बहुत से लोगों को लगता है कि चीन और अमेरिका के बीच रेयर अर्थ मैग्नेट पर चल रही तनातनी सिर्फ एक व्यापार-युद्ध की खबर है, जो बातचीत से जल्दी सुलझ जाएगी। असल में यह मैग्नेट, जो हर इलेक्ट्रिक गाड़ी और लड़ाकू विमान के मोटर में लगता है, भारत के उद्योग के लिए एक असली, लंबी चलने वाली सप्लाई चेन समस्या बन चुका है।

ये मैग्नेट इलेक्ट्रिक गाड़ी की मोटर, पवन ऊर्जा की टरबाइन, स्मार्टफोन के स्पीकर और लड़ाकू विमान तक में इस्तेमाल होते हैं। एक सामान्य इलेक्ट्रिक कार में ही करीब 1-2 किलोग्राम रेयर अर्थ मैग्नेट लगता है, यानी यह कोई मामूली कल-पुर्जा नहीं, बल्कि पूरी सप्लाई चेन की नींव है।

चीन ने अगस्त में मैग्नेट निर्यात 21% घटाया, क्यों?

चीन के सीमा शुल्क विभाग के आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में अमेरिका को सिर्फ 512 मीट्रिक टन रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट भेजे गए, जो जुलाई के 647 मीट्रिक टन से 21% कम है। यह डेटा 21 सितंबर 2026 को सामने आया, ठीक 25 सितंबर के अमेरिका-चीन शिखर वार्ता से पहले।

अमेरिकी ट्रेजरी सचिव Scott Bessent और चीन के उप प्रधानमंत्री He Lifeng के बीच न्यूयॉर्क में हुई पिछली बातचीत में भी यही मुद्दा उठा। असली सवाल यह है कि 10 नवंबर 2026 को खत्म हो रही व्यापार संधि के बाद चीन मैग्नेट का निर्यात जारी रखेगा या नहीं।

भारत की गाड़ी और रक्षा उद्योग पर सीधा असर

चीन दुनिया के करीब 90% रेयर अर्थ मैग्नेट प्रोसेसिंग पर कब्जा रखता है। Sona Comstar के MD और Group CEO विवेक विक्रम सिंह के अनुसार कंपनी को पिछली तिमाही में मैग्नेट की कमी से करीब तीन हफ्ते का उत्पादन नुकसान झेलना पड़ा, और बिना रेयर अर्थ वाले वैकल्पिक मैग्नेट अभी अच्छा समाधान नहीं हैं।

CII अध्यक्ष राजीव मेमानी के अनुसार ऑटो सेक्टर की चिंता जितनी सामने आई है, असल समस्या उससे कहीं ज्यादा गंभीर है। Ultraviolette जैसी भारतीय EV कंपनियां जिस रफ्तार से बढ़ रही हैं, उनके मोटर भी इसी मैग्नेट पर निर्भर करते हैं, यानी सिर्फ बड़ी कार कंपनियां ही नहीं, नई EV स्टार्टअप्स भी इस जोखिम में शामिल हैं।

₹7,280 करोड़ की योजना: सरकार का जवाब

नवंबर 2025 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने Sintered Rare Earth Permanent Magnet यानी REPM बनाने की एक योजना मंजूर की, जिसे 15 दिसंबर 2025 को अधिसूचित किया गया। इसका बजट ₹7,280 करोड़ है, और लक्ष्य है 6,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MTPA) की एकीकृत मैग्नेट उत्पादन क्षमता, पांच कंपनियों के ज़रिए।

हर चुनी गई कंपनी को 600 से 1,200 MTPA तक क्षमता बनानी होगी, और इसके लिए बिक्री से जुड़ा प्रोत्साहन (sales-linked incentive) और पूंजी सब्सिडी दोनों मिलेंगे। मार्च 2026 में इसके लिए वैश्विक टेंडर बुलाए गए, जिसकी अंतिम तारीख जून से बढ़ाकर जुलाई 2026 की गई थी।

योजना की कुल अवधि सात साल रखी गई है, और शुरुआती दो साल सिर्फ फैक्ट्री खड़ी करने और तकनीक सीखने के लिए दिए गए हैं। तीन सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनियों को IREL से सीमित मात्रा में NdPr ऑक्साइड की गारंटीशुदा आपूर्ति भी मिलेगी, ताकि शुरुआती दौर में कच्चे माल की चिंता कम हो।

IREL से लेकर निजी कंपनियों तक: कौन कहां तक पहुंचा

भारत की सरकारी कंपनी IREL अभी अकेली ऐसी कंपनी है जो रेयर अर्थ खनिज खोदकर उसे ऑक्साइड में बदलती है। कंपनी की NdPr ऑक्साइड बनाने की क्षमता फिलहाल करीब 400 MTPA है, जिससे मोटे तौर पर 1,500 MTPA तक मैग्नेट उत्पादन को कच्चा माल मिल सकता है। हमारे हिसाब से यह योजना के 6,000 MTPA लक्ष्य का करीब एक-चौथाई ही है।

निजी क्षेत्र में Midwest Advanced Materials के अनुसार वह 2026 के अंत तक 500 टन कस्टम NdFeB मैग्नेट बनाना शुरू करेगी, और 2030 तक इसे 5,000 टन तक ले जाने की योजना है। Entellus Industries भी मैग्नेट मिश्रधातु और सिंटरिंग तकनीक पर काम कर रही है, जबकि Mahindra & Mahindra, Uno Minda और Sona Comstar जैसी कंपनियों ने भी इस योजना में रुचि दिखाई है।

साल के अंत तक उत्पादन का लक्ष्य, पर चुनौतियां बाकी

खनन मंत्री किशन रेड्डी ने फरवरी 2026 में कहा था कि भारत इस साल के अंत तक निजी क्षेत्र के साथ मिलकर रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट का उत्पादन शुरू करना चाहता है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार भारत के पास दुनिया के तीसरे सबसे बड़े रेयर अर्थ भंडार हैं, करीब 6.9 करोड़ टन, लेकिन निजी निवेश की कमी की वजह से खनन बहुत सीमित रहा है।

मंत्रालय के अनुसार खनन और एक सरकारी संस्था ने मिलकर परमानेंट मैग्नेट बनाने की तकनीक पहले ही विकसित कर ली है, और अलग-अलग राज्यों में चार क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की योजना है। यानी तकनीक की बुनियाद तैयार है, बस उसे औद्योगिक पैमाने पर उतारना बाकी है।

चरणसमयक्षमता (टन)
शुरुआती उत्पादन2026500
पहला विस्तार2027-282,000
पूरी क्षमता20305,000

जैसे semiconductor क्षेत्र में स्वदेशी VIHAAN चिप की कहानी बताती है कि पहली कोशिश में सफलता मिलना आसान नहीं होता, वैसे ही मैग्नेट बनाना सिर्फ पैसा लगाने से नहीं, तकनीक और गुणवत्ता नियंत्रण सीखने से भी जुड़ा है। योजना की 2 साल की गेस्टेशन अवधि भी यही दिखाती है कि सरकार भी जानती है कि यह रातोंरात नहीं होगा।

भारत के लिए मतलब, अनजान बातें और आगे क्या

भारत के लिए इसका मतलब है कि EV, रक्षा उपकरण और पवन ऊर्जा जैसे क्षेत्रों की रफ्तार अब सीधे तौर पर एक खनिज प्रोसेसिंग तकनीक पर टिकी है, जिसे अभी तक सिर्फ चीन ने बड़े पैमाने पर हासिल किया है। यह सिर्फ उद्योग की बात नहीं, रणनीतिक आत्मनिर्भरता का सवाल भी है।

अभी यह साफ नहीं है कि निजी कंपनियां तय समय पर गुणवत्ता वाला NdFeB मैग्नेट बना पाएंगी या नहीं, क्योंकि सिंटर्ड मैग्नेट बनाना ऑक्साइड बनाने से कहीं ज़्यादा तकनीकी रूप से मुश्किल कदम है। यह तस्वीर अगले कुछ महीनों में साफ होगी।

आगे तीन चीज़ों पर नज़र रखनी होगी: 25 सितंबर की अमेरिका-चीन बैठक में मैग्नेट निर्यात पर क्या तय होता है, REPM योजना के पांच विजेताओं का चुनाव कब पूरा होता है, और क्या Midwest Advanced Materials जैसी कंपनियां सच में साल के अंत तक उत्पादन शुरू कर पाती हैं।

एक खनिज जितना छोटा दिखता है, उसकी सप्लाई चेन उतनी ही बड़ी होती है। भारत के लिए असली परीक्षा भंडार होने में नहीं, उसे मैग्नेट में बदलने की तकनीक में है।

स्रोत: Reuters, Deccan Herald, S&P Global, PIB

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