2000 से 2023 के बीच भारत में वायु प्रदूषण से जुड़ी मौतें 43% बढ़कर करीब 20 लाख सालाना हो गईं। इसी बीच अप्रैल 2026 में संयुक्त राष्ट्र को सौंपी गई भारत की जलवायु योजना में "वायु प्रदूषण" और "वायु गुणवत्ता" शब्द एक बार भी नहीं आते। यह फर्क ही Global Climate and Health Alliance (GCHA) के 14 अक्टूबर 2026 के स्कोरकार्ड की मुख्य खबर है।
पहले बनाम अब: मौतों के अनुमान कैसे बदले
The Probe के अनुसार State of Global Air 2025 रिपोर्ट (Health Effects Institute और IHME) ने 2023 में भारत में वायु प्रदूषण से जुड़ी करीब 20 लाख मौतें गिनीं, जो 2000 के मुकाबले 43% ज़्यादा हैं। यह प्रति एक लाख आबादी पर 186 मौतें बैठता है, जबकि उच्च-आय वाले देशों में यह दर 17 है।
इन्हीं आंकड़ों से एक सीधा हिसाब निकलता है: 186 को 17 से भाग दें तो भारत में प्रति व्यक्ति मौत की दर उच्च-आय वाले देशों से करीब 11 गुना बैठती है। और 2023 के 20 लाख को 43% बढ़ोतरी से भाग देने पर 2000 में करीब 14 लाख का स्तर निकलता है। यह गणना यहां खुद निकाली गई है, किसी रिपोर्ट का सीधा आंकड़ा नहीं।
अलग-अलग अध्ययनों के आंकड़े अलग हैं, क्योंकि उनके तरीके और तुलना के पैमाने अलग हैं। इन्हें सीधे जोड़कर रुझान नहीं निकाला जाना चाहिए।
| अध्ययन | वर्ष | अनुमानित मौतें |
|---|---|---|
| ICMR और अन्य का अध्ययन (Health Policy Watch के अनुसार) | 2019 | करीब 17 लाख |
| Lancet Planetary Health का भारत-व्यापी अध्ययन (Health Policy Watch के अनुसार) | 2019 | करीब 18 लाख |
| Lancet Countdown (मानव-जनित PM2.5) | 2022 | 17 लाख से ज़्यादा |
| State of Global Air 2025 | 2023 | करीब 20 लाख |
Lancet Countdown ने 2022 के आंकड़े को 2010 के मुकाबले 38% ज़्यादा बताया और उसमें 44% मौतें जीवाश्म ईंधन से जुड़ी थीं। उसी रिपोर्ट में बाहरी वायु प्रदूषण से समय से पहले मौतों का आर्थिक नुकसान 339.4 अरब डॉलर, यानी GDP का 9.5% आंका गया।
जलवायु योजना में 2 अंक: स्कोरकार्ड क्या कहता है
GCHA ने 14 अक्टूबर को जिनेवा में 117 राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं (132 देशों की) को स्वास्थ्य के पैमाने पर आंका। हर योजना को 32 में से अंक मिले और भारत को सिर्फ 2। GCHA के अनुसार जापान और न्यूज़ीलैंड भी 2 अंक पर हैं।
ThePrint के मुताबिक भारत को आठ में से छह मानकों पर शून्य मिला। इनमें जलवायु के स्वास्थ्य असर की गणना, वायु प्रदूषकों का नाम और स्वास्थ्य क्षेत्र के अनुकूलन की नीतियां शामिल हैं। GCHA ने यह भी लिखा कि भारत में वायु प्रदूषण से मौतों का बोझ ऊंचा है, फिर भी योजना में इसका संदर्भ नहीं है।
पड़ोसियों और दुनिया से तुलना
The Probe के अनुसार भारत के कई पड़ोसी, जो आमतौर पर कम संसाधन वाले हैं, इस स्कोरकार्ड पर कहीं आगे रहे। पूरी दुनिया का औसत स्कोर 11.8 रहा।
| देश | स्कोर (32 में से) |
|---|---|
| कोलंबिया (सबसे ऊपर) | 29 |
| नाइजीरिया | 25 |
| नेपाल, श्रीलंका | 19 (हर एक) |
| बांग्लादेश | 13 |
| पाकिस्तान | 12 |
| भूटान | 10 |
| भारत | 2 |
योजना में क्या है और क्या नहीं
भारत ने 2031-2035 की अपनी योजना 24 अप्रैल 2026 को जमा की। The Probe और Climate Fact Checks के अनुसार इसके तीन मुख्य वादे हैं: GDP की उत्सर्जन तीव्रता 2005 के स्तर से 47% घटाना, बिजली क्षमता का 60% गैर-जीवाश्म स्रोतों से लेना, और जंगलों-पेड़ों से 3.5 से 4 अरब टन अतिरिक्त CO2 सोखने की क्षमता बनाना।
The Probe ने दस्तावेज़ को पढ़कर लिखा कि उसमें "heatwave" और "coal" शब्द भी नहीं हैं। उसके अनुसार योजना बनाने वाले दस अंतर-मंत्रालयी कार्य-समूहों में एक भी स्वास्थ्य पर नहीं था, और अतिरिक्त लाभ वाले सवाल का जवाब सिर्फ "Not Applicable" दिया गया।
भारत के लिए मतलब
वायु प्रदूषण और जलवायु बदलाव का स्रोत काफी हद तक एक ही है: कोयला, तेल और गैस का जलना। इसलिए कार्बन घटाने वाली नीति साफ हवा का भी फायदा देती है, और GCHA का तर्क है कि स्वास्थ्य को योजना में न जोड़ने से यह फायदा गिनती से छूट जाता है।
सर्दी लौटते ही उत्तर भारत में धुंध वापस आएगी। हमने GRAP 2026 के संशोधित चरणों और बिहार में कम लागत वाले सेंसरों से दिखी छिपी प्रदूषण मार पर पहले लिखा है। गर्मी और स्वास्थ्य का रिश्ता Wellcome के गर्भावस्था सर्वे में भी दिखा था।
हमारा आकलन है कि यह स्कोरकार्ड पर्यावरण से ज़्यादा लिखित प्राथमिकता की परीक्षा है। भारत के पास राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम और कई राज्यों की हीट एक्शन योजनाएं हैं, पर वे इस जमा की गई योजना के पन्नों में नहीं दिखतीं।
जो अभी पता नहीं
GCHA सिर्फ यह आंकता है कि योजना के दस्तावेज़ में क्या लिखा है, ज़मीन पर सरकारें क्या करती हैं यह नहीं। संस्था खुद यह मानती है। इसलिए 2 अंक का मतलब यह नहीं कि भारत स्वास्थ्य की परवाह नहीं करता।
भारत की योजना यह भी कहती है कि दुनिया की करीब 17% आबादी वाले इस देश का 1850 से अब तक के कुल CO2 उत्सर्जन में 4% से कम हिस्सा है, और उसके लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त मिलने पर टिके हैं।
The Probe के अनुसार दिसंबर 2025 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यसभा में कहा था कि वायु प्रदूषण को अकेले मौत या बीमारी का सीधा कारण साबित करने वाला निर्णायक डेटा देश में उपलब्ध नहीं है। मौतों के आंकड़ों पर यह असहमति अभी बनी हुई है।
एक और बात अभी साफ नहीं है: GCHA ने भारत और जापान के उत्सर्जन लक्ष्यों को Climate Action Tracker के आकलन के आधार पर पेरिस समझौते के अनुरूप नहीं माना है। यह एक अलग संस्था का निष्कर्ष है, जिस पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया इस रिपोर्ट के साथ दर्ज नहीं है।
आगे क्या देखें
पहला, COP31, जो The Probe के अनुसार तुर्किये के अंताल्या में 9 से 20 नवंबर 2026 तक चलेगा और जहां स्वास्थ्य पर पहली बार औपचारिक चर्चा होगी। दूसरा, क्या भारत सरकार इस स्कोरकार्ड पर कोई जवाब देती है। तीसरा, इस सर्दी की धुंध के आंकड़े, जो बताएंगे कि बहस ज़मीन तक कितनी पहुंचती है।
बीस लाख सालाना मौतों का आंकड़ा और दो अंक का स्कोर एक ही देश के दो चेहरे हैं। असली सवाल यह है कि क्या अगली योजना में इन्हें एक पन्ने पर साथ रखा जाएगा।
स्रोत: GCHA, The Probe, ThePrint, State of Global Air 2025, Lancet Countdown, Health Policy Watch