30 सितंबर 2026 को केंद्र सरकार ने नेशनल कोस्टल मिशन (NCM) 2.0 की गाइडलाइंस जारी कीं। 2021-22 से 2025-26 तक चले NCM 1.0 का बजट सिर्फ ₹87 करोड़ था, नए चरण NCM 2.0 में यह बढ़कर ₹767 करोड़ हो गया है, यानी करीब साढ़े आठ गुना। यह पैसा 2030-31 तक भारत के 9 तटीय राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में खर्च होगा।

क्या हुआ: NCM 2.0 की गाइडलाइंस में है क्या?

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने नई दिल्ली में NCM 2.0 की इंप्लीमेंटेशन गाइडलाइंस लॉन्च कीं। यह एक केंद्रीय क्षेत्र योजना (Central Sector Scheme) है, जो पूरी तरह केंद्र सरकार के बजट से चलेगी, राज्यों को अंशदान नहीं करना होगा।

योजना को पांच थीम में बांटा गया है: जलवायु-सहनशील ब्लू इकोनॉमी विकास, तटीय संवेदनशीलता और जोखिम घटाना, जलवायु अनुकूलन (साथ में मिटिगेशन के फायदे), क्षमता निर्माण और जागरूकता, और परियोजना प्रबंधन से जुड़ी पुरानी देनदारियां।

  • तटीय इलाकों का जोखिम आकलन (vulnerability assessment)
  • मैंग्रोव, कोरल रीफ और वेटलैंड जैसे तंत्रों की बहाली
  • प्रदूषण प्रबंधन और जैवविविधता संरक्षण
  • टिकाऊ पर्यटन और स्पेशल प्लानिंग

गाइडलाइंस में 'whole-of-government' तरीके पर ज़ोर दिया गया है, यानी अलग-अलग मंत्रालय और एजेंसियां अलग-थलग काम करने की बजाय एक साझा ढांचे में काम करेंगी, जिससे मंज़ूरी में देरी कम हो और ज़िम्मेदारी साफ रहे।

योजना में शामिल 9 राज्य हैं गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल, साथ में अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल हैं। यानी देश की लगभग पूरी तटरेखा इस योजना के दायरे में आती है।

NCM 1.0 से NCM 2.0 तक: बजट और दायरा कैसे बदला?

NCM 1.0NCM 2.0
अवधि2021-22 से 2025-262025-26 से 2030-31
कुल बजट₹87 करोड़₹767 करोड़
फोकसमुख्यतः संरक्षण, शोध, क्षमता निर्माणब्लू इकोनॉमी, रिस्क रिडक्शन, whole-of-government ढांचा

यह हमारा हिसाब है, कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं: ₹767 करोड़ को 13 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों में बराबर बांटें तो औसतन करीब ₹59 करोड़ प्रति राज्य/UT बनता है, छह साल में। असल बंटवारा वल्नरेबिलिटी और प्रोजेक्ट के हिसाब से अलग-अलग होगा, पर यह आंकड़ा बताता है कि पैमाना अब भी बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं जितना बड़ा नहीं है, भले ही आठ गुना बढ़ोतरी हुई हो।

यह ज़रूरी क्यों है?

भारत की तटरेखा करीब 7,500 किलोमीटर लंबी है, जिसके सहारे करोड़ों लोग मछली पालन, पर्यटन और बंदरगाह जैसी गतिविधियों से जुड़े हैं। समुद्र सिर्फ गर्म नहीं हो रहा, समुद्र के पानी में बदलाव भी हो रहे हैं, जो मछली और कोरल जैसे तंत्रों को सीधा प्रभावित करता है।

लंबे समय में समुद्र का स्तर बढ़ने का खतरा भी बना हुआ है, जो 1.5°C की सीमा पार होने की बड़ी तस्वीर से जुड़ा है। ऐसे हालात में बिना योजना के तटीय निर्माण होता रहे, तो मैंग्रोव और वेटलैंड जैसी प्राकृतिक सुरक्षा दीवारें ही गायब हो जाती हैं, और तूफान व समुद्री लहरों से बचाव कमज़ोर पड़ता जाता है।

ब्लू इकोनॉमी का मतलब और भारत के लिए मौका

ब्लू इकोनॉमी का मतलब है समुद्र और तटीय संसाधनों का टिकाऊ तरीके से इस्तेमाल, जिससे रोज़गार और आर्थिक विकास दोनों मिले, बिना संसाधनों को खत्म किए। मंत्री के मुताबिक राष्ट्रीय ध्वज के बीच का चक्र नीली इकोनॉमी की बड़ी संभावना का प्रतीक भी माना जा सकता है, और इसे विकसित भारत 2047 के लक्ष्य से जोड़ा गया है।

यह योजना सागरमाला जैसी पहले से चल रही बंदरगाह-केंद्रित योजनाओं के साथ मिलकर काम करेगी, ताकि आर्थिक विकास और पारिस्थितिकी संरक्षण साथ-साथ चलें, न कि एक-दूसरे के खिलाफ। मछली पालन, समुद्री पर्यटन और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में रोज़गार के नए मौके बनने की उम्मीद जताई जा रही है।

भारत जैसे देश के लिए, जहां तटीय ज़िलों में करोड़ों लोग रहते हैं, यह मौका इसलिए भी अहम है क्योंकि सही तरीके से किया गया निवेश लंबे समय में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को भी घटा सकता है, मैंग्रोव जैसे तंत्र प्राकृतिक दीवार का काम करते हैं।

किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा?

एक चेतावनी बार-बार दोहराई जा रही है: तटीय विकास में मैंग्रोव, कोरल रीफ, रेत के टीलों और वेटलैंड को खाली ज़मीन समझकर निर्माण नहीं होना चाहिए। असल नतीजे राज्यों के क्रियान्वयन की गुणवत्ता और स्थानीय भागीदारी पर टिके होंगे, सिर्फ गाइडलाइंस जारी होने से नहीं।

'ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस' पर ज़ोर और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना भी एक चुनौती रहेगी, खासकर जब तटीय ज़मीन पर पर्यटन और उद्योग का दबाव लगातार बढ़ रहा हो। पिछली तटीय योजनाओं में भी मंज़ूरी में देरी और राज्यों के बीच समन्वय की कमी जैसी दिक्कतें सामने आती रही हैं।

तटीय क्षेत्रों में मछुआरा समुदायों की रोज़ी-रोटी सीधे समुद्र और तट की सेहत से जुड़ी है। अगर योजना सिर्फ कागज़ी मंज़ूरियों और बड़ी परियोजनाओं तक सीमित रह गई, तो स्थानीय समुदायों की आवाज़ नीति-निर्माण में कितनी शामिल होगी, यह भी देखने वाली बात होगी।

अभी क्या साफ नहीं है?

हर राज्य को कितना हिस्सा मिलेगा और किन परियोजनाओं को पहले मंज़ूरी मिलेगी, यह अभी सार्वजनिक गाइडलाइंस में साफ नहीं है। राज्यों को अपनी एक्शन प्लान जमा करनी होगी, उसके बाद ही असल फंड बंटवारे की तस्वीर साफ होगी। यह भी साफ नहीं कि 'ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस' के लिए बनाए गए तेज़ मंज़ूरी ढांचे में पर्यावरण जांच कितनी सख्त रहेगी।

आगे क्या देखें?

तटीय राज्यों की एक्शन प्लान और पहली परियोजनाओं की मंज़ूरी आने वाले महीनों में सामने आएगी। जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी को शोर-पावर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए हाल ही में अंतरराष्ट्रीय फाइनेंस कॉर्पोरेशन से करीब 70 मिलियन डॉलर मिले हैं, जिसे भारत के समुद्री क्षेत्र की पहली 'ब्लू फाइनेंसिंग' बताया जा रहा है। यह दिखाता है कि ब्लू इकोनॉमी में निवेश अब सिर्फ सरकारी बजट तक सीमित नहीं रह गया।

यह शोर-पावर सिस्टम बंदरगाह पर खड़े जहाज़ों को डीज़ल जेनरेटर की जगह बिजली से चलाने देता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन करीब 63% और हवा में प्रदूषण करीब 90% तक घट सकता है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या NCM 2.0 के तहत भी ऐसी निजी-सरकारी साझेदारी वाली परियोजनाएं सामने आती हैं।

NCM 2.0 कागज़ पर एक बड़ा कदम दिखता है, बजट आठ गुना बढ़ा है और दायरा भी। पर तटीय भारत के लिए असली फर्क तभी दिखेगा जब राज्यों की ज़मीन पर योजना, मंज़ूरी और निगरानी भी उतनी ही मज़बूत बने।

स्रोत: MoEFCC, PIB, Plutus IAS, GS Times

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