क्लीनिक में दो मरीज़ों को एक जैसा 'डिप्रेशन' बताया जा सकता है। एक को थेरेपी से फायदा होता है, दूसरे को उतना नहीं। डॉक्टर अक्सर इसे दवा या थेरेपी के फर्क पर टाल देते हैं, पर University of Helsinki की एक नई स्टडी कहती है कि शायद वजह उनके दिमाग के अंदर ही छिपी है।

यह सिर्फ इलाज के तरीके का फर्क नहीं है; यह इस बात का संकेत है कि एक ही नाम के पीछे दिमाग में अलग-अलग कहानियां चल रही हो सकती हैं, जिन्हें अभी तक एक ही खांचे में डाल दिया जाता था।

डिप्रेशन को एक ही बीमारी मानना अब तक आम क्यों था

डिप्रेशन का पता क्लीनिक में लक्षणों की एक तय सूची से चलता है, न कि किसी स्कैन या खून की जांच से। इसी वजह से अलग-अलग मरीज़ों को एक ही नाम दे दिया जाता था, भले ही उनके लक्षण और दिमाग के भीतर का हाल अलग हो।

इससे पहले भी दिमाग पर हुई कई स्टडी एक-दूसरे से उलटे नतीजे देती रही थीं, कुछ में connectivity बढ़ी मिलती थी, कुछ में घटी। इसे अब तक सिर्फ स्टडी के तरीके का फर्क माना जाता था।

दुनिया भर में करोड़ों लोग डिप्रेशन से जूझते हैं, और थेरेपी के असर न दिखने को अक्सर मरीज़ की अपनी हालत या दवा की खुराक पर टाल दिया जाता था, दिमाग की बुनियादी बनावट पर कम। इसी वजह से एक ही इलाज कुछ मरीज़ों पर काम करता और कुछ पर नहीं, बिना किसी साफ वजह के।

University of Helsinki की नई स्टडी में क्या मिला

Satu Palva और Wenya Liu की टीम ने 263 डिप्रेशन के मरीज़ों और 75 स्वस्थ लोगों के दिमाग की गतिविधि magnetoencephalography (MEG) से मापी। Neuroscience News के अनुसार MEG मिलीसेकंड के स्तर पर दिमाग की बिजली जैसी गतिविधि पकड़ सकता है, जो बाकी कई तरीकों से संभव नहीं।

टीम ने खासतौर पर यह देखा कि दिमाग के अलग-अलग हिस्सों के बीच बिजली जैसी लहरें कितनी तालमेल से चलती हैं, जिसे functional connectivity कहा जाता है। फिर कंप्यूटर आधारित तरीके से मरीज़ों को उनके पैटर्न के हिसाब से समूहों में बांटा गया।

Nature Mental Health journal में अगस्त 2026 में प्रकाशित नतीजों के अनुसार डिप्रेशन के मरीज़ों में एक नहीं, बल्कि पांच अलग तरह के functional connectivity पैटर्न मिले, यानी दिमाग के अलग हिस्सों के बीच संकेतों के आने-जाने के पांच अलग तरीके।

यह पांच अलग पैटर्न आखिर हैं क्या

News-Medical के अनुसार एक समूह में दिमाग के हिस्सों के बीच सामान्य से ज़्यादा मज़बूत connectivity मिली, जो ज़्यादा गंभीर नशे की लत (substance abuse) से जुड़ी थी। दूसरे समूह में connectivity कमज़ोर मिली, जहां PTSD जैसे लक्षण ज़्यादा उभरे हुए थे।

यानी एक ही 'डिप्रेशन' के नाम के पीछे कभी-कभी दिमाग में बिल्कुल उलटी दिशा के बदलाव हो रहे थे। शोधकर्ता फिलहाल इन्हें 'संभावित' (candidate) पैटर्न कहते हैं, क्योंकि इन्हें और बड़े समूहों पर दोबारा जांचने की ज़रूरत है।

एक और समूह में मरीज़ों के लक्षण बेहद गंभीर थे, जैसे तेज़ डिप्रेशन, चिंता और लगातार नकारात्मक सोच, पर उनका connectivity पैटर्न बाकी गंभीर समूहों से भी अलग निकला। यानी सिर्फ लक्षणों की गंभीरता देखकर भी दिमाग की असली तस्वीर पूरी तरह समझ में नहीं आती।

यह खोज पुरानी उलझी हुई रिसर्च को कैसे समझाती है

Psychology Today के अनुसार अगर पहले की स्टडी में एक समूह ज़्यादा connectivity दिखाता था और दूसरा कम, और दोनों को एक साथ मिलाकर औसत निकाला जाता था, तो नतीजा धुंधला या एक-दूसरे का खंडन करता दिखता था। यह नई स्टडी बताती है कि गड़बड़ी तरीके में नहीं, बल्कि मरीज़ों को एक साथ मिलाने में थी।

दिमाग के अलग हिस्सों के बीच संकेत कैसे चलते हैं, इस पर हमारी एक पुरानी स्टोरी भी है, जहां दिमाग के दो हिस्सों की अलग बनावट के बारे में बताया गया था। दिमाग और शरीर के रिश्ते पर एक और एंगल हमारी शारीरिक गतिविधि वाली स्टोरी में भी मिलता है, जहां एक ही 'एक्सरसाइज़' नाम के पीछे अलग-अलग असर छिपे निकले थे।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है

National Mental Health Survey (NMHS) के अनुसार भारत में डिप्रेशन जैसी सामान्य मानसिक समस्याओं का treatment gap करीब 85% है, यानी हर 100 में से करीब 85 लोगों तक इलाज पहुंच ही नहीं पाता। WHO Mental Health Atlas के अनुसार भारत में प्रति लाख आबादी पर सिर्फ 0.75 मनोचिकित्सक हैं, जबकि WHO का सुझाया मानक 3 है।

हमें लगता है कि MEG जैसी महंगी, बारीक जांच का भारत के आम मानसिक स्वास्थ्य ढांचे तक पहुंचना अभी बहुत दूर की बात है।

पर यह रिसर्च लंबे समय में यह समझने में मदद कर सकती है कि किस मरीज़ के लिए कौन सी थेरेपी या दवा जल्दी असर करेगी, जिससे पहले से कम संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सके। जिस देश में हर मरीज़ को बार-बार डॉक्टर बदलने या महीनों इंतज़ार करने का मौका ही न हो, वहां पहली बार में सही इलाज चुनना कहीं ज़्यादा मायने रखता है।

अभी क्या पता नहीं, आगे क्या देखा जाएगा

  • यह पांच पैटर्न अभी 'संभावित' हैं; किसी और बड़े समूह पर दोबारा जांच के बाद ही इन्हें पूरी तरह पुख्ता माना जाएगा।
  • किसी खास पैटर्न वाले मरीज़ के लिए कौन सी थेरेपी या दवा बेहतर काम करेगी, यह अभी सीधे तौर पर टेस्ट नहीं हुआ है।
  • MEG जांच महंगी और सीमित जगहों पर ही उपलब्ध है, इसलिए आम क्लीनिक में इसका इस्तेमाल अभी संभव नहीं है।

टीम अब बड़े समूहों पर इन पैटर्न की पुष्टि करना चाहती है, और यह भी देखना चाहती है कि किसी मरीज़ का पैटर्न पहले से जान लेने से इलाज का फैसला बेहतर हो सकता है या नहीं। अगर यह साबित हो जाता है, तो आगे का कदम यह होगा कि MEG जैसी महंगी जांच के बिना भी, किसी सस्ते तरीके से मरीज़ का पैटर्न पहचाना जा सके।

यह लेख किसी को अपनी या किसी और की मानसिक स्थिति के बारे में कोई निदान या सलाह नहीं देता। यह सिर्फ एक रिसर्च के नतीजों का ब्योरा है। डिप्रेशन से जुड़ी किसी भी निजी चिंता के लिए किसी योग्य डॉक्टर या काउंसलर से बात करना ही सही रास्ता है।

स्रोत: Nature Mental Health, University of Helsinki, Neuroscience News, News-Medical