क्या कोई टेलीस्कोप James Webb से भी गहरी झांक ब्रह्मांड में लगा सकता है, वो भी अलग रंग की रोशनी में? NASA का जवाब है हां, बशर्ते वह far-infrared यानी बहुत लंबी तरंगदैर्ध्य वाली रोशनी में देखे। इसी सवाल का जवाब देने के लिए NASA ने अपने नए PRIMA टेलीस्कोप को अगले डिजाइन चरण में भेज दिया है।
NASA ने आखिर क्या घोषणा की है
23 सितंबर 2026 को NASA ने बताया कि PRIMA यानी PRobe far-Infrared Mission for Astrophysics अब Phase B में पहुंच गया है, जो किसी भी मिशन के प्रारंभिक डिजाइन और तकनीक विकास का चरण होता है। यह NASA की नई Probe Explorers श्रेणी का पहला मिशन है, जो James Webb और Roman Space Telescope जैसे बड़े फ्लैगशिप मिशनों और छोटे Explorer मिशनों के बीच की कड़ी है।
अगर PRIMA अगले confirmation review में पास होता है, तो इसका बजट 1.2 अरब डॉलर तक सीमित रहेगा, जिसमें लॉन्च का खर्च शामिल नहीं है। मिशन को 2033 में लॉन्च करने का लक्ष्य रखा गया है, जो पांच साल तक चलेगा।
NASA मुख्यालय की साइंस मिशन डायरेक्टोरेट की एसोसिएट एडमिनिस्ट्रेटर निकी फॉक्स के अनुसार PRIMA ब्रह्मांड में उन हिस्सों को उजागर करेगा जो अभी तक धुंधले रहे हैं, ताकि ग्रहों, तारों और ब्लैक होल के बनने के साथ-साथ पृथ्वी पर पानी के आने की कहानी भी बेहतर समझी जा सके। इस मिशन को JPL, NASA गोडार्ड और NASA मार्शल सेंटर मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं, जबकि University of Maryland और Caltech भी डिजाइन में शामिल हैं।
Far-Infrared ही क्यों जरूरी है
James Webb Space Telescope near और mid-infrared रोशनी देखने के लिए बना है, जबकि जमीन के रेडियो टेलीस्कोप बहुत लंबी तरंगों को पकड़ते हैं। इन दोनों के बीच का हिस्सा, यानी far-infrared, अभी काफी हद तक खाली पड़ा है।
इस रेंज में आखिरी बड़ा टेलीस्कोप यूरोपीय स्पेस एजेंसी का Herschel था, जो 2013 में अपना तरल हीलियम कूलेंट खत्म होने के बाद बंद हो गया। तब से इस तरंगदैर्ध्य में कोई बड़ा नया ऑब्जर्वेटरी नहीं भेजा गया।
अमेरिका की Astro2020 Decadal Survey रिपोर्ट ने ही NASA को far-infrared इमेजिंग या स्पेक्ट्रोस्कोपी वाले किसी Probe मिशन की सिफारिश की थी। इसी सिफारिश के बाद 2023 में NASA ने ऐसे मिशन डिजाइन मांगे थे, जिनमें से PRIMA को चुना गया।
PRIMA में ऐसा नया क्या है
PRIMA का मुख्य दर्पण करीब 1.8 मीटर चौड़ा होगा और यह करीब 24 से 235 माइक्रोमीटर तरंगदैर्ध्य की रोशनी में ब्रह्मांड को स्कैन करेगा। इसके डिटेक्टर, जिन्हें Kinetic Inductance Detector कहा जाता है, क्वांटम स्तर तक संवेदनशील बताए जाते हैं।
JPL के अनुसार ये डिटेक्टर पिछले far-infrared उपकरणों के मुकाबले तीन से पांच गुना तेज स्पेक्ट्रल सर्वे कर सकते हैं। इससे कम समय में ज्यादा हिस्से के आसमान को स्कैन किया जा सकेगा।
टेलीस्कोप में दो मुख्य उपकरण लगेंगे, जिन्हें साथ में PRIMAger कहा गया है। इनमें से एक हिस्सा कम स्पेक्ट्रल डिटेल के साथ बड़े इलाकों की इमेजिंग करेगा, जबकि दूसरा हिस्सा पोलराइज्ड रोशनी पकड़कर धूल भरे बादलों की बनावट समझने में मदद करेगा। यह डिजाइन Herschel के मुकाबले कहीं तेज और बारीक डेटा देने के लिए बनाया गया है।
JWST, Roman और PRIMA का फर्क
| टेलीस्कोप | मुख्य रोशनी | अनुमानित बजट |
|---|---|---|
| James Webb | Near व Mid-Infrared | 10 अरब डॉलर से ज्यादा |
| Roman | Near-Infrared, वाइड फील्ड सर्वे | 10 अरब डॉलर के करीब |
| PRIMA | Far-Infrared | अधिकतम 1.2 अरब डॉलर |
NASA के अधिकारियों के अनुसार Webb और Roman जैसे बड़े फ्लैगशिप मिशनों के बीच PRIMA जैसे मझोले Probe मिशन एक नियमित रफ्तार बनाए रखते हैं, ताकि हर कुछ साल में कोई न कोई बड़ा नया टेलीस्कोप तैयार रहे। हमारा हिसाब: अगर तीनों टेलीस्कोप के बजट को जोड़ दें, तो यह रकम 20 अरब डॉलर से भी ऊपर जाती है, फिर भी इनमें से सबसे छोटा PRIMA अपनी अलग तरंगदैर्ध्य की वजह से बाकी दोनों जितना ही वैज्ञानिक रूप से जरूरी माना जा रहा है।
भारत के लिए इसका मतलब
भारत के पास अभी PRIMA जैसा कोई समर्पित far-infrared स्पेस टेलीस्कोप नहीं है। हमारी राय में 1.2 अरब डॉलर का यह बजट भी Aditya-L1 जैसे भारतीय मिशनों के मुकाबले कई गुना बड़ा है, जो दिखाता है कि दुनिया की बड़ी अंतरिक्ष एजेंसियां किस स्तर पर निवेश कर रही हैं।
फिर भी, PRIMA जैसे मिशनों से मिलने वाला डेटा आमतौर पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होता है, जिसका इस्तेमाल भारतीय खगोलविद भी अपनी रिसर्च में कर सकते हैं, खासकर तारों और ग्रहों के बनने से जुड़े सवालों पर। भारत की अपनी वेधशालाएं, जैसे AstroSat, अभी मुख्य रूप से X-ray और अल्ट्रावायलेट रेंज पर केंद्रित हैं, इसलिए far-infrared जैसा डेटा भारतीय शोधकर्ताओं के लिए एक नई खिड़की खोल सकता है।
दूरगामी नजरिए से देखें तो PRIMA की सफलता या नाकामी यह भी तय करेगी कि क्या भारत जैसे देश आगे चलकर अपनी खुद की far-infrared वेधशाला बनाने की सोचें, या फिर विदेशी मिशनों के डेटा और सहयोग पर निर्भर रहें।
अभी क्या पता नहीं है और आगे क्या देखना है
PRIMA अभी सिर्फ Phase B में है। इसका आगे बढ़ना एक confirmation review पर निर्भर करता है, जो इसकी तकनीकी तैयारी, समयसीमा और बजट, तीनों को परखेगा। अगर यह समीक्षा पास नहीं होती, तो मिशन में देरी या बदलाव भी हो सकता है। PRIMA जैसे मझोले मिशनों के इतिहास में कई बार डिजाइन चरण से लॉन्च तक की तारीख आगे भी खिसकती रही है, इसलिए 2033 की तारीख को अभी अंतिम मानना जल्दबाजी होगी।
- PRIMA का confirmation review और उसके बाद Phase C में प्रवेश
- Kinetic Inductance Detector जैसी नई तकनीक की आगे की टेस्टिंग
- 2033 की लॉन्च तारीख आगे बदलती है या स्थिर रहती है
अगर सब योजना के मुताबिक चला, तो PRIMA Beta Pictoris b जैसे एक्सोप्लैनेट अध्ययनों को भी नई far-infrared जानकारी से पूरक बना सकता है, हालांकि यह मेल अभी सिर्फ एक संभावना है, कोई पक्की योजना नहीं।
PRIMA अभी सिर्फ एक डिजाइन पर मौजूद टेलीस्कोप है, आसमान में नहीं। लेकिन अगर 2033 तक इसकी लॉन्च योजना कायम रहती है, तो यह far-infrared खगोल विज्ञान में एक दशक से ज्यादा के सूखे को खत्म कर देगा।
स्रोत: NASA, Live Science, Caltech, MPIA, JPL