2021 में जब भारत ने अपना पहला Semiconductor Mission शुरू किया था, तब देश में कोई भी फैक्ट्री चिप नहीं बना रही थी। पांच साल बाद, 2026 में इस मिशन का बजट लगभग दोगुना हो गया है, पर पहली फैब्रिकेशन यूनिट अब भी 2028 में शुरू होने की बात हो रही है। यही अंतर बताता है कि आउटले बढ़ना और असली उत्पादन शुरू होना, दो अलग कहानियां हैं।

पहले (ISM 1.0): 2021 में क्या शुरू हुआ था

दिसंबर 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹76,000 करोड़ (करीब $8 अरब) के आउटले के साथ India Semiconductor Mission (ISM) को मंज़ूरी दी थी। इसका मुख्य मकसद था विदेशी कंपनियों को भारत में फैब्रिकेशन और पैकेजिंग प्लांट लगाने के लिए आकर्षित करना।

शुरुआती दौर में काम ज़्यादातर मंज़ूरियों और निवेश के वादों तक सीमित रहा। PIB के अनुसार 2025 में भारत ने अपने पहले 3-नैनोमीटर चिप डिज़ाइन सेंटर नोएडा और बेंगलुरु में शुरू किए, और पांच सेमीकंडक्टर उत्पादन यूनिट तब निर्माण के दौर में थीं।

सितंबर 2025 में Semicon India सम्मेलन में तब पहली बार 'मेड इन इंडिया' पायलट लाइन से बने चिप प्रधानमंत्री को दिखाए गए थे। उसी मौके पर करीब एक अरब डॉलर के India Deep Tech Alliance की भी घोषणा हुई थी, ताकि सेमीकंडक्टर के अलावा क्लीन एनर्जी, बायोटेक और क्वांटम जैसे क्षेत्रों को भी वेंचर पूंजी मिल सके।

अब (ISM 2.0): 2026 में क्या बदला

Union Budget 2026-27 में सरकार ने Semiconductor Mission 2.0 का ऐलान किया, जिसका आउटले ₹1,27,500 करोड़ (करीब $13.5 अरब) है। SEMICON India 2026 में प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि यह पहले चरण के $8 अरब के मुकाबले लगभग पौने दोगुने से ज़्यादा है।

Business Today के अनुसार इस दौरान 12 चिप प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी मिल चुकी है। मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार ISM 2.0 का ज़ोर स्वदेशी चिप डिज़ाइन, प्रोडक्टाइज़ेशन, टैलेंट और इकोसिस्टम पार्टनर जुटाने पर है, सिर्फ फैक्ट्री लगाने पर नहीं।

दूसरे चरण को छह हिस्सों में बांटा गया है: चिप डिज़ाइन, सेमीकंडक्टर उपकरण व सामग्री, फैब्रिकेशन सुविधाएं, एडवांस्ड पैकेजिंग, रिसर्च व डेवलपमेंट, और टैलेंट डेवलपमेंट। यह ढांचा दिखाता है कि अब सिर्फ फैक्ट्री नहीं, पूरी सप्लाई चेन की सोच है।

आउटले से लेकर फोकस एरिया तक: तुलना एक नज़र में

पहलूISM 1.0 (2021)ISM 2.0 (2026)
सरकारी आउटले₹76,000 करोड़ (~$8 अरब)₹1,27,500 करोड़ (~$13.5 अरब)
मुख्य फोकसफैब और पैकेजिंग प्लांट आकर्षित करनाडिज़ाइन, उपकरण, फैब, पैकेजिंग, R&D, टैलेंट
मंज़ूर यूनिट/प्रोजेक्टशुरुआत में सीमित12 चिप प्रोजेक्ट मंज़ूर
पहली फैब का उत्पादनतय नहीं था2028 तक लक्ष्य

हमारे हिसाब से आउटले में यह बढ़ोतरी करीब 68% की है, यानी दूसरा चरण पहले से डेढ़ गुने से भी ज़्यादा बड़ा है। पर बड़ा बजट अपने आप फैक्ट्री को जल्दी नहीं चलाता, वह सिर्फ ज़्यादा काम करने की गुंजाइश देता है। असली फर्क इस बात में दिखेगा कि यह पैसा कितनी जल्दी और कितनी कुशलता से ज़मीन पर उतरता है।

अब तक कितनी फैक्ट्री और कितना निवेश?

IBEF की रिपोर्ट के अनुसार ISM के तहत अब तक करीब ₹1.64 लाख करोड़ (करीब $17.33 अरब) के निवेश की प्रतिबद्धता आ चुकी है, जिसमें एक सेमीकंडक्टर फैब, दो कॉम्पाउंड सेमीकंडक्टर फैब और नौ पैकेजिंग यूनिट शामिल हैं। bisinfotech के अनुसार कुल मिलाकर 12 यूनिट मंज़ूर हो चुकी हैं।

यह निवेश VIHAAN जैसी स्वदेशी चिप परियोजनाओं को सीधा सहारा नहीं देता, क्योंकि यह ज़्यादातर बड़ी फैब्रिकेशन और पैकेजिंग यूनिट के लिए है। स्वदेशी डिज़ाइन वाली परियोजनाएं अलग योजनाओं से पैसा पाती हैं।

हमारा आकलन है कि यह फर्क समझना ज़रूरी है: एक तरफ बड़ी विदेशी और घरेलू कंपनियां अरबों डॉलर की फैब्रिकेशन यूनिट लगा रही हैं, दूसरी तरफ छोटी टीमें सीमित बजट में स्वदेशी चिप डिज़ाइन कर रही हैं। दोनों रास्ते साथ-साथ चल रहे हैं, पर रफ्तार और पैमाना बहुत अलग है।

डिज़ाइन और टैलेंट पर कितना काम हुआ?

Design Linked Incentive (DLI) योजना के तहत 24 प्रोजेक्ट्स को सहारा मिल रहा है, 105 कंपनियों को एडवांस्ड चिप डिज़ाइन टूल दिए गए हैं, और 23 टेपआउट यानी डिज़ाइन से बने तैयार चिप मॉडल पूरे हो चुके हैं। मोहाली की Semiconductor Laboratory में 46 से ज़्यादा यूनिवर्सिटी के छात्रों ने मिलकर 56 चिप डिज़ाइन और बनाए हैं।

IIT Delhi के स्वदेशी Micro-GPU जैसी कोशिशें इसी टैलेंट और डिज़ाइन इकोसिस्टम का हिस्सा हैं, जो बड़ी फैब्रिकेशन यूनिट की तुलना में छोटे पैमाने पर, पर तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं।

भारत के लिए मतलब, अनजान बातें और आगे क्या

भारत के लिए इसका मतलब है कि चिप बनाने की रणनीति अब सिर्फ किसी एक बड़ी फैक्ट्री पर टिकी नहीं है, बल्कि डिज़ाइन, टैलेंट और सप्लाई चेन के कई हिस्सों में एक साथ निवेश हो रहा है। यह ज़्यादा टिकाऊ रणनीति मानी जा रही है, भले ही नतीजे धीरे दिखें।

यह बदलाव इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि सिर्फ फैक्ट्री लगाना काफी नहीं, उसमें काम करने वाले इंजीनियर और डिज़ाइनर भी चाहिए। अमेरिका, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को भी यही सीख मिली है कि चिप इंडस्ट्री टिकाऊ बनाने के लिए टैलेंट पाइपलाइन फैक्ट्री जितनी ही अहम है, और भारत अब इसी सीख को अपने ढांचे में शामिल कर रहा है।

अभी यह साफ नहीं है कि 2028 तक पहली फैब सच में उत्पादन शुरू कर देगी या तारीख आगे खिसकेगी, जैसा चिप बनाने की जटिल प्रक्रिया में अक्सर होता है। यह भी साफ नहीं है कि ₹1.27 लाख करोड़ का पूरा पैसा समय पर खर्च हो पाएगा या नहीं।

आगे तीन चीज़ों पर नज़र रखनी होगी: 2028 में पहली फैब से निकलने वाला पहला असली चिप, DLI योजना के तहत मंज़ूर 24 प्रोजेक्ट्स में से कितने व्यावसायिक उत्पाद तक पहुंचते हैं, और क्या और विदेशी कंपनियां ISM 2.0 के तहत नई यूनिट लगाने का ऐलान करती हैं। इसके अलावा यह भी देखना होगा कि मोहाली जैसी प्रयोगशालाओं से निकले छात्र डिज़ाइन किए चिप आगे किसी स्टार्टअप या कंपनी के असली प्रोडक्ट में बदलते हैं या नहीं।

पहले और अब के बीच का फर्क सिर्फ पैसे का नहीं है। पहले सवाल था कि भारत चिप बनाएगा या नहीं, अब सवाल है कि कितनी तेज़ी से और कितने बड़े पैमाने पर। इस सवाल का जवाब अगले दो-तीन साल में मोहाली से लेकर गुजरात की फैब्रिकेशन यूनिट तक की असली प्रगति से मिलेगा।

स्रोत: PIB, Business Today, IBEF, bisinfotech

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