आम धारणा है कि शरीर जितना ज़्यादा हिलेगा-डुलेगा, दिमाग को उतना ही फायदा होगा। The Lancet Public Health में प्रकाशित 74 स्टडी के एक बड़े विश्लेषण ने इस धारणा को तोड़ दिया है। छुट्टी के वक्त की एक्सरसाइज़ से डिमेंशिया का खतरा घटा, पर काम के दौरान की शारीरिक मेहनत से यह बढ़ा हुआ मिला।

यह नतीजा खासतौर पर उन देशों के लिए मायने रखता है, जहां बड़ी आबादी हाथ से मेहनत करके रोज़ी कमाती है, जैसे भारत, जहां दफ्तर में बैठने वाली नौकरियां अभी भी अल्पसंख्या में हैं।

The Lancet की स्टडी में क्या मिला

Inside Precision Medicine के अनुसार इस विश्लेषण में कुल मिलाकर ऊंची शारीरिक सक्रियता को हर तरह के डिमेंशिया के 20% कम खतरे, Alzheimer's के 21% कम खतरे, और vascular dementia के 29% कम खतरे से जोड़ा गया। यह आंकड़ा अकेले देखने पर उत्साहजनक लगता है। पर जब टीम ने गतिविधि के प्रकार अलग-अलग करके देखा, तो तस्वीर पूरी तरह बदल गई।

सभी 74 स्टडी में शारीरिक सक्रियता को या तो लोगों के अपने बताए जवाब से मापा गया, या किसी पहनने वाले यंत्र से, और हर बार ज़्यादा सक्रिय समूह की तुलना कम सक्रिय या निष्क्रिय समूह से की गई।

चार तरह की गतिविधि की तुलना

गतिविधि का प्रकारडिमेंशिया के खतरे पर असर
छुट्टी के वक्त की एक्सरसाइज़ (खेल, डांस, जिम)24% कम खतरा
घर के काम (housework)15% कम खतरा (सिर्फ 1 स्टडी पर आधारित)
नौकरी/काम की शारीरिक मेहनत20% ज़्यादा खतरा
पैदल या साइकिल से रोज़ आना-जाना (commuting)10% ज़्यादा खतरा

The Conversation के अनुसार एक अलग UK Biobank स्टडी में पहनने वाले डिवाइस से नापा गया कि हफ्ते में सिर्फ 35 मिनट से कम तेज़ गतिविधि भी बिना किसी एक्सरसाइज़ के मुकाबले 41% कम खतरे से जुड़ी थी। ज़्यादा तेज़ एक्सरसाइज़, जिसमें सांस फूलने लगे और बात करना मुश्किल हो, 63% तक कम खतरे से जुड़ी मिली।

एक और लंबी स्टडी, English Longitudinal Study of Ageing, ने 17 साल तक लोगों को ट्रैक करके भी यही पैटर्न पाया कि जितने ज़्यादा लोग सक्रिय रहे, उतना ही उनका डिमेंशिया का खतरा कम निकला।

'Physical Activity Paradox' आखिर है क्या

शोधकर्ता इस उलटफेर को 'physical activity paradox' कहते हैं। The Conversation के अनुसार यह उलझन दिल की बीमारी की रिसर्च में पहले से दर्ज है: काम के दौरान की मेहनत छुट्टी की एक्सरसाइज़ जैसा फायदा नहीं देती, और कभी-कभी खतरा बढ़ा भी देती है।

The Conversation के अनुसार छुट्टी की एक्सरसाइज़ दिमाग को कई तरीकों से फायदा पहुंचा सकती है: यह दिल और खून की नलियों को बेहतर रखती है, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल को काबू में रखने में मदद करती है, और मांसपेशियां ऐसे अणु छोड़ती हैं जो सूजन घटाते हैं और नई दिमागी कोशिकाओं को बढ़ने में मदद करते हैं।

दिमाग की बनावट और उसके अलग-अलग हिस्सों के काम करने के तरीके पर हमारी एक पुरानी स्टोरी भी है, जहां यह समझाया गया था कि दिमाग के अलग हिस्से अलग तरह के संकेतों पर अलग तरह से जवाब देते हैं।

तो मेहनत करने वालों को खतरा ज़्यादा क्यों दिखा

Inside Precision Medicine के अनुसार शोधकर्ताओं ने साफ कहा है कि नतीजों का मतलब यह नहीं है कि शारीरिक मेहनत खुद डिमेंशिया की वजह है। मेहनत वाली नौकरियां अक्सर कम आय, लंबे समय का तनाव, प्रदूषण, हवा-शोर और काम पर कम आज़ादी जैसी चीज़ों से जुड़ी होती हैं, और यही असली वजह हो सकती हैं।

यानी यह ज़रूरी नहीं कि भारी बोझ उठाना या खेतों में काम करना खुद दिमाग को नुकसान पहुंचाता हो; हो सकता है कि इसके साथ जुड़ी ज़िंदगी की बाकी मुश्किलें ज़्यादा भूमिका निभा रही हों। शोधकर्ताओं का कहना है कि कम आय वाले देशों में इस पर और रिसर्च की सख्त ज़रूरत है।

इसे एक आसान उदाहरण से समझें: दो लोग दिन में बराबर समय तक शरीर से मेहनत कर सकते हैं, एक जिम में अपनी मर्ज़ी से, दूसरा ईंट उठाते हुए बिना छुट्टी के दबाव में। शरीर की मेहनत बराबर दिख सकती है, पर मन की हालत और ज़िंदगी के हालात बिल्कुल अलग होते हैं, और शायद यही असली फर्क दिमाग पर असर डालता है, न कि मेहनत खुद।

भारत के लिए मतलब: 90% वर्कफोर्स अनौपचारिक मेहनत में

भारत के मामले में यह सवाल सिर्फ एक दिलचस्प रिसर्च नहीं है। भारत के करीब 56.5 करोड़ के वर्कफोर्स में से लगभग 90% अनौपचारिक क्षेत्र में काम करता है, जिसमें खेती, निर्माण और बिना लिखित कॉन्ट्रैक्ट वाली मेहनत का बड़ा हिस्सा शामिल है।

Longitudinal Aging Study in India (LASI) के अनुसार 60 साल से ऊपर के भारतीयों में डिमेंशिया दर 7.4% है, यानी करीब 88 लाख बुज़ुर्ग इससे जूझ रहे हैं, और 2036 तक यह संख्या करीब 1.69 करोड़ तक पहुंच सकती है।

हमारा आकलन है कि इतनी बड़ी अनौपचारिक मेहनत वाली आबादी को देखते हुए, भारत में भी यह समझना ज़रूरी होगा कि असली जोखिम शारीरिक मेहनत से है, या उसके साथ आने वाली गरीबी और तनाव जैसी परिस्थितियों से। यह फर्क समझना नीतियां बनाने के लिए भी अहम होगा, क्योंकि दोनों सूरतों में जवाब बिल्कुल अलग होगा।

अभी क्या पता नहीं, आगे क्या देखा जाएगा

  • घर के काम वाला 15% का आंकड़ा सिर्फ एक स्टडी पर आधारित है, इसलिए इसे अभी पूरी तरह पुख्ता नहीं माना जा सकता।
  • कम आय वाले देशों से अभी बहुत कम डेटा है; शोधकर्ता मानते हैं कि इस पर और रिसर्च ज़रूरी है।
  • हर तरह की शारीरिक मेहनत वाली नौकरी एक जैसी नहीं होती; किस तरह का काम ज़्यादा जोखिम वाला है, यह अभी साफ नहीं है।
  • भारत जैसे देशों के अपने डेटा से यह पैटर्न कितना मेल खाता है, इसकी अभी कोई बड़ी स्टडी नहीं हुई है।

बुढ़ापे और शरीर से जुड़ी कई और धारणाएं भी पूरी तरह सच नहीं निकलती, जैसा हमारी उम्र बढ़ने से जुड़ी एक और स्टोरी में भी देखा गया था।

यह लेख किसी को अपनी नौकरी बदलने या कोई खास एक्सरसाइज़ अपनाने की सलाह नहीं देता, यह सिर्फ एक स्टडी के नतीजों का ब्योरा है। इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि 'ज़्यादा हिलना-डुलना हमेशा बराबर फायदा देता है' मानना अब आसान नहीं रहा, क्योंकि यह किस हालात में हो रहा है, यह भी उतना ही मायने रखता है।

स्रोत: The Lancet Public Health, The Conversation, Inside Precision Medicine, LASI

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