आपके सिर के अंदर एक दिमाग नहीं, बल्कि व्यवहार में दो अलग अंग बैठे हैं, जो शुरुआत से अलग-अलग कोशिकाओं से बनते हैं और कभी आपस में मिलते नहीं। Stanford Medicine के शोधकर्ताओं ने Nature Neuroscience में 18 सितंबर 2026 को यही दिखाया।
दशकों से माना जाता था कि पूरा दिमाग एक ही मूल कोशिका से निकलता है। यह नई स्टडी उस पुरानी सोच को पलट देती है।
गर्भ में यह फैसला कब और कैसे होता है
टीम ने भ्रूण के सबसे शुरुआती दौर, गैस्ट्रुलेशन (gastrulation) चरण को बारीकी से देखा। Stanford Medicine के अनुसार इसी दौर में तय हो जाता है कि दिमाग का कौन सा हिस्सा किस कोशिका से बनेगा, यह फैसला बाकी शरीर के आकार लेने से भी पहले हो जाता है।
शोधकर्ता Carolyn Dundes और Rayyan Jokhai ने दो अलग तरह की मूल कोशिकाएं पहचानी। Otx2 जीन रखने वाली कोशिका आगे का हिस्सा यानी forebrain-midbrain बनाती है, जबकि Gbx2 जीन वाली कोशिका पिछला हिस्सा यानी hindbrain बनाती है। यह दोनों शुरुआत से ही कभी आपस में मिलती नहीं।
जन्म से पहले दिमाग किस तरह आकार लेता है, इस पर हमारी एक पुरानी स्टोरी जन्म से पहले दिमाग के विकास पर नई खोज में भी है। नई स्टडी बताती है कि यह विकास सिर्फ एक रास्ते पर नहीं, बल्कि शुरू से ही दो अलग रास्तों पर चलता है।
DNA की पैकिंग ने पूरा राज खोला
सिर्फ जीन अलग होना काफी सबूत नहीं था; टीम ने कोशिकाओं के भीतर DNA की पैकिंग यानी क्रोमैटिन (chromatin) की जांच की। क्रोमैटिन तय करता है कि कोशिका में कौन से जीन खुले हुए हैं और कौन से बंद बॉक्स में बंद हैं।
आगे और पीछे वाले हिस्से की कोशिकाओं में क्रोमैटिन की सेटिंग पूरी तरह अलग निकली। यह लगभग वैसा है जैसे एक ही इमारत में दो अलग दुकानें हों, एक ही मुख्य दरवाजे से अंदर आती हों, पर हर दुकान की अपनी अलमारी और अपनी चाबी हो — एक दुकान दूसरी का माल कभी नहीं छू सकती।
Kyle Loh के अनुसार इसलिए आगे के हिस्से की कोशिका को पीछे के हिस्से की कोशिका में बदलने की पुरानी कोशिशें दशकों से नाकाम रहीं। क्रोमैटिन की यह तालाबंदी उन्हें कभी रास्ता ही नहीं देती थी।
लैब में बनी हिंदब्रेन की नई तरह की कोशिका
इसी समझ से टीम ने इंसानी pluripotent स्टेम कोशिका, यानी शरीर की कोई भी कोशिका बन सकने वाली कोशिका, को सीधे हिंदब्रेन मोटर न्यूरॉन में बदल दिया। यह अपनी तरह का पहला सफल प्रयोग था।
लैब में बनी इन कोशिकाओं में असली हिंदब्रेन कोशिका जैसे गुण दिखे: बिजली की लहरें यानी action potentials चलीं, और चेहरे व निगलने वाली मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाले प्रोटीन भी बने।
दिमाग जैसी बनावट को कंप्यूटर हार्डवेयर में उतारने पर भी काम चल रहा है; हमारी Brain जैसी नई Chip वाली स्टोरी में यह पढ़ा जा सकता है। पर यह स्टडी उलटी दिशा में है — यहां असली हिंदब्रेन कोशिका ही लैब में उगाई गई है।
जेलीफ़िश से मुर्गी तक: 55 करोड़ साल का सुराग
टीम ने यही दो-मूल पैटर्न मुर्गी, ज़ेब्राफिश और एकॉर्न वर्म (acorn worm, समुद्र तल पर रहने वाला कीड़ा) में भी खोजा। ये सभी जीव अलग-अलग समय पर इंसान से अलग हुए, फिर भी पैटर्न एक जैसा निकला।
| जीव | क्या मिला |
|---|---|
| चूहा, मुर्गी, ज़ेब्राफिश, एकॉर्न वर्म | वही दो अलग मूल कोशिका वाला पैटर्न |
| जेलीफ़िश | शरीर के दो सिरों पर दो अलग नर्वस सिस्टम; इंसान से करीब 60-70 करोड़ साल पहले अलग हुई |
Kyle Loh के अनुसार evolution ने दो पुराने नर्वस सिस्टम को स्पेस में साथ धकेल दिया, आपस में जोड़ा नहीं। जीवन के करीब 50 करोड़ साल पहले के दूसरे पुराने रिश्ते भी अजीब निकले हैं — हमारी 500 Million साल पुरानी Symbiosis वाली स्टोरी में एक और उदाहरण मिलेगा।
भारत के लिए मतलब: SMA, ALS और भूख की दवा का कनेक्शन
हिंदब्रेन की कोशिकाएं टूटने से दो गंभीर बीमारियां होती हैं: स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी (SMA) और ALS। JSS Hospital की जानकारी के अनुसार भारत में SMA का अनुमान करीब 1 में 7,000 से 10,000 जन्मों के बीच है, जबकि दुनिया भर में यह आंकड़ा करीब 1 में 10,000 है।
अभी तक जिंदा मरीज़ के ब्रेनस्टेम से टिश्यू निकालना नामुमकिन था, इसलिए रिसर्च अटकी रहती थी। लैब में बनी हिंदब्रेन कोशिका भारत जैसे देशों की लैब्स को भी यह बीमारी करीब से समझने का एक रास्ता देती है — हमारा आकलन है कि इससे आगे शोध की लागत भी कुछ घटेगी।
एक दिलचस्प जोड़: हिंदब्रेन में भूख को नियंत्रित करने वाला हिस्सा भी है, और सेमाग्लूटाइड (semaglutide) जैसी वज़न घटाने वाली दवाएं ठीक इसी हिस्से पर काम करती हैं। यानी यह रिसर्च मोटापे की दवाओं को समझने में भी मदद कर सकती है।
जो अभी साफ नहीं
- यह स्टडी चूहे, मुर्गी, ज़ेब्राफिश और एकॉर्न वर्म पर हुई है; जिंदा इंसानी भ्रूण पर सीधा टेस्ट नहीं हुआ, क्योंकि यह कानूनी और नैतिक तौर पर मुमकिन नहीं है।
- स्पाइनल कॉर्ड यानी रीढ़ की हड्डी के अंदर की नस किस मूल कोशिका से बनती है, यह अभी साफ नहीं है।
- लैब में बनी हिंदब्रेन कोशिका से SMA या ALS ठीक हो जाएगी, यह दावा अभी नहीं किया जा सकता — यह सिर्फ बीमारी समझने का नया औज़ार है, इलाज नहीं।
दिमाग के दो हिस्सों से जुड़े सीधे सवाल
क्या यह खोज पूरी तरह इंसान पर हुई?
नहीं। मुख्य प्रयोग चूहे के भ्रूण पर हुआ, फिर इंसानी स्टेम कोशिका को लैब में हिंदब्रेन न्यूरॉन में बदला गया। यह इंसानी भ्रूण पर सीधा प्रयोग नहीं है।
क्या अब ALS या SMA ठीक हो सकेगी?
अभी नहीं। यह खोज बीमारी को समझने और लैब में टेस्ट करने का नया रास्ता खोलती है, दवा या इलाज इसका सीधा नतीजा नहीं है।
क्या हमारा दिमाग हमेशा से दो हिस्सों में बंटा था?
स्टडी के मुताबिक हां, कम से कम 55 करोड़ साल से यह बंटवारा नज़र आता है, यानी दिमाग बनने की शुरुआत से ही यह दो अलग टुकड़ों में था।
अगली रिसर्च में क्या देखा जाएगा?
टीम स्पाइनल कॉर्ड की मूल कोशिका का पता लगाना चाहती है, और यह भी देखना चाहती है कि SMA-ALS में हिंदब्रेन की कोशिकाएं ठीक-ठीक कैसे टूटती हैं।
तो अगली बार जब कोई कहे 'अपने दिमाग से सोचो', याद रखिए कि सिर के अंदर असल में दो पुरानी, अलग-अलग टीमें बैठी हैं, जो लाखों साल से साथ काम कर रही हैं। और अब वैज्ञानिकों के पास इन दोनों को अलग-अलग समझने का पहला मौका है।
स्रोत: Stanford Medicine, Nature Neuroscience, ScienceDaily