भारत की कंपनियों और शोध संस्थानों ने 5G-6G तकनीक में अब तक 7,700 से ज्यादा पेटेंट फाइल किए हैं, फिर भी देश में एक भी व्यावसायिक 6G नेटवर्क शुरू नहीं हुआ है। यह आंकड़ा जितना बड़ा दिखता है, हकीकत उतनी ही ज्यादा जटिल है।
Patrika की 21 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार Bharat 6G Alliance से जुड़े 90 संस्थान अब स्पेक्ट्रम, चिप और हरित तकनीक जैसे सात अलग-अलग मोर्चों पर काम कर रहे हैं। पर पेटेंट की गिनती और असली नेटवर्क के बीच फासला अभी भी बड़ा है।
आंकड़ों में कहां खड़ा है भारत अभी
Patrika के अनुसार अगस्त 2026 तक Bharat 6G Alliance में दूरसंचार कंपनियां, उपकरण निर्माता, स्टार्टअप, शोध संस्थान और शिक्षण संस्थान मिलाकर 90 सदस्य शामिल हो चुके हैं। गठबंधन ने काम के लिए सात कार्य समूह (working groups) बनाए हैं:
- स्पेक्ट्रम आवंटन
- मूल तकनीक (technology)
- अनुप्रयोग (applications)
- उपकरण और कलपुर्जे (devices)
- हरित तकनीक (green tech)
- 6G के इस्तेमाल के तरीके
पेटेंट के मामले में गठबंधन से जुड़ी भारतीय संस्थाओं के पास 5G-6G तकनीक से जुड़ी 7,700 से ज्यादा फाइलिंग हैं, जिनमें 4,400 से ज्यादा विदेशी फाइलिंग शामिल हैं, यूरोप के करीब 150 देशों के पेटेंट समूहों के अलावा अमेरिका और जापान में भी। केंद्र सरकार का लक्ष्य 2030 तक वैश्विक 6G पेटेंट में करीब 10% हिस्सेदारी पाने का है।
मार्च 2026 में संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लोकसभा में बताया था कि उस समय तक करीब 4,000 पेटेंट योगदान हो चुका था और गठबंधन 14 से बढ़कर 85 संस्थानों तक पहुंच चुका था। यानी मार्च से अगस्त 2026 के बीच पांच महीनों में पेटेंट का आंकड़ा लगभग दोगुना, यानी करीब 90% बढ़ा।
| पैमाना | मार्च 2026 | अगस्त 2026 |
|---|---|---|
| पेटेंट योगदान | करीब 4,000 | 7,700 से ज्यादा |
| गठबंधन के संस्थान | 85 | 90 |
3GPP (थर्ड जनरेशन पार्टनरशिप प्रोजेक्ट) में भी भारत की भागीदारी बढ़ी है। सरकार के अनुसार भारतीय प्रतिभागियों की संख्या 717 से बढ़कर 1,787 हुई है, और भारतीय तकनीकी योगदान 196 से बढ़कर 2,943 हो गया है। यानी भारत सिर्फ पेटेंट फाइल नहीं कर रहा, वैश्विक मानक तय करने की प्रक्रिया में भी सक्रिय हो रहा है।
पहला भ्रम: ज्यादा पेटेंट यानी चीन से आगे निकलना
7,700 से ज्यादा पेटेंट फाइलिंग देखकर लगता है कि भारत अब 6G की दौड़ में सबसे आगे है, पर यह सच नहीं है। Patrika की रिपोर्ट खुद बताती है कि 6G में भारत का सबसे प्रतिस्पर्धी देश चीन है, जो अपने घरेलू नेटवर्क पर पूरी तरह स्वतंत्र रूप से काम कर रहा है।
पेटेंट फाइलिंग तकनीकी योगदान का सिर्फ एक हिस्सा है। असली बढ़त तय होगी 3GPP जैसे वैश्विक मंचों पर मंजूर हुए मानकों, बने हुए स्पेक्ट्रम और आखिर में बिकने वाले उपकरणों से। इसीलिए भारत ने चीन से अलग रणनीति अपनाई है: घरेलू नेटवर्क के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय पेटेंट और गठबंधन पर भी जोर।
दूसरा भ्रम: टेराहर्ट्ज़ टेस्ट का मतलब नेटवर्क तैयार होना
IIT मद्रास, IIT गुवाहाटी और IIT पटना की साझा टीम ने टेराहर्ट्ज़ (terahertz) तकनीक पर काम करते हुए 270 गीगाहर्ट्ज़ (GHz) वायरलेस लिंक पर 6,400 मेगाबिट प्रति सेकंड (Mbps) की डेटा दर दिखाई है, Patrika के अनुसार। यह प्रदर्शन असली उपलब्धि है, पर इसे नेटवर्क समझना गलत होगा।
यह एक लाइन-ऑफ-साइट (line-of-sight) टेस्टबेड लिंक है, यानी दो एंटीना के बीच सीधी नजर वाला प्रयोगशाला परीक्षण, ना कि शहर भर में फैला हुआ नेटवर्क। असली 6G सेवा के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन, टावर, चिप और डिवाइस इकोसिस्टम सबका साथ तैयार होना जरूरी है।
तीसरा भ्रम: 6G भारत में जल्द शुरू हो जाएगा
सितंबर 2026 में भारत अमेरिका सहित 24 अन्य देशों के 'Call to Action for 6G Leadership and Security' गठबंधन में शामिल हुआ। यह घोषणा 1-2 सितंबर 2026 को नॉर्थ कैरोलिना में हुई G20 Innovation Ministerial बैठक में हुई, अमेरिकी वाणिज्य विभाग (US Department of Commerce) के अनुसार। पर इसका मतलब जल्द सेवा शुरू होना नहीं है।
DD India की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर 6G की व्यावसायिक सेवा की उम्मीद 2030 के दशक में है, अभी नहीं। भारत सरकार ने फरवरी 2026 तक टेलीकॉम टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड के तहत 6G शोध से जुड़ी 104 परियोजनाओं को 271 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं, पर यह अभी शोध चरण ही है।
भारत के संदर्भ में
अगर भारत सच में 6G पेटेंट और मानकों में आगे निकलता है, तो इसका मतलब सिर्फ तेज इंटरनेट नहीं है। Patrika के मुताबिक भारतीयों को 6G नेटवर्क पहले और सस्ता मिल सकता है, क्योंकि भारत खुद तकनीक बना रहा है, बाहर से सिर्फ खरीद नहीं रहा। भारत के स्वदेशी VIHAAN ब्रॉडबैंड चिप जैसे प्रोजेक्ट दिखाते हैं कि हार्डवेयर इकोसिस्टम पर भी साथ-साथ काम शुरू हो चुका है।
यह हमारा अंदाज़ा है कि असली चुनौती लैब से बाजार तक पहुंचने की है। ठीक वैसे ही जैसे स्पेसटेक फंडिंग की हकीकत में निवेशक अब कमाई के सबूत मांग रहे हैं, 6G में भी सवाल पेटेंट से आगे जाकर बाजार तक पहुंचने का है। चिप बनाने, टावर लगाने और सस्ते डिवाइस बनाने वाली कंपनियों को साथ लाना अभी बाकी काम है।
किन सवालों के जवाब बाकी हैं
6G के वैश्विक मानक अभी पूरी तरह तय नहीं हुए हैं। 3GPP जैसे मंचों पर काम अभी चल ही रहा है, इसलिए यह साफ नहीं है कि अंतिम तकनीकी मानकों में भारत के कितने प्रस्ताव आखिरकार शामिल होंगे।
यह भी साफ नहीं है कि 7,700 पेटेंट फाइलिंग में से कितनी आखिरकार मंजूर होंगी, और मंजूर पेटेंट से भारत को असल में रॉयल्टी या तकनीकी बढ़त कितनी मिलेगी। पेटेंट फाइल होना और पेटेंट से कमाई होना, दो अलग बातें हैं।
अगली खबर पर नज़र
अगली कुछ तिमाहियों में तीन बातों पर नजर रखना जरूरी होगा। पहला, 3GPP की अगली मानक बैठकों में भारत के कितने प्रस्ताव आधिकारिक तौर पर स्वीकार होते हैं। दूसरा, Bharat 6G Alliance की अगली समीक्षा बैठक में पेटेंट और संस्थानों की संख्या कितनी बढ़ती है।
तीसरा, स्पेक्ट्रम रोडमैप और चिप बनाने वाली कंपनियों की भागीदारी कब सामने आती है, क्योंकि नेटवर्क बनाने के लिए सिर्फ पेटेंट नहीं, पूरा हार्डवेयर इकोसिस्टम भी चाहिए।
भारत की 6G कहानी अभी पहले अध्याय में है। पेटेंट और टेस्टबेड असली प्रगति दिखाते हैं, पर नेटवर्क आने में अभी वक्त लगेगा। अगले कुछ साल यह तय करेंगे कि यह मेहनत असली बढ़त में बदलती है या सिर्फ आंकड़ों में रह जाती है।
भारत में 6G नेटवर्क कब शुरू होगा?
अभी किसी स्रोत ने ठोस तारीख नहीं बताई है। DD India की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर व्यावसायिक 6G सेवा की उम्मीद 2030 के दशक में है, और भारत भी इसी समयसीमा में शामिल माना जा रहा है।
7,700 पेटेंट में से कितने भारत के अपने हैं?
Patrika के अनुसार इनमें से 4,400 से ज्यादा फाइलिंग विदेशी हैं, यानी यूरोप, अमेरिका और जापान जैसे बाजारों में कराई गई हैं। बाकी घरेलू फाइलिंग के तौर पर दर्ज हैं।
6G में भारत का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी कौन है?
Patrika की रिपोर्ट के अनुसार चीन सबसे प्रतिस्पर्धी देश है, जो अपने घरेलू नेटवर्क पर स्वतंत्र रूप से काम कर रहा है, जबकि भारत पेटेंट और अंतरराष्ट्रीय गठबंधन दोनों पर जोर दे रहा है।
क्या पेटेंट फाइल होना यानी पेटेंट मंजूर होना है?
नहीं। फाइलिंग सिर्फ आवेदन की प्रक्रिया है। पेटेंट मंजूर होने में समय लगता है, और हर फाइलिंग आखिर में मंजूर नहीं होती। इसलिए फाइलिंग संख्या को सीधे उपलब्धि जैसा नहीं पढ़ना चाहिए।
स्रोत: Patrika, DD India, US Department of Commerce, Whalesbook, Shabariseva