किसी गली के कोने में लगा CCTV कैमरा हर दिन हज़ारों चेहरे और गाड़ियाँ रिकॉर्ड करता है, पर उसके अंदर जो चिप यह सब 'समझती' है, वह अब तक लगभग हमेशा विदेश में बनी होती थी। 5 अक्टूबर 2026 को भारत सरकार ने इसी गैप को भरने के लिए ₹130 करोड़ की मंज़ूरी दी।

Indiablooms के अनुसार Technology Development Board (TDB) ने बेंगलुरु की BigEndian Semiconductors के साथ Project VeerAI के लिए यह समझौता किया है, जो एक कैमरा-केंद्रित AI Vision चिप बनाने की परियोजना है। आइए देखते हैं कि यह डील असल में क्या है, क्यों ज़रूरी है, और इससे आगे क्या उम्मीद की जा सकती है।

क्या हुआ: ₹130 करोड़ का समझौता

Mumbai Tribune के अनुसार Department of Science & Technology के तहत काम करने वाले TDB ने Research Development and Innovation (RDI) Fund से यह रकम दी है। Project VeerAI की कुल लागत ₹260 करोड़ आँकी गई है, यानी बाकी आधा हिस्सा BigEndian खुद जुटाएगी।

Indianweb2 के अनुसार यह ₹130 करोड़ 'Optional Convertible Debt' (OCD) के रूप में है, यानी यह सीधा अनुदान नहीं, बल्कि एक तरह का क़र्ज़ है जिसे बाद में शेयर में बदला जा सकता है। यह ढांचा सरकार को बाद में कंपनी में हिस्सेदारी लेने का विकल्प भी देता है, सिर्फ़ पैसा 'दे देना' नहीं।

TDB के सचिव Rajesh Kumar Pathak ने Indiablooms से कहा कि सेमीकंडक्टर लगभग हर उभरती तकनीक की नींव हैं, और एप्लिकेशन-विशिष्ट AI चिप्स में स्वदेशी क्षमता बनाना भारत के तकनीकी तंत्र को मज़बूत करने का एक अहम हिस्सा है।

BigEndian कौन है, और यह नई कंपनी नहीं

TechCrunch की सितंबर 2024 की रिपोर्ट के अनुसार BigEndian को उसके सह-संस्थापक और CEO Sunil Kumar ने शुरू किया था, जिनकी टीम के सदस्य एक-दूसरे को 25 साल से जानते हैं। तब कंपनी ने Vertex Ventures के नेतृत्व में $30 लाख की शुरुआती फ़ंडिंग जुटाई थी।

Kumar ने उस समय TechCrunch को बताया था कि भारत हर साल लगभग एक अरब सर्विलांस चिपसेट खपत करता है, और कंपनी शुरुआत में ताइवान की UMC के साथ मिलकर 28nm नोड पर एक रेफ़रेंस चिप बना रही थी। यानी यह ताज़ा फ़ंडिंग किसी नई कंपनी को नहीं, दो साल से काम कर रही टीम को आगे बढ़ाने के लिए है।

Kumar ने यह भी कहा था कि जिस देश ने अभी तक सेमीकंडक्टर में बड़ी सफलता नहीं देखी, वहाँ इस स्तर पर फ़ंडिंग जुटाना बेहद मुश्किल होता है। उस शुरुआती दौर में Amazon Web Services के स्टार्टअप-प्रमुख Amitabh Nagpal जैसे strategic investors भी जुड़े थे।

TRL-5 से TRL-9 का मतलब क्या है

Apacnewsnetwork के अनुसार यह पैसा चिप को 'Technology Readiness Level' यानी TRL-5 से TRL-9 तक ले जाने के लिए है। आसान भाषा में, TRL-5 का मतलब है कि डिज़ाइन असली जैसी परिस्थितियों में टेस्ट हो चुका है, जबकि TRL-9 का मतलब है कि वह बाज़ार में बेचे जाने लायक, पूरी तरह तैयार प्रोडक्ट बन चुका है।

यानी यह फ़ंडिंग शुरुआती रिसर्च के लिए नहीं, बल्कि प्रयोगशाला के प्रोटोटाइप को असली फ़ैक्ट्री-तैयार चिप में बदलने के आख़िरी, सबसे महँगे चरण के लिए है।

दुनिया भर में ज़्यादातर चिप-स्टार्टअप यहीं फँस जाते हैं: डिज़ाइन का विचार सस्ता होता है, पर उसे बड़े पैमाने पर टेस्ट करके, असली फ़ैक्ट्री में उतारना बहुत महँगा और जोखिम भरा होता है। सरकारी पैसा ठीक इसी 'महँगे बीच के हिस्से' को पार करने के लिए दिया गया है।

इस्तेमाल कहाँ होगा: CCTV से शुरुआत, आगे बड़ा दायरा

Mumbai Tribune के अनुसार शुरुआत में यह चिप भारत और Global South के CCTV व सर्विलांस सिस्टम के लिए बनेगी। आगे चलकर इसे डिफ़ेंस, ऑटोमोटिव, इंडस्ट्रियल और मेडिकल क्षेत्रों में भी इस्तेमाल करने की योजना है।

CCTV को पहला क्षेत्र चुनना तर्कसंगत भी है: यह एक बड़ा, लगातार बढ़ता बाज़ार है, और चिप के डिज़ाइन को असली परिस्थितियों में परखने के लिए सबसे सीधा रास्ता भी, इससे पहले कि इसे डिफ़ेंस जैसे ज़्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों में भेजा जाए।

Whalesbook के अनुसार मक़सद सिर्फ़ चिप बनाना नहीं, बल्कि डेटा गोपनीयता और सप्लाई-चेन सुरक्षा का सवाल भी है, क्योंकि आज ज़्यादातर सर्विलांस कैमरों में लगी चिप विदेशी होती है। किसी विदेशी चिप में छिपी कमज़ोरी या बैकडोर का ख़तरा, सुरक्षा कैमरों जैसे संवेदनशील इस्तेमाल में सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल बन जाता है।

भारत के लिए इसका मतलब

Apacnewsnetwork के अनुसार भारत के पास दुनिया के 20% चिप-डिज़ाइनर हैं, फिर भी ग्लोबल सेमीकंडक्टर बाज़ार में उसकी मौजूदगी बहुत कम है। VeerAI जैसी परियोजनाएँ डिज़ाइन-क्षमता को असली, बिकने लायक प्रोडक्ट में बदलने की कोशिश हैं।

यह हमारा आकलन है: यह फ़ंडिंग Semicon India Mission के बड़े फ़ैब-निर्माण वाले प्रयासों से अलग रास्ता है — यहाँ ज़ोर फ़ैब्रिकेशन प्लांट पर नहीं, बल्कि ख़ास काम के लिए बने (application-specific) चिप डिज़ाइन को बाज़ार तक पहुँचाने पर है।

दोनों रास्ते एक-दूसरे के पूरक हैं: बड़े फ़ैब देश में चिप बनाने की बुनियाद तैयार करते हैं, जबकि VeerAI जैसी परियोजनाएँ दिखाती हैं कि उस बुनियाद पर असली, बिकने लायक प्रोडक्ट कैसे खड़ा किया जाए।

जो अभी पता नहीं, आगे क्या देखें

Whalesbook के अनुसार हार्डवेयर विकास में बड़ी शुरुआती पूँजी लगती है और देरी का ख़तरा भी ज़्यादा रहता है, जिससे कंपनी की नकदी जल्दी ख़त्म हो सकती है। VeerAI के लिए पक्की कमर्शियल लॉन्च तारीख़ किसी रिपोर्ट में नहीं दी गई है।

यह भी साफ़ नहीं कि फ़ाइनल चिप किस नोड (जैसे 28nm) पर और किस फ़ैब में बनेगी, या भारत के किसी घरेलू फ़ैब (जैसे Dholera) से इसका कोई रिश्ता बनेगा या नहीं। आने वाले महीनों में TRL-9 की तरफ़ प्रगति और पहले ग्राहकों की घोषणा ही असली तस्वीर साफ़ करेगी।

यह भी पता नहीं कि बचा हुआ ₹130 करोड़ (कुल ₹260 करोड़ में से) BigEndian कैसे जुटाएगी — निवेशकों से, किसी और सरकारी योजना से, या अपने राजस्व से। जब तक यह साफ़ नहीं होता, पूरी परियोजना का समय-सीमा पर निर्भर रहना जोखिम भरा बना रहेगा।

फ़िलहाल एक बात पक्की है: हर गली के कैमरे के पीछे खड़ी चिप को 'Made in India' बनाना अब सिर्फ़ नारा नहीं, एक फ़ंडेड प्रोजेक्ट है, भले ही उसका रास्ता अभी शुरू हुआ हो।

स्रोत: Indiablooms, Mumbai Tribune, Apacnewsnetwork, TechCrunch, Whalesbook

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