आम धारणा है कि भीषण गर्मी की मार सबसे ज़्यादा खुले में काम करने वाले मज़दूरों पर पड़ती है। पर भीषण गर्मी और गर्भावस्था पर Wellcome के नए सर्वे की तस्वीर अलग है: भारत समेत पांच देशों के मातृ-स्वास्थ्यकर्मियों में से 73% ने पिछले पांच साल में गर्भवती महिलाओं में गर्मी से जुड़ी दिक्कतें बढ़ती देखी हैं।
Wellcome का सर्वे: पांच देश, करीब 1,000 स्वास्थ्यकर्मी
यह सर्वे फिजी में हुई Pre-COP मंत्री-स्तरीय बैठक के मौके पर 5 अक्टूबर 2026 को जारी हुआ। Business Today के अनुसार इसमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, ब्रिटेन और ज़िम्बाब्वे के 200-200 डॉक्टर, दाइयां और नर्सें शामिल थीं।
Health Policy Watch के मुताबिक Censuswide ने यह ऑनलाइन पोल 17 सितंबर से 1 अक्टूबर के बीच चलाया। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु प्रमुख Simon Stiell ने इसी सर्वे का हवाला देते हुए गर्भावस्था और प्रसव को जलवायु संकट की नई फॉल्ट लाइन बताया।
Health Policy Watch के अनुसार यह बैठक COP31 से पहले जलवायु मंत्रियों की आखिरी बड़ी बैठक थी। ऐसा लगता है कि रिपोर्ट का समय इसलिए चुना गया ताकि मातृ-स्वास्थ्य वार्ता की मेज़ पर आ सके, पर Wellcome ने इसकी पुष्टि नहीं की है।
- 73% ने गर्भवती महिलाओं में गर्मी से जुड़ी दिक्कतें बढ़ती देखीं।
- 76% ने गर्भस्थ शिशु या नवजात की सेहत पर ऐसा असर देखा।
- 98% ने किसी गर्भवती महिला की और 99% ने किसी शिशु की देखभाल की, जिसकी सेहत गर्मी से प्रभावित मानी गई।
- 92% ने कहा कि उन्हें गर्मी से बचाव के लिए और प्रशिक्षण व संसाधन चाहिए।
गर्मी गर्भावस्था को कैसे प्रभावित करती है
Wellcome की रिपोर्ट के अनुसार ऊंचे तापमान में त्वचा की सतह की रक्त-नलिकाएं फैल जाती हैं। इससे गर्भवती महिला में प्लेसेंटा (गर्भनाल से जुड़ा अंग) तक रक्त प्रवाह घट सकता है और भ्रूण तक ऑक्सीजन व पोषण कम पहुंचता है।
Wellcome के हवाले से Down To Earth ने लिखा कि गर्मी में हर 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़त पर समय से पहले जन्म की संभावना करीब 5% बढ़ती है, जबकि हीटवेव के संपर्क में प्रसूति संबंधी जटिलताओं का जोखिम करीब 25% ज़्यादा पाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक समय से पहले जन्म, कम वज़न और मृत जन्म का खतरा भी इसी से जुड़ा है।
पांच देशों का हिसाब: भारत सबसे नीचे क्यों दिखा
सर्वे में अलग-अलग देशों के आंकड़े भी दिए गए हैं। IPS News के अनुसार जिन स्वास्थ्यकर्मियों ने कहा कि पिछले पांच साल में गर्भवती महिलाओं में गर्मी से जुड़ी दिक्कतें बढ़ीं, उनका हिस्सा देश-दर-देश काफी अलग रहा।
| देश | गर्मी से जुड़ी दिक्कतें बढ़ने की बात कहने वाले (%) |
|---|---|
| ज़िम्बाब्वे | 85 |
| ऑस्ट्रेलिया | 79 |
| ब्राज़ील | 74 |
| ब्रिटेन | 66 |
| भारत | 62 |
200 उत्तरदाताओं के हिसाब से देखें तो ज़िम्बाब्वे में करीब 170 लोगों ने यह बढ़ोतरी देखी, जबकि भारत में करीब 124 ने। फर्क 46 लोगों का है, पर दोनों जगह बहुमत का जवाब एक ही दिशा में है: गर्मी की दिक्कतें पहले से बढ़ी हैं।
हमें लगता है कि भारत का सबसे निचले पायदान पर दिखना यह नहीं बताता कि यहां गर्मी का खतरा कम है। यह सिर्फ इतना बताता है कि सर्वे में शामिल भारतीय स्वास्थ्यकर्मियों में कम लोगों ने इसे बढ़ता हुआ देखा। इसके पीछे की वजह सर्वे के आंकड़ों से साफ नहीं होती।
भारत के लिए मतलब: क्लिनिक तक पहुंच और आने वाली सर्दी
रिपोर्ट के अनुसार एक चौथाई से ज़्यादा स्वास्थ्यकर्मियों ने देखा कि हीटवेव के दौरान कम महिलाएं अस्पताल या क्लिनिक पहुंचती हैं। यह खासकर उन विकासशील इलाकों में चिंता की बात है जहां करोड़ों लोग पैदल चलकर इलाज तक पहुंचते हैं। भारत के गांवों के लिए यह सीधा सवाल है।
मान लीजिए किसी गांव की गर्भवती महिला का स्वास्थ्य केंद्र दो किलोमीटर दूर है और जांच का समय दोपहर का है। तेज़ गर्मी में वह पैदल जाने के बजाय टाल सकती है। एक छूटी जांच अपने आप में छोटी बात लगती है, पर यही सर्वे में दर्ज उस पैटर्न की जड़ हो सकती है।
आगे का मौसम भी राहत भरा नहीं दिखता। Climate Impact Lab के अनुमान के मुताबिक अल-नीनो से भारत में गर्मी से जुड़ी अतिरिक्त मौतें दिसंबर से फरवरी के बीच भी हो सकती हैं। पहले हमने गर्मी और PM2.5 प्रदूषण के साझा असर पर भी लिखा था।
Wellcome की मांग है कि WHO गर्मी, गर्भावस्था और प्रसव के बाद की अवधि पर अपनी पहली क्लिनिकल गाइडलाइन बनाए, और सरकारें गर्भवती महिलाओं व नवजातों को अपनी राष्ट्रीय जलवायु-स्वास्थ्य योजनाओं में शामिल करें। Business Today के अनुसार 55% स्वास्थ्यकर्मी मानते हैं कि साफ राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देश उनकी मदद करेंगे।
अनसुलझे सवाल
Health Policy Watch ने साफ लिखा है कि यह पोल क्लिनिकल रिकॉर्ड नहीं, बल्कि स्वास्थ्यकर्मियों ने जो देखा उसे दर्ज करता है। यानी यह धारणा का सर्वे है, अस्पतालों के असली केस-आंकड़ों का हिसाब नहीं।
5% और 25% जैसे आंकड़े इस सर्वे के नहीं हैं। वे पहले के शोध से लिए गए हैं जिन्हें Wellcome ने अपनी रिपोर्ट में उद्धृत किया है, इसलिए उन्हें सर्वे के नतीजों से अलग पढ़ना चाहिए।
यह भी पता नहीं कि भारत में गर्मी के कारण समय से पहले जन्म या मृत जन्म के कितने मामले बढ़े, क्योंकि सर्वे में देश-वार केस संख्या नहीं दी गई। प्रति देश 200 उत्तरदाताओं का नमूना पूरे देश की तस्वीर भी नहीं दे सकता।
आगे क्या देखें
तीन बातें देखने लायक हैं। पहला, WHO इस मांग पर कोई प्रतिक्रिया देता है या नहीं। दूसरा, COP31 से पहले जलवायु-स्वास्थ्य योजनाओं में गर्भवती महिलाओं का ज़िक्र जुड़ता है या नहीं। तीसरा, भारत की सरकारी हीट एक्शन प्लान में मातृ-स्वास्थ्य के लिए अलग प्रावधान आते हैं या नहीं, जिसके बारे में अभी कोई घोषणा नहीं हुई है।
इन तीनों में से जो भी कदम पहले दिखे, वही बताएगा कि सर्वे का असर नीति तक पहुंचा या नहीं।
एक बात और साफ रहनी चाहिए: Wellcome जैसी संस्था की मांगें नीति-निर्माताओं के लिए सुझाव हैं, बाध्यकारी फैसले नहीं। WHO की गाइडलाइन बनने में अक्सर लंबा वक्त लगता है, इसलिए तात्कालिक राहत स्थानीय स्वास्थ्य तंत्र की तैयारी से ही आएगी, जैसे गर्मी में जांच का समय सुबह या शाम करना।
गर्मी की बहस अक्सर तापमान के आंकड़ों पर रुक जाती है। यह सर्वे उसे अस्पताल के प्रसव कक्ष तक ले जाता है, जहां असर सबसे नाज़ुक होता है।
स्रोत: Wellcome, ThePrint, Health Policy Watch, Down To Earth, IPS News, Business Today