क्या रोज़ की low-dose aspirin डिमेंशिया से बचा सकती है? Dr Peter Fransquet के अनुसार पिछले trials में सबको साथ गिनने पर फ़ायदा नहीं दिखा था, पर उनकी Monash University वाली नई analysis में एक ख़ास जेनेटिक समूह में डिमेंशिया का जोखिम करीब 70% कम दिखा, और उसी समूह में गंभीर रक्तस्राव लगभग दोगुना रहा।

भारत के लिए यह ख़बर इसलिए मायने रखती है कि यहां 60 साल से ऊपर के करीब 88 लाख लोग डिमेंशिया के साथ जी रहे हैं। नीचे देखिए कि 70% का हिसाब क्या है, नतीजा कितना पक्का है, और भारतीय बुज़ुर्गों तक यह बात कहां तक पहुंचती है।

क्या मिला: ASPREE के जेनेटिक डेटा की नई जांच

Alzheimer’s & Dementia पत्रिका में 24 सितंबर 2026 को छपी इस analysis ने ASPREE trial (Aspirin in Reducing Events in the Elderly) के जेनेटिक डेटा को दोबारा खंगाला। Medical Republic के अनुसार 13,541 प्रतिभागी थे, औसत उम्र 75 साल, और करीब 4.6 साल की निगरानी में 345 लोगों को डिमेंशिया हुआ।

ASPREE में ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के स्वस्थ बुज़ुर्गों को रोज़ 100 mg aspirin या placebo दी गई थी। NIH के अनुसार पूरे trial में aspirin का डिमेंशिया या विकलांगता से मुक्त जीवन पर कोई असर नहीं दिखा। नई जांच का सवाल यह था कि क्या कुछ लोगों के जीन अलग असर तय करते हैं।

शोधकर्ताओं ने लोगों को platelet (रक्त-बिंबाणु) की संख्या से जुड़े जीन-स्कोर (polygenic score) के हिसाब से क्रम में रखा। Medical Republic के अनुसार ये स्कोर platelet की गिनती पर हुए जेनेटिक अध्ययनों से बने हैं, किसी की असली platelet-क्रिया को नापकर नहीं।

70% का हिसाब: हर 1,000 लोगों पर क्या बदला

Monash के अनुसार स्कोर के सबसे ऊपर के 20% लोगों में नतीजे ऐसे रहे:

मापदंडAspirin लेने वालेPlacebo लेने वाले
डिमेंशिया हुआ1.0%3.3%
गंभीर रक्तस्राव (major bleeding)4.4%2.1%

सीधा गणित है। 3.3% से 1.0% तक का फ़र्क़ 2.3 प्रतिशत अंक है, यानी इस वर्ग के हर 1,000 लोगों में करीब 23 कम डिमेंशिया के मामले। यही 70% की सापेक्ष (relative) कमी है। पर रक्तस्राव 2.1% से 4.4% हुआ, यानी उन्हीं 1,000 में करीब 23 ज़्यादा गंभीर रक्तस्राव।

Medical Republic के अनुसार शोधकर्ताओं ने यही बात प्रति 1,000 व्यक्ति-वर्ष में भी लिखी: करीब पांच डिमेंशिया-मामले कम और पांच गंभीर रक्तस्राव ज़्यादा। जोखिम के अनुपात (hazard ratio) डिमेंशिया के लिए 0.28 और रक्तस्राव के लिए 2.13 रहे।

यह नतीजा कितना पक्का है: चार सीमाएं

  • Medical Republic के अनुसार यह post hoc analysis है। लेखकों ने खुद इसे exploratory कहा और ज़ोर दिया कि असर की वजह अभी तय नहीं।
  • शोधकर्ताओं ने 5,182 जीन-स्कोर जांचे। गुणवत्ता-जांच के बाद 1,848 बचे, 112 में शुरुआती संकेत दिखा, और बहुगुणन-सुधार के बाद सिर्फ़ तीन आपस में जुड़े platelet-स्कोर टिके।
  • APOE जीन या Alzheimer’s से जुड़े स्कोर के साथ aspirin का कोई संबंध नहीं मिला, और इस समूह में कुल मृत्यु-दर में aspirin-placebo का फ़र्क़ नहीं दिखा।
  • NEJM के अनुसार ASPREE में वे लोग शामिल नहीं थे जिन्हें रक्तस्राव का ज्ञात ख़तरा था। इसलिए ऐसे लोगों पर यह डेटा कुछ नहीं कहता।

सबको साथ गिनने पर ASPREE में गंभीर रक्तस्राव aspirin समूह में 3.8% और placebo समूह में 2.8% रहा, Australian Pharmacist के अनुसार। संबंध दिखना और कारण साबित होना अलग बातें हैं; GLP-1 और नाखून वाली स्टडी भी इसी फ़र्क़ का उदाहरण थी।

भारत: 88 लाख मामले, पर इस स्टडी में कोई भारतीय नहीं

Alzheimer’s & Dementia में 2023 में छपे LASI-DAD अध्ययन के अनुसार भारत में 60 साल से ऊपर के 7.4% लोग डिमेंशिया के साथ जी रहे हैं, यानी करीब 88 लाख। यह दर महिलाओं में पुरुषों से और गांवों में शहरों से ज़्यादा पाई गई, और राज्यों के बीच काफ़ी अलग है।

ASPREE के प्रतिभागी सिर्फ़ ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से थे। ASPREE के शोधकर्ताओं ने अपने मुख्य नतीजों में आबादी को मुख्यतः श्वेत बताया, Australian Pharmacist के अनुसार। इसलिए भारतीय बुज़ुर्गों में यह जेनेटिक संकेत दिखेगा या नहीं, इसका अभी कोई आंकड़ा नहीं है।

भारत में डिमेंशिया-जोखिम के दूसरे पहलू, जैसे छुट्टी की और काम की शारीरिक गतिविधि का फ़र्क़, हमारे शारीरिक गतिविधि वाले लेख में हैं।

भारत के लिए मतलब: सस्ती दवा, पर जोखिम भी उतना ही

Fransquet के अनुसार अगर यह नतीजा टिक गया, तो aspirin का सस्ता और आसानी से उपलब्ध होना व्यक्तिगत डिमेंशिया-रोकथाम को सचमुच संभव बना सकता है।

हमारा आकलन है कि असली चुनौती दवा की कीमत नहीं, बिना जांच के इस्तेमाल होगी। आसानी से मिलने वाली गोली अपने मन से भी ली जा सकती है, जबकि फ़ायदा एक जेनेटिक समूह में दिखा और गंभीर रक्तस्राव का जोखिम उसी समूह में लगभग बराबर बढ़ा।

Fransquet ने साफ़ कहा कि सिर्फ़ इस स्टडी के आधार पर डिमेंशिया रोकने के लिए aspirin शुरू नहीं करनी चाहिए, ख़ासकर रक्तस्राव के बढ़े जोखिम को देखते हुए, और पहले डॉक्टर से बात करनी चाहिए। एक ही निदान में उपसमूह खोजने की यह सोच नई नहीं; डिप्रेशन के पांच दिमाग़ी रूप वाली स्टडी भी इसी दिशा में थी।

जो अभी पता नहीं: कारण, दोहराव और भारतीय आंकड़े

  • क्या यही नतीजा दूसरी आबादियों और दूसरे अध्ययनों में दोहराया जाएगा।
  • क्या platelet की संख्या ही असली कड़ी है, या कोई और जैविक रास्ता; Medical Republic के अनुसार असर की क्रियाविधि अनिश्चित है।
  • क्या दिमाग़ी फ़ायदा रक्तस्राव के बढ़े जोखिम से ज़्यादा है; लेखकों ने इन नतीजों से इलाज तय करने के ख़िलाफ़ चेताया है।
  • भारतीय आबादी में यह जेनेटिक संकेत कितना आम है, और क्या वहां वही असर दिखता है।

Medical Republic के अनुसार इस जेनेटिक समूह में placebo वालों में डिमेंशिया पूरे ASPREE समूह से ज़्यादा था। इससे संभावना बनती है कि बहुत ऊंची जेनेटिक platelet-गिनती ख़ुद भी जोखिम से जुड़ी हो। पर निरंतर platelet-स्कोर पूरे समूह में डिमेंशिया से सीधे नहीं जुड़ा।

आगे क्या देखें

  • इसी जेनेटिक वर्ग के लोगों के लिए अलग से बना trial, जिसकी ज़रूरत Fransquet ने बताई।
  • दूसरे अध्ययनों में पुष्टि। Medical Republic के अनुसार Fransquet ने पहले इसी की ज़रूरत बताई।

फ़िलहाल aspirin वही साधारण गोली है जो वह पहले थी, जिसके साथ रक्तस्राव का जोखिम जुड़ा रहता है। इस स्टडी ने बस एक नया सवाल रखा है कि क्या जीन तय कर सकते हैं कि किसे फ़ायदा होगा। जवाब के लिए दूसरे समूह और सीधा trial चाहिए।

तब तक 70% को एक ही जेनेटिक समूह का सापेक्ष आंकड़ा पढ़ना चाहिए, जिसके साथ गंभीर रक्तस्राव का उतना ही बढ़ा जोखिम जुड़ा है।

स्रोत: Monash University, Alzheimer’s & Dementia, Medical Republic, NIH, NEJM, Australian Pharmacist