचिए: बैंक में ₹130 बचे हैं और हर साल ₹40 निकल रहे हैं। हमारा हिसाब है 130 ÷ 40 ≈ 3.25 साल। यह बस मोटा गणित है, क्योंकि यह मानकर चलता है कि उत्सर्जन इसी स्तर पर रहेगा। पर संदेश साफ़ है: बजट कुछ ही साल का बचा है।

दूसरा भ्रम: 1.8°C और 1.5°C में फ़र्क़ ज़्यादा नहीं

UNEP के अनुसार सबसे अच्छे परिदृश्य में भी शिखर करीब 1.8°C रहेगा, और बाकी परिदृश्यों में 2°C से ऊपर। 0.3°C सुनने में छोटा लगता है, पर रिपोर्ट कहती है कि 1.5°C के ऊपर हर अतिरिक्त अंश और हर अतिरिक्त साल के साथ जोखिम बढ़ता है। अपरिवर्तनीय मोड़ों (tipping points) की संभावना शिखर की ऊँचाई और ठहराव की अवधि के साथ बढ़ती है। रिपोर्ट इनमें बड़ी बर्फ़ की चादरों के अस्थिर होने, अमेज़न के जंगलों के क्षरण और अटलांटिक की समुद्री धाराओं (AMOC) में गड़बड़ी को गिनाती है।

UNEP की व्याख्या में यह चेतावनी भी है कि जलवायु की सीमाएँ अनुकूलन (adaptation) की गुंजाइश घटा सकती हैं और वैश्विक खाद्य उत्पादन 2050 तक 14% घट सकता है। यह 'हो सकता है' वाला अनुमान है, तय भविष्यवाणी नहीं।

तुलना के लिए: मौजूदा नीतियों पर चलें तो 2100 तक मध्यमान तापमान लगभग 2.6°C रहेगा (दायरा 1.9°C से 3.6°C), ऐसा एक विश्लेषण में रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है; Climate Action Tracker का आँकड़ा भी 2.6°C है। इसलिए 1.8°C 'अच्छी खबर' नहीं, बस 'सबसे कम बुरा' परिदृश्य है।

तीसरा भ्रम: पेड़ और मशीनें बाद में सब सुलझा देंगी

कार्बन डाइऑक्साइड रिमूवल (CDR), यानी हवा से CO₂ खींचकर सोखना, ज़रूरी है, यह रिपोर्ट भी मानती है। पर State of CDR रिपोर्ट (जून 2026) के अनुसार दुनिया आज हर साल करीब 2.2 अरब टन CO₂ हटा रही है, और इसका लगभग 99.9% पेड़ लगाने और जंगल बहाल करने जैसे ज़मीनी तरीकों से आता है। मशीनों या खनिजों वाले नए तरीके सिर्फ़ लगभग 20 लाख टन प्रति वर्ष हटाते हैं। Carbon Brief के अनुसार यह कुल वैश्विक CO₂ उत्सर्जन का करीब 5% है, यानी जितना हम छोड़ते हैं, उसका बीसवाँ हिस्सा ही वापस खींच पा रहे हैं।

UNEP के अनुसार मॉडल दिखाते हैं कि CDR इस सदी में तापमान को केवल कुछ दशमलव अंश ही पलट सकता है। यह उत्सर्जन घटाने का विकल्प नहीं है। नए तरीकों की लागत भी ऊँची है, रिपोर्ट के साथ जारी व्याख्या में प्रति टन CO₂ के लिए 600 अमेरिकी डॉलर तक का ज़िक्र है। और शर्त यह है कि CDR भरोसेमंद ढंग से 1.5°C के नीचे वापसी में तभी मदद करेगा जब शिखर 2°C से काफ़ी नीचे रहे और बचे हुए उत्सर्जन घटाए जाएँ।

क्या तय है और क्या अभी हमारे हाथ में

पहलूअभी की स्थितिक्या बदल सकता है
1.5°C पार होनाअगले कुछ सालों में लगभग तय (UNEP)टलना मुश्किल
शिखर का तापमानसबसे अच्छे हालात में करीब 1.8°Cतुरंत और लगातार कटौती से शिखर नीचा रह सकता है
2100 का तापमान (मौजूदा नीतियाँ)मध्यमान लगभग 2.6°Cकटौती और CDR से घट सकता है
CO₂ निकासी (2026)करीब 2.2 अरब टन प्रति वर्षकई गुना बढ़ानी होगी, पर कटौती की जगह नहीं
ऊपर बिताया समयदशकों तक चल सकता हैशिखर जितना नीचा, वापसी उतनी जल्दी

भारत के लिए: तापमान का अंक नहीं, बारिश और गर्मी का रोज़ का हिसाब

पहले एक ज़रूरी स्पष्टीकरण। नीचे के आँकड़े आज की लगभग 1.4°C वाली दुनिया के हैं, ओवरशूट के नहीं, और इनके पीछे कई कारण हैं। पर ये बताते हैं कि आधार-रेखा पहले ही कितनी असहज हो चुकी है।

  • CSE की State of India's Environment 2026 के अनुसार 2025 में भारत में चरम मौसम की घटनाएँ 99% दिनों में दर्ज हुईं।
  • उन घटनाओं में 4,419 मौतें हुईं और 1.741 करोड़ हेक्टेयर (17.41 मिलियन हेक्टेयर) फसल प्रभावित हुई।
  • राज्यों में हिमाचल प्रदेश में 267 दिन, केरल में 173 दिन और मध्य प्रदेश में 162 दिन ऐसे रहे।
  • 2026 का मानसून: IMD के आँकड़ों के अनुसार 4 जून से 19 सितंबर तक देश में 15% कम बारिश हुई, जून में लगभग 35% कमी रही और दक्षिणी प्रायद्वीप में 29% कमी दर्ज हुई।

हमारा अपना हिसाब: 4,419 मौतें यानी 2025 में औसतन रोज़ 12 से ज़्यादा लोग। और 1.741 करोड़ हेक्टेयर यानी लगभग 1.74 लाख वर्ग किलोमीटर, जो पूरे ओडिशा (करीब 1.56 लाख वर्ग किलोमीटर) से भी बड़ा क्षेत्र है।

इस साल मानसून की कमी का सीधा कारण एल नीनो है, ओवरशूट नहीं; इसकी पूरी कहानी हमने एल नीनो और मानसून 2026 वाले लेख में लिखी है। पर WMO की मई 2026 की रिपोर्ट कहती है कि 2026 के अंत में एल नीनो की संभावना है, जिससे 2027 के रिकॉर्ड गर्म साल बनने की गुंजाइश बढ़ती है। हमारा आकलन: ओवरशूट सीधी ढलान की तरह नहीं आएगा। बढ़ते आधार-स्तर के ऊपर एल नीनो जैसे प्राकृतिक उतार-चढ़ाव आते रहेंगे, और उन्हीं वर्षों में भारत को सबसे तेज़ झटके लग सकते हैं।

गर्मी का पक्ष भी है। मानसून में भी बढ़ता heat stress दिखाता है कि नमी भरी गर्मी सिर्फ़ मई-जून की समस्या नहीं रही। UNEP प्रमुख इंगर एंडरसन ने भी कहा है कि 1.5°C के ऊपर चरम मौसम, ग्लेशियर पिघलने और पारिस्थितिकी के नुकसान की तीव्रता बढ़ेगी। हिमालय के ग्लेशियरों पर 'पीक वॉटर' की हमारी पड़ताल इसी कड़ी का भारतीय पहलू है। यह सब रिपोर्ट का भारत-विशेष निष्कर्ष नहीं, हमारा जोड़ा हुआ संदर्भ है।

भारत की अपनी योजना और ओवरशूट का पैमाना

मार्च 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत का तीसरा राष्ट्रीय जलवायु संकल्प (NDC 3.0) मंज़ूर किया। इसके तीन बड़े लक्ष्य 2035 तक के हैं: 2005 के मुकाबले GDP की उत्सर्जन तीव्रता (emissions intensity) में 47% कमी, बिजली की स्थापित क्षमता में करीब 60% हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से, और जंगल तथा पेड़ों के ज़रिये 3.5 से 4.0 अरब टन CO₂-समतुल्य अतिरिक्त कार्बन सोख। रिपोर्टों के अनुसार गैर-जीवाश्म क्षमता फरवरी 2026 में ही 52.57% पहुँच चुकी थी, और 2005 से 2020 के बीच तीव्रता में करीब 36% की कमी आ चुकी है।

यहाँ हमारा विश्लेषण: ओवरशूट रिपोर्ट का पैमाना कुल उत्सर्जन का शिखर और नेट-ज़ीरो है, जबकि भारत का पहला लक्ष्य प्रति GDP उत्सर्जन का है। GDP बढ़े तो तीव्रता घटने के बावजूद कुल उत्सर्जन बढ़ सकता है। IMPRI के विश्लेषण में भी कहा गया है कि ये लक्ष्य भविष्य के उत्सर्जन-विस्तार को ज़्यादा नहीं बाँधते। दूसरी ओर CREA के विश्लेषक लॉरी मिलिविर्टा का मानना है कि 60% साफ़ बिजली क्षमता वर्तमान योजनाओं से 2030 से पहले ही हासिल हो जाएगी, यानी यह लक्ष्य कमज़ोर है। भारत सरकार का पक्ष यह है कि लक्ष्य विकास और ऊर्जा सुरक्षा के साथ संतुलन में तय किए गए हैं, और NDC के अनुसार इनका एक हिस्सा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मदद पर निर्भर है। UNEP भी यह कहती है कि जिन देशों की जलवायु परिवर्तन में ज़्यादा ज़िम्मेदारी है, उन्हें सबसे तेज़ और बड़ी महत्वाकांक्षा दिखानी चाहिए।

ज़मीनी चुनौती सिर्फ़ क्षमता बनाने की नहीं, उसे इस्तेमाल करने की भी है। हमने भारत में सौर बिजली की बर्बादी वाले लेख में देखा कि बनी हुई साफ़ बिजली ग्रिड की दिक्कतों से रुक भी रही है। इसी तरह रिपोर्ट के रास्ते में मीथेन कटौती भी शामिल है, और दून घाटी की आर्द्रभूमियों में मीथेन उत्सर्जन पर हमारा पुराना लेख दिखाता है कि यह स्रोत कितना स्थानीय और अनदेखा हो सकता है।

जो अभी पता नहीं

  • तापमान गिरने के दौर में जलवायु कैसी दिखेगी, यह UNEP खुद अज्ञात मानता है। समुद्र और बर्फ़ की चादरें बहुत धीमे बदलती हैं, इसलिए जमा हुई गर्मी तुरंत नहीं जाती।
  • क्षेत्रीय बारिश के पूर्वानुमान WMO के पाँच साल के अपडेट में अपेक्षाकृत कम भरोसेमंद माने गए हैं (एक सारांश के अनुसार)। मानसून पर सीधा भविष्य-दावा इसलिए हम नहीं करते।
  • नए CDR तरीके बढ़ेंगे या नहीं, अनिश्चित है: State of CDR रिपोर्ट के अनुसार हाल के वर्षों में योजनाबद्ध नई CDR क्षमता का केवल लगभग 20% ही चालू हो पाया।
  • भारत के लिए अलग ओवरशूट-विश्लेषण: हमने रिपोर्ट के सार और प्रेस सामग्री देखी है। पूरी रिपोर्ट में भारत पर अलग आँकड़े हो सकते हैं, जिन्हें हम यहाँ नहीं बता रहे।

तो हिसाब क्या बैठा

1.5°C पार होगा, यह अब चर्चा का विषय कम, तैयारी का विषय ज़्यादा है। बहस अब इस पर है कि शिखर कितना ऊँचा और कितना लंबा होगा। यही अंतर तय करेगा कि भारत में आने वाले सालों में बारिश, गर्मी और बाढ़ का बोझ कितना भारी रहेगा।

स्रोत: UNEP, WMO, Met Office, State of CDR 2026, Carbon Brief, IMD, CSE (State of India's Environment 2026), PIB, Down To Earth, Greenpeace, UNSW, Eos

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