बहुत लोग सोचते हैं कि किसी देश की स्पेस एजेंसी को अगर ज़्यादा रॉकेट लॉन्च करने हैं, तो बस ज़्यादा रॉकेट बना लो। 6 सितंबर 2026 को IN-SPACe चेयरमैन पवन गोयनका ने जब भारत के लिए 2030 तक हर साल 50 लॉन्च का लक्ष्य रखा, तो असली सवाल यही निकला: क्या सिर्फ रॉकेट बनाना काफी है?

6 सितंबर को क्या ऐलान हुआ

Outlook India के मुताबिक गोयनका ने X पर पोस्ट कर कहा कि पांच साल पहले स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोलने का मकसद यही था कि ISRO नए मोर्चों पर फोकस कर सके और निजी उद्योग अपनी क्षमता बनाए। अब लॉन्च की रफ्तार बढ़ाना ही असली इम्तिहान है।

यह ऐलान उन दिनों आया जब ISRO के नौ कर्मचारी संगठनों ने एजेंसी के नेतृत्व से यह साफ करने को कहा था कि निजी क्षेत्र को कितना काम सौंपा जाएगा।

यह टारगेट इतना बड़ा क्यों है

Space analyst Jatan Mehta के आंकड़ों के मुताबिक 2016 से 2025 के बीच PSLV, GSLV, LVM3 और SSLV मिलाकर भारत ने सिर्फ 51 बार लॉन्च किया, यानी औसतन सालाना पांच से कुछ ही ज़्यादा। इसे यूं समझें: अगले सिर्फ एक साल में उतने लॉन्च होने हैं, जितने पिछले पूरे दस साल में हुए।

हाल के दो झटकों ने भी दबाव बढ़ाया है: मई 2025 में PSLV-C61/EOS-09 और जनवरी 2026 में PSLV-C62/EOS-N1 मिशन नाकाम रहे। ISRO चीफ वी. नारायणन ने इस वित्त वर्ष में सात और लॉन्च और तीन साल में स्पेसक्राफ्ट उत्पादन तिगुना करने का लक्ष्य रखा है।

लॉन्च पैड: क्या बन रहा है

श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर में अभी दो पैड काम कर रहे हैं, फर्स्ट लॉन्च पैड 1993 से और सेकंड लॉन्च पैड मध्य-2000 के दशक से। एक तीसरा पैड जनवरी 2025 में कैबिनेट से मंज़ूर हुआ, पर वह मार्च 2029 से पहले तैयार नहीं होगा।

प्रोजेक्टलागतकब तक तैयार
थर्ड लॉन्च पैड, श्रीहरिकोटा₹3,984.86 करोड़मार्च 2029
कुलशेखरपट्टिनम स्मॉल-सैट स्पेसपोर्ट₹985.96 करोड़वित्त वर्ष 2026-27
ALP-01 'धनुष' (निजी पैड)N/A2024 से चालू, Agnikul के लिए

कुलशेखरपट्टिनम मुख्यतः SSLV मिशन और गैर-सरकारी लॉन्च के लिए है, पूरी तरह चालू होने पर यह सालाना 20-25 लॉन्च संभाल सकता है। SSLV के बूस्टर अपग्रेड से पहले ही इसकी पेलोड क्षमता बढ़ चुकी है।

Skyroot और Agnikul की भूमिका

हैदराबाद की Skyroot Aerospace का भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट 18 जुलाई 2026 को उड़ा। कंपनी अब 1.1 अरब डॉलर वैल्यूएशन पार कर चुकी है, GIC और Sherpalo Ventures से 6 करोड़ डॉलर जुटाए हैं, और इसके पास 1,160 से ज़्यादा कर्मचारी हैं।

चेन्नई की Agnikul Cosmos ने अलग रास्ता चुना है: 3D-प्रिंटेड, सिंगल-पीस इंजन जो इलेक्ट्रिक पंप से चलते हैं और सिर्फ सात दिन में बनाए जा सकते हैं। मकसद है छोटे सैटेलाइट के लिए तेज़, ऑन-डिमांड लॉन्च।

दोनों कंपनियों की सोच अलग है, Skyroot बड़े ऑर्बिटल रॉकेट पर दांव लगा रहा है जबकि Agnikul छोटे, जल्दी बनने वाले लॉन्च पर। अगर 50 लॉन्च का टारगेट पूरा करना है, तो ISRO को इन दोनों तरह के निजी रॉकेट, दोनों की ज़रूरत पड़ेगी।

असली अड़चनें कहां हैं

सिर्फ पैड गिनना काफी नहीं। लॉन्च की असल रफ्तार सबसे कमज़ोर कड़ी तय करती है, अगर इंजन बनाने की क्षमता सिर्फ 12 रॉकेट सालाना है, तो पैड 20 लॉन्च संभाल सकें तब भी फर्क नहीं पड़ता।

क्रायोजेनिक इंजन जैसे CE20 की टेस्टिंग के लिए महंगा ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, और ISRO Propulsion Complex के टेस्ट स्टैंड अभी साझा, सीमित राष्ट्रीय संसाधन हैं, हर हफ्ते इस्तेमाल के लिए नहीं बने।

रेगुलेशन में भी गैप है। सैटकॉम अप्रूवल के लिए IN-SPACe के अलावा अलग से DoT लाइसेंस और स्पेक्ट्रम चाहिए; अगस्त 2026 तक Starlink, OneWeb और Jio के Orbit Connect India जैसी कंपनियां दोनों मंज़ूरी पाकर भी सिक्योरिटी क्लियरेंस और स्पेक्ट्रम का इंतज़ार कर रही थीं।

हर लॉन्च के लिए हवाई और समुद्री रास्तों की भी अलग से मंज़ूरी चाहिए, यानी नोटिस टू एयर मिशन और डेंजर-ज़ोन एडवाइज़री। अगस्त 2026 में IN-SPACe ने सैटेलाइट और रॉकेट के मलबे की कंट्रोल्ड री-एंट्री के लिए नई गाइडलाइन भी जोड़ीं, जिनमें लायबिलिटी और इंश्योरेंस शर्तें भी शामिल हैं। पांच लॉन्च से 50 लॉन्च तक पहुंचने में यही मशीनरी सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

मांग, बजट और भारत के लिए मतलब

भारत में अब 450 से ज़्यादा रजिस्टर्ड स्पेस स्टार्टअप हैं, पर ज़्यादातर कंपोनेंट या ग्राउंड सिस्टम बनाते हैं, अपने सैटेलाइट नहीं चलाते। सरकारी मिशन की कतार लंबी है: Earth observation replacement, NavIC replenishment, Gaganyaan, और 2035 का अपना Space Station, जिसमें Chandrayaan-4 के लिए अकेले दो LVM3 लॉन्च चाहिए।

बजट भी सीमा तय करता है: Department of Space ने 2026-27 के लिए 15,604.80 करोड़ रुपये मांगे थे, वित्त मंत्रालय ने घटाकर 13,705.63 करोड़ यानी करीब 88% ही दिए। एक संसदीय समिति ने यह भी नोट किया कि जनवरी 2026 तक असली खर्च पिछले साल के संशोधित अनुमान से भी पीछे रहा।

हमारा अंदाज़ा है कि जब तक टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, बजट और रेगुलेटरी मशीनरी तीनों साथ नहीं बढ़ते, सिर्फ नए पैड बनाने या निजी कंपनियों को जोड़ने भर से 50 लॉन्च का आंकड़ा छूना मुश्किल रहेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भारत का 50 लॉन्च टारगेट कब तक का है?

2030 तक, यानी अभी से सिर्फ चार साल में। यह मौजूदा औसत करीब पांच लॉन्च सालाना से लगभग दस गुना ज़्यादा है।

इस टारगेट के पीछे मुख्य वजह क्या है?

पिछले दस साल में सिर्फ 51 लॉन्च होना और दो हालिया PSLV नाकामियां, दोनों ने भारत की सीमित लॉन्च क्षमता को उजागर किया, जिसके बाद निजी क्षेत्र के साथ रफ्तार बढ़ाने पर ज़ोर बढ़ा।

क्या नए लॉन्च पैड बनने से टारगेट पूरा हो जाएगा?

अकेले नहीं। इंजन मैन्युफैक्चरिंग, टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, रेगुलेटरी क्लियरेंस और मिशन की मांग, इन सबको साथ बढ़ना होगा, वरना पैड बनने के बाद भी रफ्तार अटक सकती है।

भारत में अभी कितने स्पेस स्टार्टअप हैं?

450 से ज़्यादा रजिस्टर्ड स्पेस स्टार्टअप हैं, लेकिन ज़्यादातर कंपोनेंट, सॉफ्टवेयर या ग्राउंड सिस्टम बनाते हैं, अपने खुद के सैटेलाइट लॉन्च नहीं करते।

50 लॉन्च का आंकड़ा सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर, फैक्ट्री और रेगुलेशन तीनों की साथ-साथ परीक्षा है। अगले चार साल में यह साफ होगा कि भारत का स्पेस सेक्टर वाकई हर हफ्ते एक रॉकेट भेजने के काबिल बनता है या नहीं।

स्रोत: Outlook India, IN-SPACe, ISRO