एल नीनो मानसून 2026 की तस्वीर अब तक कमज़ोर बारिश की रही है: मौसम विभाग (IMD) के अनुसार जून से सितंबर तक की बारिश दीर्घावधि औसत (Long Period Average, LPA) से करीब 15% कम है, और रिपोर्टों के मुताबिक यह 2009 के बाद का सबसे कमज़ोर मानसून बन सकता है। मई में IMD ने पूरे सीज़न के लिए लगभग 10% कमी का अनुमान दिया था। उधर विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) कह चुका है कि प्रशांत महासागर में एल नीनो आगे और मज़बूत होगा। इस लेख में हम आँकड़े, इलाके-वार असर और खेती-कीमतों की संभावनाएँ सीधी भाषा में समझते हैं।

एल नीनो (El Niño) आखिर है क्या?

एल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह के असामान्य रूप से गर्म हो जाने की प्राकृतिक घटना है। अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार यह आम तौर पर दो से सात साल में लौटती है और नौ महीने से एक साल तक टिकती है। समुद्र की यह गर्मी वायुमंडल में हवाओं का ढर्रा बदल देती है, इसलिए असर सिर्फ़ प्रशांत तक सीमित नहीं रहता।

रोज़ के एक उदाहरण से समझें। मोहल्ले में पानी का टैंकर जब एक गली में देर तक रुक जाए, तो बाकी गलियों के नल सूखे रह सकते हैं। एल नीनो में भी नमी और बारिश लाने वाली हवाओं का ‘टैंकर’ अपनी जगह बदल लेता है, और भारत जैसे इलाकों के हिस्से में कई बार कम पानी आता है। यह सरल तुलना है, पूरा विज्ञान नहीं।

2026 में मानसून अब तक कैसा रहा?

मानसून इस साल 4 जून को केरल पहुँचा। IMD के आँकड़ों के अनुसार मध्य सितंबर तक पूरे देश में बारिश सामान्य से करीब 15% कम दर्ज हुई। मई का अनुमान लगभग 10% कमी का था, यानी असल तस्वीर अनुमान से कमज़ोर निकली। पूरे सीज़न की कहानी सीधी रेखा में नहीं चली:

  • जून: शुरुआत सुस्त रही और बारिश सामान्य से कम रही।
  • जुलाई: बारिश सामान्य के आसपास या थोड़ी ऊपर रही, जिससे राष्ट्रीय कमी काफ़ी घटी।
  • अगस्त: बारिश फिर सामान्य से कम रही।
  • सितंबर: IMD ने 31 अगस्त के अपडेट में इस महीने की बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना जताई।

विश्लेषकों के अनुसार इसका सबक यह है कि मौसमी पूर्वानुमान संभावनाओं की भाषा में होते हैं। कोई एक महीना अनुमान के उलट भी जा सकता है, जैसा जुलाई में हुआ।

क्षेत्र-वार तस्वीर: कहाँ सबसे ज़्यादा कमी?

राष्ट्रीय औसत पूरी कहानी नहीं बताता। 13 सितंबर 2026 तक के IMD आँकड़ों पर आधारित रिपोर्टों के अनुसार क्षेत्रों की स्थिति बहुत अलग-अलग है:

क्षेत्रसीज़न की कमी (लगभग)टिप्पणी
दक्षिण प्रायद्वीपकरीब 28%कर्नाटक लगभग 29%, केरल 27%, तमिलनाडु 26%
पूर्व और पूर्वोत्तर भारतकरीब 25%असम में बाढ़ की खबरें भी आईं, यानी बारिश असमान रही
उत्तर-पश्चिम भारतकरीब 10%कमी मध्यम स्तर की
मध्य भारतकरीब 6%तुलनात्मक रूप से बेहतर, सामान्य के करीब

इससे पहले 26 अगस्त तक की एक रिपोर्ट में IMD के हवाले से बताया गया था कि 14 राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों में बारिश कम थी, और 1 जून से 25 अगस्त के बीच 310 ज़िले ‘कमी वाले’ (deficient) तथा 38 ज़िले ‘बहुत ज़्यादा कमी वाले’ (large deficient) श्रेणी में थे। साथ ही कुछ इलाकों में सामान्य से ज़्यादा बारिश भी हुई, यानी एक ही देश में बाढ़ और सूखे जैसी स्थिति साथ-साथ चल सकती है।

एल नीनो मानसून को कमज़ोर क्यों करता है?

IMD के मुताबिक इस समय प्रशांत में मज़बूत एल नीनो की स्थिति है और आने वाले महीनों में इसके और मज़बूत होने की उम्मीद है। एक रिपोर्ट के अनुसार एल नीनो भारत की ओर आने वाली नमी की धारा को घटा सकता है। लेकिन यह अकेला कारक नहीं है।

हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole, IOD) इस समय न्यूट्रल है। पॉज़िटिव IOD एल नीनो के नकारात्मक असर को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है। IMD का मॉडल सितंबर में न्यूट्रल IOD की उम्मीद करता है, जबकि कुछ अंतरराष्ट्रीय केंद्र सितंबर से पॉज़िटिव की ओर बदलाव का अनुमान लगाते हैं। यानी आगे का मौसम काफ़ी हद तक इन दोनों के मेल पर टिका है।

WMO की ताज़ा चेतावनी क्या कहती है?

3 सितंबर 2026 के अपडेट में WMO ने कहा कि एल नीनो पूरी तरह स्थापित हो चुका है और आने वाले महीनों में ‘बहुत मज़बूत’ स्तर तक पहुँच सकता है। इसके साल के अंत के आसपास चरम पर पहुँचने का अनुमान है। फ़रवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना लगभग 100% बताई गई है, जो WMO के अनुसार उसके किसी एल नीनो/ला नीना अपडेट में अब तक का सबसे स्पष्ट पूर्वानुमान है।

ध्यान देने की बात यह है कि WMO ने ख़ुद यह भी कहा है कि एल नीनो की ताकत से हर इलाके में असर की मात्रा अपने-आप तय नहीं हो जाती। इसीलिए भारत में असर को इलाके और महीने के हिसाब से देखना ज़रूरी है, सिर्फ़ एक राष्ट्रीय संख्या से नहीं।

खेती और खाने की कीमतों पर क्या असर पड़ सकता है?

IMD के आँकड़ों पर आधारित एक रिपोर्ट के अनुसार देश की करीब 52% शुद्ध बोई गई ज़मीन मानसून पर निर्भर है। ताज़ा रिपोर्टों में कहा गया है कि धान, गन्ना और मक्का जैसी फ़सलें कम बारिश से सबसे ज़्यादा प्रभावित हो सकती हैं। 11 सितंबर तक धान का बुवाई-रकबा पिछले साल से करीब 4% कम बताया गया।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि अगर बारिश औसत से कम रही तो धान का उत्पादन पिछले साल के मुकाबले करीब 1 करोड़ टन कम हो सकता है। यह अनुमान है, अंतिम आँकड़ा नहीं। खाद्य महँगाई अगस्त में 5.95% रही, जो इस साल का सबसे ऊँचा स्तर है, और रिपोर्टों के अनुसार खाने की कीमतें लगातार सात महीनों से बढ़ी हैं।

सरकार अब तक क्या कर रही है?

रिपोर्टों के अनुसार सरकार ने घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए शुल्क-मुक्त चीनी आयात की अनुमति दी है और कुछ राज्यों में प्याज़ रियायती दाम पर बेचना शुरू किया है। ये कदम कीमतों की रफ़्तार थामने के लिए हैं, बारिश की कमी की भरपाई के लिए नहीं। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि असर मौजूदा फ़सल सीज़न के साथ अगले सीज़न तक जा सकता है, इसलिए असली परीक्षा आने वाले महीनों में होगी।

भारत के लिए इसका मतलब

असर: सबसे बड़ी चुनौती असमानता है। जब पूरे देश का औसत करीब 15% कम दिखे, तब दक्षिण और पूर्वोत्तर के किसान कहीं ज़्यादा कमी झेल रहे होते हैं, जबकि मध्य भारत सामान्य के करीब है। दक्षिणी राज्यों के लिए अक्टूबर-दिसंबर का पूर्वोत्तर मानसून अब अहम हो जाता है, और उसका रुख अभी अनिश्चित है।

मौके: यह साल दिखाता है कि राष्ट्रीय औसत के बजाय ज़िला-स्तर की निगरानी और योजना कितनी काम की है। जिन ज़िलों में कमी सबसे ज़्यादा है, वहाँ पानी और फ़सल-चयन के फ़ैसले पहले लेने से नुकसान घटाया जा सकता है। ऐसी तैयारी का फ़ायदा अगले सूखे या बाढ़ में भी मिलेगा।

चुनौतियाँ: पूर्वानुमान और ज़मीनी तैयारी के बीच का फ़ासला असली दिक्कत है। IMD का मई का अनुमान 10% कमी का था, पर स्थिति उससे कमज़ोर रही। ऐसे में किसानों तक साप्ताहिक और ज़िला-स्तर की जानकारी समय पर पहुँचना उतना ही ज़रूरी है जितना अच्छा पूर्वानुमान।

अभी क्या पता नहीं है

  • मानसून सीज़न का अंतिम आँकड़ा: IMD के आधिकारिक अंतिम आँकड़े आने तक 15% को अनुमानित स्थिति ही मानें, और 2009 से तुलना भी अंतिम संख्या पर निर्भर है।
  • एल नीनो का अंतिम स्तर: WMO ‘बहुत मज़बूत’ स्तर की बात करता है, पर चरम की ठीक ताकत और समय अभी तय नहीं है।
  • हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) का रुख: पॉज़िटिव हुआ तो राहत मिल सकती है, न्यूट्रल रहा तो नहीं।
  • धान उत्पादन और कीमतों पर असर: मौजूदा संख्याएँ रिपोर्टों के अनुमान हैं, सरकारी उत्पादन आँकड़े नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या इसका मतलब है कि भारत में सूखा घोषित हो गया?

नहीं। राष्ट्रीय स्तर की 15% कमी का मतलब अपने-आप सूखे की घोषणा नहीं है। आम तौर पर सूखा घोषित करने का फ़ैसला राज्य सरकारें अपने ज़िलों के लिए करती हैं। इसलिए राज्य और ज़िले के स्तर की स्थिति पर नज़र रखना ज़्यादा काम की बात है।

एल नीनो कब तक रहेगा?

WMO के 3 सितंबर 2026 के अपडेट के अनुसार फ़रवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना लगभग 100% है। इसके साल के अंत के आसपास चरम पर पहुँचने का अनुमान है। यानी इसका असर मानसून के बाद के महीनों और 2027 की शुरुआत तक भी दिख सकता है।

क्या हर एल नीनो में पूरे भारत में बारिश कम होती है?

ज़रूरी नहीं। इस साल भी मध्य भारत सामान्य के करीब है और जुलाई में देश भर में बारिश सामान्य के आसपास या थोड़ी ऊपर रही। WMO भी कहता है कि एल नीनो की ताकत से हर क्षेत्र का असर तय नहीं होता। असर इलाके और दूसरे कारकों पर निर्भर करता है।

क्या खाने की चीज़ें और महँगी होंगी?

जोखिम है, पर पक्का नहीं। अगस्त में खाद्य महँगाई 5.95% रही और रिपोर्टों में उत्पादन घटने की आशंका जताई गई है। सरकार चीनी आयात और प्याज़ की रियायती बिक्री जैसे कदम उठा चुकी है। आगे की कीमतें फ़सल के अंतिम अनुमान और आपूर्ति पर निर्भर करेंगी।

कुल मिलाकर

एल नीनो और मानसून 2026 की कहानी बताती है कि भारत का मौसम सिर्फ़ स्थानीय नहीं, हज़ारों किलोमीटर दूर प्रशांत की गर्मी से भी जुड़ा है। अब तक की बारिश करीब 15% कम है और WMO के अनुसार एल नीनो अभी और मज़बूत होगा। असर सब जगह एक-सा नहीं है, इसलिए दक्षिण और पूर्वोत्तर पर ख़ास नज़र रखनी होगी। अंतिम आँकड़ों का इंतज़ार करें और अनुमानों को अनुमान की तरह ही पढ़ें।

स्रोत: IMD, WMO, Mongabay India, Bloomberg, Business Standard, Al Jazeera, BusinessToday

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