ज्यादातर लोग सोचते हैं कि अगर किसी दूसरे ग्रह से रेडियो सिग्नल आए, तो वहां जरूर कोई सभ्यता या एलियन होंगे। वैज्ञानिकों की एक नई खोज इस सोच को गलत साबित करती है। पहली बार दक्षिण अफ्रीका के MeerKAT रेडियो टेलीस्कोप ने सौरमंडल से बाहर के एक ग्रह, Beta Pictoris b, से सीधे रेडियो सिग्नल पकड़े हैं, और इसके पीछे एलियन नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक घटना है।

वैज्ञानिकों ने Beta Pictoris b से आखिर क्या पकड़ा?

हार्वर्ड-स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स के शोधार्थी केविन ऑर्टिज सेबालोस की टीम ने MeerKAT रेडियो टेलीस्कोप को Beta Pictoris b नाम के एक विशाल गैस ग्रह की तरफ मोड़ा। LHS 1140 b जैसे दूसरे एक्सोप्लैनेट अध्ययनों की तरह ही, यह भी दूर के ग्रहों को सीधे समझने की कोशिश का हिस्सा है। यह ग्रह पृथ्वी से करीब 64 प्रकाश वर्ष दूर है और इसका द्रव्यमान बृहस्पति से करीब 10 गुना ज्यादा है।

टीम को इस ग्रह से बार-बार दोहराते हुए तेज रेडियो सिग्नल मिले। यह पहली बार है जब किसी ग्रह से सीधे इस तरह का सिग्नल पकड़ा गया है, न कि उसके तारे से। इससे पहले भी कुछ ग्रहों के आसपास रेडियो गतिविधि के संकेत मिले थे, लेकिन हर बार यह साफ नहीं हो पाया था कि सिग्नल असल में ग्रह से आ रहा है या उसके तारे से।

यह सिग्नल तारे का नहीं, ग्रह का ही है, यह पक्का कैसे हुआ?

शुरुआत में साफ नहीं था कि सिग्नल ग्रह से आ रहा है या उसके तारे Beta Pictoris से। टीम ने ग्रह और तारे, दोनों की रेडियो तस्वीरों की तुलना दूर के क्वासर यानी बेहद चमकीली आकाशगंगाओं की स्थिर स्थिति से की, जिन्हें आसमान में एक तरह का फिक्स रेफरेंस पॉइंट माना जाता है।

इस तुलना से साफ हो गया कि सिग्नल का असली स्रोत ग्रह ही है, तारा नहीं। शोधकर्ताओं ने अपने पेपर में लिखा है कि किसी सौरमंडल से बाहर के ग्रह से सिग्नल का इतना पक्का और सीधा जुड़ाव पहले कभी नहीं मिला था।

क्या यह किसी एलियन सभ्यता का सिग्नल है?

नहीं। ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी की एस्ट्रोफिजिसिस्ट सुज़ैन एग्रेन के अनुसार यह सिग्नल किसी तकनीक का नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक प्रक्रिया का नतीजा है। रेडियो सिग्नल जरूर SETI यानी एलियन सभ्यता खोजने के प्रोग्राम में अहम माने जाते हैं, लेकिन प्राकृतिक स्रोतों से भी ऐसे सिग्नल बनते हैं।

एग्रेन के अनुसार यह सिग्नल पृथ्वी और शनि जैसे ग्रहों पर दिखने वाली ऑरोरा से मिलते-जुलते असर का नतीजा है, बस यह कहीं ज्यादा तेज है। यह पेपर अभी तक पीयर-रिव्यू नहीं हुआ है, फिर भी शोधकर्ताओं ने साफ लिखा है कि यह किसी टेक्नोलॉजी का नहीं, बल्कि प्राकृतिक भौतिकी का नतीजा है।

ग्रह से रेडियो सिग्नल आता कहां से है?

एग्रेन के अनुसार ग्रहों से रेडियो सिग्नल बनने के दो मुख्य प्राकृतिक तरीके होते हैं। पहला, मैग्नेटिक रीकनेक्शन, जब कोई ग्रह अपने तारे के बहुत करीब चक्कर लगाता है और उसका मैग्नेटिक फील्ड सीधे तारे के मैग्नेटिक फील्ड से टकराता है।

दूसरा तरीका ऑरोरा जैसा असर है, जब तारे से आते ऊर्जावान कण ग्रह के ऊपरी वायुमंडल से टकराते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार Beta Pictoris b के मामले में यही दूसरा तरीका काम कर रहा है।

1,250 गॉस का मैग्नेटिक फील्ड कितना बड़ा है?

इन्हीं रेडियो सिग्नल से टीम ने ग्रह के मैग्नेटिक फील्ड की ताकत का अंदाजा भी लगाया, जो करीब 1,250 गॉस निकली। तुलना के लिए, बृहस्पति का मैग्नेटिक फील्ड सिर्फ करीब 4.3 गॉस और पृथ्वी का महज करीब 0.5 गॉस है।

पिंडमैग्नेटिक फील्ड (गॉस में)
पृथ्वीकरीब 0.5
बृहस्पतिकरीब 4.3
Beta Pictoris bकरीब 1,250

हमारा हिसाब: अगर पृथ्वी के मैग्नेटिक फील्ड को 1 इकाई मान लें, तो Beta Pictoris b का फील्ड उससे करीब 2,500 गुना ज्यादा ताकतवर ठहरता है।

एग्रेन के अनुसार किसी ग्रह का मैग्नेटिक फील्ड उसके वायुमंडल को तारे से आती कणों की तेज हवा से बचाता है, ठीक वैसे ही जैसे पृथ्वी का मैग्नेटिक फील्ड जीवन को नुकसानदायक विकिरण से बचाता है। उनके अनुसार भविष्य में छोटे और चट्टानी ग्रहों पर भी ऐसा माप हो सका, तो यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि कौन से ग्रह अपना वायुमंडल बचाए रखने लायक हैं।

भारत के लिए इस खोज का क्या मतलब है?

भारत के लिए यह खोज सीधे तौर पर किसी अपने मिशन से नहीं जुड़ी, लेकिन इसके पीछे का टेलीस्कोप नेटवर्क भारत से गहरा नाता रखता है। MeerKAT उस बड़े Square Kilometre Array (SKA) प्रोजेक्ट का एक पथ-प्रदर्शक टेलीस्कोप है, जिसमें भारत जुलाई 2024 से पूर्ण सदस्य है।

हमारा अंदाज़ा है कि पुणे की Giant Metrewave Radio Telescope, जो खुद SKA की एक पथ-प्रदर्शक सुविधा मानी जाती है, आने वाले सालों में इसी तरह के एक्सोप्लैनेट अध्ययन में सीधे हिस्सा ले सकती है, क्योंकि भारत SKA के कंट्रोल सॉफ्टवेयर के विकास का बड़ा हिस्सा संभाल रहा है। यह सिर्फ फंडिंग की भागीदारी नहीं, बल्कि टेलीस्कोप को असल में चलाने वाली तकनीक में भारतीय इंजीनियरों की सीधी भूमिका है। Chandrayaan-3 के SHAPE Instrument जैसे प्रयोग पहले से दिखा चुके हैं कि भारतीय वैज्ञानिक एक्सोप्लैनेट जैसे विषयों में भी सक्रिय हैं।

अभी क्या पता नहीं है और आगे क्या देखा जाएगा?

यह स्टडी अभी सिर्फ एक प्रीप्रिंट है, यानी इसे अभी तक साथी वैज्ञानिकों ने विस्तार से जांचा-परखा नहीं है। एग्रेन के अनुसार Beta Pictoris b इतना बड़ा और मोटे वायुमंडल वाला ग्रह है कि उसे कमजोर मैग्नेटिक फील्ड के बिना भी अपना वायुमंडल बचाए रखने में शायद दिक्कत न हो।

  • इस प्रीप्रिंट की पीयर-रिव्यू प्रक्रिया पूरी होना
  • इसी तकनीक से छोटे, चट्टानी ग्रहों पर मैग्नेटिक फील्ड मापने की अगली कोशिशें
  • ज्यादा ताकतवर Square Kilometre Array टेलीस्कोप की शुरुआत, जिसके लिए MeerKAT एक पथ-प्रदर्शक है

Roman Space Telescope जैसे आने वाले मिशन भी एक्सोप्लैनेट पर बड़े सर्वे करने वाले हैं, जिनसे इस तरह के मैग्नेटिक फील्ड मापने के तरीकों को और मजबूती मिल सकती है।

Beta Pictoris b से मिला यह सिग्नल एलियन का संदेश नहीं है, लेकिन यह दिखाता है कि अब हम दूर के ग्रहों का मैग्नेटिक फील्ड सीधे माप सकते हैं। यही तकनीक आगे चलकर बता सकती है कि कौन से ग्रह जीवन के लिए वाकई मुफीद हो सकते हैं।

स्रोत: Live Science, Phys.org, Starlust, arXiv