ज़्यादातर लोग मानते हैं कि National Green Tribunal (NGT) वह अदालत है जहां पर्यावरण बचाने वाले याचिकाकर्ताओं को राहत मिलती है। पर 2026 की पहली छमाही के आंकड़े इस धारणा को पूरी तरह तोड़ते हैं: पर्यावरण पक्ष की जीत दर सिर्फ 0% रही, जबकि उद्योगों और प्रोजेक्ट-प्रस्तावकों की जीत दर 58.8% रही।
NGT बना किसलिए था, आज हो क्या रहा है
NGT की स्थापना जून 2010 में संसद के एक कानून से हुई थी, ताकि नागरिकों को तेज़ और असरदार पर्यावरणीय न्याय मिल सके। इसकी पांच पीठें हैं: दिल्ली में प्रधान पीठ, और पूर्वी (कोलकाता), पश्चिमी (पुणे), मध्य (भोपाल) व दक्षिणी (चेन्नई) क्षेत्रीय पीठें।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश के हवाले से The Wire ने लिखा कि पिछले एक दशक में ट्रिब्यूनल की यह भूमिका कमज़ोर हुई है। दिलचस्प यह भी है कि यही आंकड़े ठीक उस हफ्ते सामने आए जब NGT खुद "पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता" पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की मेज़बानी कर रहा था।
South Asian Reporter on Environment Law (SAREL) की रिपोर्ट "Who Wins At The Green Tribunal?" 19 सितंबर 2026 को आई। SAREL भारत, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, भूटान और श्रीलंका के पर्यावरणीय कानूनों और फैसलों का एक डेटाबेस चलाता है, इसलिए इसकी कार्यप्रणाली शुद्ध रूप से दस्तावेज़ी है।
2026 की पहली छमाही का पूरा हिसाब
SAREL ने जनवरी से जून 2026 के बीच NGT की पांचों पीठों द्वारा तय की गई कुल 119 अपीलों का विश्लेषण किया। इनमें से 52 अपीलें (करीब 44%) बिना गुण-दोष जांचे ही निपटा दी गईं, जैसे समय-सीमा पार होना, वापस लेना या अधिकार-क्षेत्र से बाहर होना।
बाकी बची 67 अपीलें गुण-दोष के आधार पर तय हुईं। इनमें से 16 पर्यावरण या जनहित याचिकाकर्ताओं ने दाखिल कीं, और 51 उद्योगों, प्रोजेक्ट-प्रस्तावकों या संपत्ति मालिकों ने। नीचे दोनों पक्षों का हिसाब है:
| पक्ष | गुण-दोष पर सुनी गई अपीलें | जीती गई अपीलें | सफलता दर |
|---|---|---|---|
| पर्यावरण/जनहित पक्ष | 16 | 0 | 0% |
| उद्योग/प्रोजेक्ट-प्रस्तावक पक्ष | 51 | 30 | 58.8% |
यानी पर्यावरण या जनहित की तरफ से दायर एक भी अपील में राहत नहीं मिली, जबकि उद्योग पक्ष को हर दूसरी अपील में जीत मिली। बाकी बचे करीब 6% उद्योग मामलों में पीठ ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया, हार-जीत का फैसला नहीं सुनाया।
कौन जीता, कौन हारा — बेंच दर बेंच
MSN पर छपी रिपोर्ट के अनुसार दक्षिणी पीठ (चेन्नई) ने उद्योगों को 12 में से 9 अपीलों में राहत दी, जबकि मध्य पीठ (भोपाल) ने 5 में से सिर्फ 1 अपील उद्योग के पक्ष में तय की। पूर्वी पीठ (कोलकाता) ने सिर्फ एक जनहित अपील पर फैसला सुनाया, और वह भी पर्यावरण पक्ष के हक में नहीं गई।
एक अपवाद जैसा मामला भी है, जिसे रिपोर्ट खुद "जीत नहीं" मानती है: मध्य पीठ ने Tahir Hussain बनाम राजस्थान राज्य मामले में भूजल दिशा-निर्देशों को रद्द किया, पर राज्य ने वे दिशा-निर्देश फैसले से पहले ही वापस ले लिए थे। यानी अदालत ने कोई नई सुरक्षा नहीं जोड़ी, बस पहले से खाली हो चुके मामले पर मुहर लगाई।
हमें लगता है कि यह अकेला मामला ही दिखाता है कि आंकड़ा भले "0%" लिखा जाए, असली स्थिति उससे भी थोड़ी कमज़ोर है, क्योंकि यह इकलौता आधा-अधूरा मामला भी असल में किसी का "जीता हुआ" फैसला नहीं था।
भारत के संदर्भ में
यह सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए सीधा असर है जो वेटलैंड और जंगल कटाई या विकास परियोजनाओं से वन्यजीव टकराव जैसे मुद्दों पर NGT का रुख करते हैं। अगर गुण-दोष पर सुनवाई तक पहुंचना ही मुश्किल है, तो अदालत जाने का फायदा कम दिखने लगता है।
दूसरी तरफ, उद्योग पक्ष के लिए यह आंकड़ा भरोसा बढ़ाने वाला हो सकता है कि परियोजनाओं को अटकाने वाली शिकायतों का नतीजा अक्सर उनके पक्ष में जाता है। कांग्रेस नेता रमेश जैसे आलोचक इसे संस्थागत कमज़ोरी बताते हैं, जबकि NGT प्रशासन ने अभी तक इस आंकड़े पर सार्वजनिक रूप से विस्तार से जवाब नहीं दिया है।
संसाधन का फर्क भी यहां दिखता है। बड़ी कंपनियां आमतौर पर अनुभवी वकीलों की टीम खड़ी करती हैं, जबकि स्थानीय समुदाय या छोटे NGO अक्सर सीमित कानूनी मदद के साथ अपील दायर करते हैं। यह अकेला कारण नहीं हो सकता, पर तस्वीर का एक हिस्सा ज़रूर है।
जो अभी पता नहीं
यह रिपोर्ट सिर्फ 2026 की पहली छमाही की तस्वीर है; पिछले सालों से तुलना करने वाला बहु-वर्षीय रुझान अभी सार्वजनिक नहीं है, इसलिए यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि 0% दर कोई स्थायी पैटर्न है या सिर्फ एक असामान्य छह महीने।
यह भी साफ नहीं कि 52 प्रक्रियागत खारिज अपीलों में से कितनी वाकई कमज़ोर याचिकाएं थीं और कितनी सिर्फ तकनीकी वजहों से अटकीं। SAREL की रिपोर्ट खुद कहती है कि यह विश्लेषण सिर्फ गुण-दोष पर तय हुई अपीलों तक सीमित है, हर तरह के NGT मामले को नहीं छूता।
यह भी नहीं मालूम कि क्या यही पैटर्न राज्य स्तर की प्रदूषण नियंत्रण अदालतों या अन्य विशेष अधिकरणों में भी दिखता है, क्योंकि SAREL का दायरा सिर्फ NGT तक सीमित रहा है।
क्या इसका मतलब है कि NGT बंद हो जाएगा?
नहीं, रिपोर्ट में ऐसा कोई संकेत नहीं है। यह सिर्फ एक अवधि के नतीजों का विश्लेषण है, संस्था के भविष्य पर कोई टिप्पणी नहीं। जयराम रमेश जैसे आलोचक सुधार की मांग कर रहे हैं, बंद करने की नहीं।
क्या हर साल ऐसा ही रहा है?
अभी इसका जवाब देना जल्दबाज़ी होगी, क्योंकि SAREL ने सिर्फ जनवरी-जून 2026 का डेटा जारी किया है। बहु-वर्षीय तुलना अभी उपलब्ध नहीं है, इसलिए यह कोई नया या पुराना ट्रेंड है, यह अभी तय नहीं।
अगली खबर पर नज़र
तीन चीज़ों पर नज़र रखनी होगी। पहला, NGT या सरकार की तरफ से इस रिपोर्ट पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है या नहीं। दूसरा, साल की दूसरी छमाही (जुलाई-दिसंबर 2026) के लिए वैसा ही विश्लेषण, जो बताएगा कि यह ट्रेंड जारी रहता है या बदलता है।
तीसरा, संसद या कानून मंत्रालय में इस असंतुलन पर कोई सुधार प्रस्ताव आता है या नहीं, खासकर सीमा-अवधि और कानूनी सहायता जैसे मुद्दों पर, जिन्हें रिपोर्ट ने खुद रेखांकित किया है।
अगली बार जब कोई NGT का नाम सुनकर सोचे कि पर्यावरण बचाने वालों को वहां राहत मिलेगी, तो यह आंकड़ा याद रखने लायक है। अदालत का नाम और उसका मौजूदा नतीजा, फिलहाल दो अलग कहानियां कहते हैं।
स्रोत: SAREL, ThePrint, The Wire, NENow, NewsBytesApp