अल-नीनो 2026-27 अब तक के सबसे तेज़ मौसमी बदलावों में से एक बनता दिख रहा है, और यह नवंबर 2026 से 2027 की शुरुआत तक भारत में असर डाल सकता है। WMO के मुताबिक 2015-16 का अल-नीनो 'बहुत तेज़' (very strong) श्रेणी में था, इस बार भी वैसी ही तीव्रता का अनुमान है। फर्क सिर्फ यह है कि धरती अब उससे भी ज़्यादा गर्म हो चुकी है। यही वजह है कि भारत के 188 वैज्ञानिकों ने मिलकर एक चेतावनी जारी की है।

यह अल-नीनो पिछले सुपर इवेंट्स से कितना अलग है?

WMO ने अगस्त 2026 के अपडेट में कहा कि अल-नीनो अब पूरी तरह बन चुका है और सितंबर-नवंबर 2026 तथा दिसंबर 2026-फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना लगभग 100% है। WMO के अनुसार यह साल के आखिर तक 'बहुत तेज़' श्रेणी में पहुंच सकता है।

गौर करने वाली बात यह है कि WMO अपने आधिकारिक वर्गीकरण में weak, moderate, strong और very strong श्रेणियां ही इस्तेमाल करता है। 'सुपर एल-नीनो' शब्द उसके सिस्टम में नहीं है, यह टैग ज़्यादातर मीडिया और शोधकर्ता समुदाय में चलता है।

BBC साइंस फोकस से बात करते हुए यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बानी के वैज्ञानिक पॉल राउंडी ने कहा कि इस घटना के अब तक के रिकॉर्ड में सबसे तेज़ बनने की संभावना करीब 50% है। अलजज़ीरा को दिए बयान में विशेषज्ञों ने बताया कि धरती पहले से पूर्व-औद्योगिक स्तर से लगभग 1.4°C गर्म है, इसलिए इस बार असर पहले से अलग हो सकते हैं।

भारत में मौसम और मॉनसून पर क्या असर पड़ेगा?

थीप्रिंट को दी रिपोर्ट के मुताबिक, यह अल-नीनो भारत में नवंबर 2026 से 2027 की शुरुआत तक असर दिखा सकता है, जिसमें भीषण गर्मी और कमज़ोर मॉनसून की जोड़ी शामिल है।

WMO के जुलाई-सितंबर 2026 के सीज़नल अपडेट में भारतीय उपमहाद्वीप और भूमध्यरेखीय हिंद महासागर के ऊपर सामान्य से कम बारिश का अनुमान दिया गया था, जबकि ज़्यादातर ज़मीनी इलाकों में तापमान ऊंचा रहने का संकेत है।

यहां एक पेंच है: WMO के जुलाई अपडेट में हिंद महासागर में पॉज़िटिव IOD (Indian Ocean Dipole) फेज़ बनने का भी अनुमान लगाया गया, जो कई बार मॉनसून पर एल-नीनो के असर को थोड़ा संतुलित कर देता है। इसलिए अंतिम असर सिर्फ अल-नीनो की ताकत से तय नहीं होगा।

समुद्र, कोरल रीफ और जंगलों को कितना खतरा है?

इंडिया इकोलॉजी कलेक्टिव की 16 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, यह अल-नीनो समुद्री हीटवेव, कोरल रीफ को नुकसान, सूखा, आग और जंगली जानवरों के व्यवहार व प्रवास के तरीकों में बदलाव ला सकता है।

  • समुद्री हीटवेव और कोरल ब्लीचिंग का खतरा
  • सूखे इलाकों में जंगलों में आग लगने की आशंका बढ़ना
  • कुछ इलाकों में सूखा, तो कुछ में असामान्य बारिश
  • जानवरों के प्रजनन और प्रवास के मौसम में बदलाव

रिपोर्ट के मुताबिक ये असर तटीय, मीठे पानी और ज़मीनी तीनों तरह के तंत्रों (ecosystems) पर पड़ सकते हैं, पर हर जगह की तीव्रता अलग-अलग होगी। इसी वजह से वैज्ञानिक इसे अभी से दर्ज करना चाहते हैं।

188 भारतीय वैज्ञानिकों ने चेतावनी क्यों दी?

ज़ेनोडो (Zenodo) प्लेटफॉर्म पर 16 सितंबर 2026 को प्रकाशित 'Call to Ecologists' दस्तावेज़ पर 70 से ज़्यादा संस्थानों के 188 वैज्ञानिकों, संरक्षणवादियों और शोधकर्ताओं ने दस्तखत किए हैं।

नेचर कंज़र्वेशन फाउंडेशन के समुद्री जीव विज्ञानी रोहन आर्थर ने थीप्रिंट को बताया कि पिछले तीस साल में कई अल-नीनो देख चुके होने के बावजूद, भारत के पास इस बात का ठोस डेटा नहीं है कि यह घटना प्राकृतिक तंत्रों और उन पर निर्भर समुदायों को कैसे प्रभावित करती है।

दस्तावेज़ में मौसम केंद्रों की मरम्मत, तापमान-बारिश जैसे स्थानीय डेटा जुटाने, अलग-अलग जगहों की स्टडी को आपस में जोड़ने और सैटेलाइट व ज़मीनी डेटा दोनों के इस्तेमाल की अपील की गई है। मकसद है कि सरकार और फंडिंग एजेंसियां भी इसमें साथ दें।

भारत के लिए इसका मतलब क्या है?

भारत के लिए चुनौती और मौका दोनों साथ-साथ हैं। चुनौती यह कि गर्मी और कमज़ोर मॉनसून की जोड़ी खेती, पानी की सप्लाई और गर्मी से जुड़ी सेहत पर दबाव बढ़ा सकती है। मौका यह कि वैज्ञानिकों की अपील मौसम केंद्रों और मॉनिटरिंग नेटवर्क को अभी से मज़बूत करने का रास्ता खोलती है।

अपील में साफ कहा गया है कि डेटा जुटाने का काम घटना खत्म होने के बाद नहीं, बल्कि अभी शुरू करना है, ताकि इस बार मौका न छूटे और अगली बार के लिए भी तुलना का आधार मिल सके।

अभी वैज्ञानिकों को क्या नहीं पता?

थीप्रिंट की रिपोर्ट खुद कहती है कि सतह के समुद्री तापमान में मई 2026 में सामान्य से 0.5°C ज़्यादा बढ़ोतरी दर्ज हुई थी, और आगे यह बढ़कर 4°C तक पहुंचने का अनुमान है। वैज्ञानिक इसे अभी सिर्फ अनुमान (prediction) मानते हैं, पक्का पूर्वानुमान (forecast) नहीं।

यह हमारा आकलन है, कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं: WMO अपने सिस्टम में very strong श्रेणी के लिए करीब 2°C से ऊपर की सीमा मानता है। अगर अनुमानित 4°C तक बात पहुंचती है, तो यह उस सीमा से करीब दोगुना होगा, यानी यह घटना सामान्य very strong वर्गीकरण से भी ऊपर जा सकती है।

यह भी साफ नहीं कि किसी एक इलाके में कितना असर होगा। WMO खुद कहता है कि घटना की ताकत से असर की मात्रा तय नहीं होती, वह इलाके, मौजूदा हालात और तैयारी पर भी निर्भर करती है।

आगे किन बातों पर नज़र रखनी चाहिए?

WMO हर महीने अपना Global Seasonal Climate Update जारी करता है, अगले कुछ अपडेट बताएंगे कि अल-नीनो साल के आखिर तक असल में कितना तेज़ बनता है।

भारत में IMD की तरफ से आने वाले सर्दियों और अगले मॉनसून के पूर्वानुमान पर नज़र रखना ज़रूरी होगा, क्योंकि पॉज़िटिव IOD फेज़ असली असर को बदल सकता है।

इंडिया इकोलॉजी कलेक्टिव की अपील में शामिल वैज्ञानिकों का मॉनिटरिंग डेटा भी आने वाले महीनों में सामने आएगा, जिससे यह पता चलेगा कि जंगल, समुद्र और जैवविविधता पर असल में कितना असर पड़ा।

अल-नीनो खुद कोई नई चीज़ नहीं है, पर इस बार यह पहले से रिकॉर्ड गर्म धरती पर आ रहा है। अगले कुछ महीनों में WMO के अपडेट और भारत के वैज्ञानिकों का डेटा ही बताएगा कि यह अनुमान कितना सही निकलता है।

स्रोत: WMO, India Ecology Collective (Zenodo), ThePrint, BBC Science Focus, Al Jazeera