भारत का 9वां India International Water Week (IIWW-2026) 25 सितंबर 2026 को दिल्ली के भारत मंडपम में खत्म हुआ। दो साल पहले, सितंबर 2024 में जब 'जल संचय जन भागीदारी' अभियान शुरू हुआ था, तब लक्ष्य 1 करोड़ जल-संरचनाओं का रखा गया था।

अब जल शक्ति मंत्रालय बता रहा है कि 60 लाख संरचनाएं बन चुकी हैं—यानी आधे रास्ते से थोड़ा आगे। सवाल यह है कि बाकी बचा हिस्सा कितनी तेजी से पूरा होगा, और क्या यह अकेले संख्या का खेल है या असल जमीनी बदलाव भी।

पांच दिन में जल सप्ताह ने क्या तय किया

जल शक्ति मंत्रालय ने यह आयोजन 22 से 26 सितंबर 2026 तक भारत मंडपम में रखा। थीम रही 'Climate Resilient Water Management', यानी जलवायु के उतार-चढ़ाव झेल सके ऐसा जल प्रबंधन। यह थीम ऐसे साल में आई है जब देश अल-नीनो से मॉनसून और गर्मी पर पड़ने वाले असर से जूझ रहा है।

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने 22 सितंबर को उद्घाटन किया; समापन सत्र 25 सितंबर को हुआ, और 26 सितंबर को दिल्ली-आगरा स्टडी टूर के साथ पूरा कार्यक्रम बंद हुआ।

इस बार नीदरलैंड्स और जर्मनी साझीदार देश रहे, साथ ही 14 राज्य और 6 केंद्रीय मंत्रालय भी साझीदार बने। पांच दिनों में शामिल रहे:

  • मंत्रिस्तरीय पूर्ण सत्र और वैश्विक जल-नेताओं की चर्चा
  • देश-वार फोरम और उद्योग मंच
  • स्टार्टअप और युवा फोरम
  • 22-24 सितंबर को दूसरा अंतरराष्ट्रीय WASH सम्मेलन

WASH सम्मेलन में पीने के पानी, साफ-सफाई और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर अलग से चर्चा हुई, ताकि गांव-कस्बों तक सस्ती और टिकाऊ तकनीक पहुंचाई जा सके। 22 से 25 सितंबर तक चली प्रदर्शनी में देश-विदेश की कंपनियों ने जल-तकनीक के नए मॉडल भी दिखाए।

60 लाख बनाम 1 करोड़: लक्ष्य से कितनी दूर हैं हम

जल सप्ताह के दौरान मंत्री सी.आर. पाटिल ने बताया कि 'जल संचय जन भागीदारी' के तहत अब तक 60 लाख कृत्रिम रिचार्ज और जल-संरक्षण संरचनाएं बन चुकी हैं। यह अभियान सितंबर 2024 में शुरू हुआ था और लक्ष्य 1 करोड़ संरचनाओं का रखा गया।

पैमानाआंकड़ा
अभियान शुरूसितंबर 2024
अब तक बनी संरचनाएं (सितंबर 2026)60 लाख
कुल लक्ष्य1 करोड़
बीता समयकरीब 2 साल

हमारा मोटा हिसाब: अगर पिछले 2 साल में औसतन हर साल करीब 30 लाख संरचनाएं बनी हैं, तो बचे हुए 40 लाख को पूरा करने में करीब डेढ़ साल और लग सकते हैं—बशर्ते रफ्तार वही बनी रहे। यह सिर्फ एक साधारण गणित है; मंत्रालय की कोई आधिकारिक समयसीमा अभी सार्वजनिक नहीं है।

नीदरलैंड्स और जर्मनी को साझीदार क्यों बनाया गया

भारत ने जिन दो देशों को इस बार तवज्जो दी, उनके साथ जल-सहयोग का इतिहास पुराना है। नीदरलैंड्स के साथ 2016 से भारत-यूरोपीय संघ जल भागीदारी चल रही है, जिसमें नदी-बेसिन प्रबंधन और तकनीक हस्तांतरण पर काम होता है।

जर्मनी के साथ इंडो-जर्मन साइंस एंड टेक्नोलॉजी सेंटर (IGSTC) ने फरवरी 2026 में दिल्ली में एक सम्मेलन किया था, जिसमें 'दो-दो मॉडल' पेश हुआ—यानी जर्मन और भारतीय संस्थान मिलकर जल-तकनीक पर काम करेंगे, खासकर पानी में मौजूद उन प्रदूषकों पर जो सामान्य ट्रीटमेंट से नहीं हटते।

साझीदारमुख्य फोकसजुड़ाव कब से
नीदरलैंड्सनदी-बेसिन प्रबंधन, तकनीक हस्तांतरण2016 (EU-India Water Partnership)
जर्मनी (IGSTC)प्रदूषक हटाने की तकनीक, संयुक्त शोधफरवरी 2026 का सम्मेलन
भारत की अपनी योजनारिचार्ज व संरक्षण संरचनाएंसितंबर 2024 से

भारत के लिए मतलब: चुनौतियां और मौके

भारत के लिए जल एक अलग तरह की चुनौती है। नीति आयोग के समग्र जल प्रबंधन सूचकांक के अनुसार, 2021 में देश की सालाना प्रति-व्यक्ति जल उपलब्धता करीब 1,486 घन मीटर थी, जो 1,700 घन मीटर की वैश्विक 'जल-तनाव' सीमा से नीचे है। यानी आंकड़ों में ही भारत जल-तनाव वाले देशों में गिना जाता है, और यह तनाव घटते भूजल स्तर से और बढ़ जाता है।

नीति आयोग के इसी सूचकांक के मुताबिक करीब 60 करोड़ भारतीय उच्च से लेकर अत्यधिक जल-तनाव वाले इलाकों में रहते हैं। यह पैमाना बताता है कि सिर्फ नई संरचनाएं बनाना काफी नहीं, मौजूदा भूजल और नदियों का बेहतर हिसाब रखना भी उतना ही जरूरी है।

पानी भारत में संविधान के तहत राज्य का विषय है, इसलिए केंद्र और राज्यों के तालमेल के बिना कोई भी विदेशी तकनीक जमीन पर बड़ा असर नहीं दिखा पाती। साथ ही औद्योगिक इलाकों में सस्ती शोधन तकनीकें भी उतनी ही जरूरी हैं, जैसे IIT मद्रास की ECOOP तकनीक कपड़ा उद्योग के लिए दिखा चुकी है।

अभी क्या साफ नहीं है

मंत्रालय ने 60 लाख का आंकड़ा सार्वजनिक तौर पर बताया है, पर यह संख्या राज्य-वार या ढांचे के प्रकार (चेक डैम, बोरवेल रिचार्ज, तालाब) के हिसाब से अलग-अलग उपलब्ध नहीं है।

यह भी साफ नहीं कि हर संरचना की गुणवत्ता या असल जल-भराव क्षमता का स्वतंत्र सत्यापन हुआ है या नहीं। जल सप्ताह की चर्चाओं से निकला कोई औपचारिक घोषणापत्र या ठोस कार्ययोजना दस्तावेज़ भी अभी सार्वजनिक रूप से जारी नहीं हुआ है।

आगे क्या देखें

तीन चीजें देखने लायक हैं। पहला, जल शक्ति मंत्रालय आने वाले महीनों में राज्य-वार प्रगति रिपोर्ट जारी करता है या नहीं। दूसरा, नीदरलैंड्स-जर्मनी के साथ हुई चर्चाओं से कोई ठोस समझौता या पायलट प्रोजेक्ट सामने आता है या नहीं। तीसरा, 10वां जल सप्ताह किस शहर और किस थीम पर होगा—इसकी घोषणा अभी बाकी है।

अंत

पांच दिन के भाषणों और प्रदर्शनियों के बाद असली परीक्षा अगले साल की बारिश और अगली गर्मी में होगी—जब पता चलेगा कि जमीन पर बने ये लाखों ढांचे वाकई कितना पानी बचा पाते हैं।

जल संचय जन भागीदारी अभियान क्या है?

यह सितंबर 2024 में शुरू हुआ केंद्रीय अभियान है, जिसका मकसद देशभर में कृत्रिम रिचार्ज और जल-संरक्षण की संरचनाएं बनाना है। लक्ष्य 1 करोड़ संरचनाओं का है; सितंबर 2026 तक जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार करीब 60 लाख बन चुकी हैं।

IIWW-2026 की थीम क्या थी?

थीम रही 'Climate Resilient Water Management', यानी जलवायु के उतार-चढ़ाव झेल सके ऐसा जल प्रबंधन। यही थीम मंत्रिस्तरीय सत्रों, देश-फोरम और तकनीकी प्रदर्शनी के केंद्र में रही।

इस बार साझीदार देश कौन थे?

नीदरलैंड्स और जर्मनी साझीदार देश रहे। दोनों का भारत के साथ जल-सहयोग का पुराना ढांचा है—नीदरलैंड्स के साथ 2016 से, और जर्मनी के IGSTC के साथ फरवरी 2026 के सम्मेलन के बाद से।

स्रोत: PIB, जल शक्ति मंत्रालय, IANS, नीति आयोग, Indo-German Science & Technology Centre (IGSTC)