धनबाद में आइआइटी (आइएसएम) की एक लैब में सुबोध श्रीवास्तव मिट्टी, राख और चूने का एक गीला मिश्रण बार-बार दबाकर परख रहे थे। महीनों की इस मेहनत को अब भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय से पेटेंट संख्या 601531 मिल गई है। तकनीक का नाम है 'Earthen Dam Structure with Compacted Clay-Fly Ash-Lime Core', और मकसद साफ है: बांध के कोर में प्राकृतिक मिट्टी कम, फ्लाई ऐश ज्यादा इस्तेमाल हो।
अर्थन डैम में कोर का काम क्या होता है
भारत में ज्यादातर छोटे और मझोले बांध मिट्टी से बने अर्थन डैम होते हैं, कंक्रीट से नहीं। इनके बीच में एक संकरी परत होती है जिसे कोर कहते हैं। यही कोर पानी को बांध के आर-पार रिसने से रोकती है, बाकी संरचना सिर्फ वजन और ढलान संभालती है।
अब तक कोर के लिए ज्यादातर संकुचित यानी कॉम्पैक्टेड मिट्टी ही इस्तेमाल होती रही है। दिक्कत यह है कि हर जगह बांध लायक अच्छी मिट्टी आसानी से नहीं मिलती, और उसे दूर से लाना महंगा पड़ता है।
पेटेंट में दर्ज है क्या
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, आइआइटी (आइएसएम) धनबाद के सिविल इंजीनियरिंग विभाग को यह भारतीय पेटेंट 4 सितंबर 2026 को मिला। इसकी वैधता आवेदन तिथि से 20 साल तय है। पेटेंट में मिट्टी वाले बांध के कोर के लिए एक नई कंपोजिट सामग्री दर्ज है।
इसमें प्राकृतिक मिट्टी के साथ फ्लाई ऐश मिलाई जाती है, और चूने की मदद से पूरे मिश्रण को स्थिर किया जाता है। शोध टीम के अनुसार यह प्रक्रिया कोर में पानी के रिसाव को नियंत्रित करने के लिए बनाई गई है।
मिश्रण तीन चरणों में तैयार होता है
पहला चरण: उपलब्ध प्राकृतिक मिट्टी में तय अनुपात में फ्लाई ऐश मिलाई जाती है, ताकि मिट्टी की जरूरत घटे। दूसरा चरण: इस मिश्रण में चूना डालकर इसे रासायनिक रूप से स्थिर किया जाता है, जिससे यह पानी के संपर्क में बिखरे नहीं।
तीसरा चरण: तैयार मिश्रण को परतों में डालकर भारी रोलर या रैमर से संकुचित (कॉम्पैक्ट) किया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे पारंपरिक मिट्टी के कोर में होता है। पेटेंट का दावा यही है कि यह तीन-चरण प्रक्रिया सामान्य मिट्टी वाले कोर जितनी ही मजबूती दे सकती है।
रोटी सानने जितना बारीक हिसाब
इसे समझने के लिए रोटी सानने का उदाहरण लीजिए। आटे में पानी कम हो तो वह टूटता है, ज्यादा हो तो चिपचिपा रह जाता है; सही अनुपात पर ही वह मजबूत और लचीला बनता है। बांध के कोर में भी मिट्टी, फ्लाई ऐश और चूने का अनुपात कुछ ऐसा रखा गया है कि मिश्रण पानी रोके, लेकिन दरार भी न पड़े।
टीम का कहना है कि सही अनुपात पर तैयार यह कंपोजिट सामग्री बांध के कोर को मजबूती और जल-रिसाव रोकने की क्षमता, दोनों एक साथ देती है।
छह महीने में तैयार हुआ पेटेंट, बिना बाहरी फंडिंग के
यह शोध संस्थान के अपने संसाधनों से हुआ, किसी बाहरी वित्तीय मदद के बिना। पीएचडी कार्यक्रम के तहत मई 2025 में शुरू हुआ यह काम सिर्फ छह महीने में पूरा हुआ। टीम में ये लोग शामिल रहे:
- सुबोध श्रीवास्तव, शोधकर्ता (पीएचडी कार्यक्रम)
- डॉ. विश्वनाथ एन. खत्री, एसोसिएट प्रोफेसर
- डॉ. आशेष बनर्जी, पूर्व शोध छात्र, अब बीआइटी मेसरा में असिस्टेंट प्रोफेसर
- स्वर्गीय डॉ. श्रीनिवास पसुपुलेटी, पूर्व विभागाध्यक्ष (9 जून 2026 को निधन)
टीम ने पसुपुलेटी के योगदान को श्रद्धापूर्वक याद किया और इसे सामूहिक प्रयास का नतीजा बताया।
भारत के लिए मतलब: राख का ठिकाना, मिट्टी की बचत
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) की 2024-25 रिपोर्ट के अनुसार, देश के 189 कोयला व लिग्नाइट आधारित थर्मल प्लांटों में फ्लाई ऐश का उपयोग 1996-97 के करीब 10% से बढ़कर 96.34% हो चुका है। फिर भी हर साल भारी मात्रा जमा होती रहती है, क्योंकि बिजली उत्पादन ही इतना बड़ा है।
जहां बांध बनाने लायक अच्छी मिट्टी सीमित है, वहां यह तकनीक फ्लाई ऐश को ठिकाना और निर्माण को थोड़ा सस्ता विकल्प, दोनों दे सकती है, ऐसा हमारा आकलन है। कचरे को संसाधन में बदलने की यही सोच GOBARdhan जैसी सरकारी योजनाओं में भी दिखती है, जहां गोबर-कचरे से बायोगैस बनाई जाती है।
वैसे ही IIT Bombay की प्लास्टिक रीसाइक्लिंग तकनीक भी औद्योगिक कचरे को नया कच्चा माल बनाने पर टिकी है। सिविल इंजीनियरिंग से लेकर वेस्ट मैनेजमेंट तक, कचरे को कच्चे माल में बदलने की यह सोच भारत में कई जगह एक साथ उभर रही है।
अनसुलझे सवाल
यह तकनीक अभी पेटेंट और लैब स्तर पर है, किसी असली बांध में लागू नहीं हुई है। टीम ने खुद कहा है कि बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पहले आर्थिक असर और व्यावहारिक क्षमता का विस्तृत आकलन बाकी है।
मिट्टी, फ्लाई ऐश और चूने के अलग-अलग अनुपात का दीर्घकालिक व्यवहार भी अभी जांचा नहीं गया। पेटेंट मिलना और तकनीक का मैदान में उतरना दो अलग पड़ाव हैं, जैसा भारत के 6G पेटेंट के मामले में भी दिखा था, जहां हजारों पेटेंट फाइल होने के बावजूद असली नेटवर्क अभी दूर है।
आगे क्या देखना है
शोध टीम आगे मिट्टी, फ्लाई ऐश और चूने के अलग-अलग मिश्रणों की वहन क्षमता और लंबे समय के व्यवहार पर काम करेगी। इसी आधार पर तय होगा कि तकनीक किसी असली बांध स्थल पर आजमाई जा सकती है या नहीं।
यह तकनीक खासकर उन इलाकों के लिए उपयोगी हो सकती है, जहां बांध के लिए उपयुक्त मिट्टी कम है, पर थर्मल प्लांट से फ्लाई ऐश पर्याप्त मात्रा में मिलती है। अगला बड़ा कदम किसी वास्तविक स्थल पर छोटे पैमाने का फील्ड परीक्षण होगा, जिसकी अभी कोई तारीख तय नहीं है।
क्या यह तकनीक अभी किसी बांध में लगी है?
नहीं। पेटेंट अभी सिर्फ कागज और लैब तक सीमित है। टीम के मुताबिक बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पहले आर्थिक असर और फील्ड व्यवहार्यता का आकलन बाकी है।
पेटेंट किसे और कब मिला?
आइआइटी (आइएसएम) धनबाद के सिविल इंजीनियरिंग विभाग को यह भारतीय पेटेंट 4 सितंबर 2026 को मिला, पेटेंट संख्या 601531 है और इसकी वैधता 20 साल है।
फ्लाई ऐश-मिट्टी मिश्रण का फायदा क्या है?
यह मिश्रण बांध के कोर में पानी का रिसाव नियंत्रित करता है, जबकि प्राकृतिक मिट्टी की खपत घटाकर थर्मल प्लांट की फ्लाई ऐश का इस्तेमाल बढ़ाता है।
आगे कौन-सा कदम बाकी है?
टीम अलग-अलग अनुपात की वहन क्षमता और दीर्घकालिक व्यवहार पर शोध करेगी, उसके बाद ही किसी असली बांध स्थल पर फील्ड ट्रायल की बात तय होगी।
पेटेंट किसी तकनीक के लैब से निकलने का पहला कदम भर होता है, आखिरी नहीं। धनबाद की यह टीम अब उसी अगले, ज्यादा मुश्किल पड़ाव की तैयारी में है।
स्रोत: Amar Ujala, Prabhat Khabar, Central Electricity Authority (CEA)