सोचिए, चौराहे पर लगा कैमरा हर फ्रेम खींचता है, उसे मेमोरी में भेजता है और फिर प्रोसेसर से पहचान करवाता है। IIT गुवाहाटी और IIT खड़गपुर का नया न्यूरोमॉर्फिक (neuromorphic) विज़न डिवाइस इन तीनों काम को एक ही पतली परत में समेटता है। लैब टेस्ट में यह पुराने MXene-आधारित डिवाइसों से 500 गुना कम ऊर्जा खर्च करता दिखा, पर यह तुलना हर चिप से नहीं है।

इस लेख में दो बातें अलग से खोली गई हैं: 500 गुना की तुलना आखिर किससे है, और भारत के कैमरा-आधारित सिस्टमों के लिए इसका क्या मतलब निकल सकता है। बाकी ब्योरा क्रम से आएगा: क्या बना, क्यों बना और आगे कितना रास्ता बाकी है।

एक परत, तीन काम: डिवाइस ने असल में क्या किया

Business Standard के अनुसार, IIT गुवाहाटी ने IIT खड़गपुर के साथ मिलकर एक बेहद पतला, रोशनी के प्रति संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बनाया है। यह दृश्य जानकारी को महसूस करता है, उसे याद रखता है और पारंपरिक डिवाइसों से कम ऊर्जा में प्रोसेस भी करता है। यह खबर 12 अक्टूबर 2026 को सामने आई।

शोध के प्रमुख लेखक IIT गुवाहाटी के भौतिकी विभाग के प्रोफ़ेसर पी. के. गिरि (P K Giri) हैं। IIT खड़गपुर की ओर से प्रोफ़ेसर चंद्र शेखर तिवारी (Chandra Sekhar Tiwary) जुड़े रहे। Business Standard और EastMojo, दोनों के अनुसार नतीजे जर्नल Carbon में प्रकाशित हुए हैं।

आम कैमरे में हर काम का अलग पुर्ज़ा होता है। यहां शोधकर्ताओं ने एक ही सामग्री-मंच पर रोशनी पकड़ने और याददाश्त, दोनों का व्यवहार दिखाया है। इसे वे कृत्रिम सिनैप्स (artificial synapse) कहते हैं, यानी मस्तिष्क की तंत्रिका-कोशिकाओं के बीच के जोड़ की इलेक्ट्रॉनिक नकल।

रोशनी बुझने के बाद भी क्यों टिकी रहती है प्रतिक्रिया

डिवाइस दो सामग्रियों की जोड़ी पर टिका है। MXene नैनोशीट (nanosheet) बिजली का अच्छा संवाहक, दो-आयामी और बेहद पतला पदार्थ है। P3HT, यानी पॉली(3-हेक्सिलथायोफ़ीन), एक कार्बनिक अर्धचालक (organic semiconductor) है, जो रोशनी पड़ने पर विद्युत आवेश पैदा करता है।

Business Standard के अनुसार, जब दोनों परतें संपर्क में आती हैं तो रोशनी से बने आवेश इनके जोड़ पर अलग हो जाते हैं और लंबे समय तक अलग ही रहते हैं। इसी वजह से रोशनी बंद होने के बाद भी बिजली की प्रतिक्रिया बनी रहती है। यही टिकी हुई प्रतिक्रिया इस डिवाइस की 'याददाश्त' का काम करती है।

प्रो. गिरि के हवाले से रिपोर्ट बताती है कि दूसरा प्रकाश-संकेत आने पर प्रतिक्रिया पहले संकेत से 180 प्रतिशत ज़्यादा मज़बूत निकली। रोज़ के उदाहरण से देखें तो खेत की मेड़ पर बार-बार चलने से पगडंडी गहरी हो जाती है। दोहराव असर बढ़ाता है, और सिनैप्स भी कुछ ऐसा ही करते हैं।

कैमरा, मेमोरी, प्रोसेसर: ऊर्जा आखिर जाती कहाँ है

Business Standard के अनुसार पारंपरिक सिस्टम में कैमरा रोशनी को डिजिटल जानकारी में बदलता है, उसे माइक्रोप्रोसेसर तक पहुंचाता है और प्रोसेसर तस्वीर को पिक्सल-दर-पिक्सल जांचकर वस्तु पहचानता है। हर चरण पर डेटा एक पुर्ज़े से दूसरे पुर्ज़े तक जाता है।

इस आवाजाही में ही काफ़ी बिजली लगती है, और यह गणना के असली खर्च से अलग होती है। किसी दुकान की मिसाल लें, जहां माल गोदाम से काउंटर तक बार-बार ढोना पड़े। बिक्री से ज़्यादा मेहनत ढुलाई में जाती है। कंप्यूटर विज्ञान में इसे वॉन न्यूमैन बॉटलनेक (von Neumann bottleneck) कहा जाता है, जैसा रिपोर्ट में भी ज़िक्र है।

न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग का विचार इसी दूरी को घटाना है, यानी मेमोरी और प्रोसेसिंग को पास लाना। इसकी बुनियादी कार्यप्रणाली हम न्यूरोमॉर्फिक चिप की कार्यप्रणाली वाले लेख में समझा चुके हैं। IIT का डिवाइस इसमें सेंसिंग को भी उसी सामग्री में जोड़ देता है।

प्रो. तिवारी के अनुसार, जहां उपकरण लगातार चलते हैं या ऊर्जा की सख़्त सीमा होती है, वहां ऐसे डिवाइस काम आ सकते हैं। शर्त यह है कि तकनीक को आगे विकसित करके असली सिस्टम में जोड़ा जाए।

'500 गुना' की तुलना किससे है

रिपोर्टों के अनुसार 500 गुना का आंकड़ा पारंपरिक MXene-आधारित डिवाइसों की तुलना में है, यानी उसी परिवार के पुराने डिज़ाइनों से। यह आज के GPU या बाज़ार में बिक रहे किसी कैमरा-चिप से तुलना नहीं है। यह फ़र्क़ याद रखना ज़रूरी है। नीचे रिपोर्ट हुए चारों आंकड़े एक जगह हैं।

पहलूरिपोर्ट हुआ नतीजास्रोत
ऊर्जा खपत (लैब टेस्ट)MXene-आधारित पारंपरिक डिवाइसों से 500 गुना कमBusiness Standard
चेहरा पहचान की सटीकता90%Business Standard
ट्रैफ़िक दृश्य का विभाजन (segmentation)85%Business Standard
दूसरे प्रकाश-संकेत पर प्रतिक्रियापहले संकेत से 180% ज़्यादा मज़बूतBusiness Standard

यह हमारा आकलन है, कोई प्रकाशित आंकड़ा नहीं। मान लीजिए किसी पुराने MXene डिवाइस को एक ऑपरेशन में 1 इकाई ऊर्जा लगती है। तब नया डिज़ाइन वही काम 0.002 इकाई में करेगा, क्योंकि 1 ÷ 500 = 0.002। पर किसी तीसरी तकनीक का खर्च पहले से कम निकला, तो उसके मुक़ाबले यह बढ़त छोटी हो जाएगी।

भारत के कैमरों और सेंसरों के लिए इसका मतलब

भारत में ट्रैफ़िक कैमरे, शहरी निगरानी प्रणालियां और दूर-दराज़ के सेंसर बड़ी मात्रा में डेटा बनाते हैं। संभव है कि भविष्य में ऐसी तकनीक वहां काम आए जहां बिजली या बैटरी की गुंजाइश कम हो, जैसे खेत या सीमावर्ती इलाक़ों के सेंसर। फ़िलहाल यह सिर्फ़ दिशा है, उत्पाद नहीं।

देश में AI विज़न चिप बनाने की एक अलग कोशिश पर हम भारत के AI निगरानी चिप वाली रिपोर्ट में लिख चुके हैं। वह रास्ता मौजूदा सिलिकॉन-निर्माण पर टिका है, जबकि यह खोज नई सामग्री पर आधारित है। दोनों के बीच का फ़ासला निर्माण-मानकों से भरना पड़ेगा।

चेहरा पहचान जैसे उपयोग में निजता का सवाल भी साथ आएगा। कम ऊर्जा का मतलब है कि ऐसे कैमरे ज़्यादा जगह लगाना आसान हो सकता है, और तब यह बहस और अहम हो जाती है कि पहचान का डेटा कहां और कितनी देर रखा जाए।

जो अभी पता नहीं

  • 90% और 85% की सटीकता किस डेटासेट और किन परीक्षण-शर्तों पर निकली, यह अभी साफ़ नहीं है।
  • डिवाइस कितने बड़े क्षेत्र या कितने यूनिट की सरणी (array) पर काम करता है, इसका ब्योरा नहीं दिया गया।
  • हवा, नमी और बार-बार इस्तेमाल में यह कितने समय तक टिकता है, यानी टिकाऊपन अज्ञात है।
  • बड़े पैमाने पर बनाने की लागत और तरीक़ा अभी सामने नहीं आया है।

ये सवाल इसलिए अहम हैं कि लैब का एक डिवाइस और बाज़ार का उत्पाद दो अलग चरण हैं। देश के सेमीकंडक्टर मिशन 1.0 बनाम 2.0 की तुलना भी दिखाती है कि बड़े बजट के बाद भी उत्पादन तक पहुंचने में समय लगता है।

आगे क्या देखें

  • क्या शोध-टीम डिवाइस की सरणी बनाकर बड़े चित्रों पर परीक्षण करती है।
  • क्या कोई स्वतंत्र प्रयोगशाला इन नतीजों को दोहराकर पुष्टि करती है।
  • क्या किसी उद्योग-साझेदार या तकनीक-हस्तांतरण की घोषणा आती है।

इनमें सबसे पहले सरणी वाला परीक्षण मायने रखेगा, क्योंकि एक अकेले डिवाइस की सटीकता से यह पता नहीं चलता कि हज़ारों इकाइयां साथ चलने पर नतीजे कितने एक जैसे रहेंगे। स्वतंत्र पुष्टि दूसरी कसौटी है, क्योंकि नई सामग्री वाले डिवाइसों में एक लैब का नतीजा दूसरी लैब में हर बार दोहराया नहीं जाता।

फ़िलहाल यह एक कृत्रिम सिनैप्स का लैब-प्रदर्शन है। 500 गुना का आंकड़ा दिलचस्प दिशा दिखाता है, पर उसकी कीमत इस पर टिकी है कि तुलना किससे हुई। असली तस्वीर तब बनेगी जब यही डिवाइस बाहर की परिस्थितियों में, बड़े पैमाने पर काम करके दिखाए।

स्रोत: Business Standard, EastMojo