ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि क्लाइमेट से जुड़े मुकदमे सीधे कार्बन उत्सर्जन पर आधारित होते हैं। पर अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट में 5 अक्टूबर 2026 को जो केस सुना गया, उसकी बुनियाद कुछ और है। बोल्डर, कोलोराडो का तर्क है, 'यह केस उत्सर्जन का नहीं, धोखे का है।' यानी असली सवाल यह नहीं कि कंपनियों ने कितना कार्बन छोड़ा, बल्कि यह कि क्या उन्होंने जनता से झूठ बोला।

आखिर यह मामला है क्या?

बोल्डर शहर और काउंटी ने कोलोराडो की राज्य अदालत में Suncor Energy और ExxonMobil के खिलाफ मुकदमा दाखिल किया था। शहर का कहना है कि जंगल की आग जैसी आपदाओं से निपटने में उसे बड़ा खर्च उठाना पड़ रहा है, और इसका एक कारण इन कंपनियों की गतिविधियां हैं।

कंपनियों ने पहले केस को संघीय अदालत (federal court) में भेजने की कोशिश की, पर कोलोराडो की सबसे बड़ी अदालत ने इसे राज्य अदालत में ही आगे बढ़ने की इजाज़त दी। अब कंपनियां अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई हैं, यह पूछते हुए कि क्या संघीय कानून इस तरह के राज्य-स्तरीय मुकदमों को रोक देता है। यह मुकदमा 2018 में दाखिल हुआ था, आठ साल के सफर के बाद अब यह देश की सबसे बड़ी अदालत के सामने है।

Boulder का दावा असल में है क्या, उत्सर्जन या धोखा?

बोल्डर के वकील केविन रसेल ने कोर्ट में साफ कहा कि यह केस उत्सर्जन का नहीं, बल्कि धोखे का है। शहर का आरोप है कि कंपनियों ने दशकों तक जनता को यह बताने से परहेज़ किया कि उनके ईंधन से जलवायु को कितना खतरा है, जबकि उन्हें खुद इसकी जानकारी थी।

यह फ्रेमिंग अहम है, क्योंकि अमेरिका में सीधे 'जलवायु परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार ठहराने' वाले मुकदमे पहले भी अदालतों में उलझ चुके हैं। धोखे (deception) और उपभोक्ता संरक्षण (consumer protection) का एंगल राज्य के पुराने उपभोक्ता कानूनों के दायरे में आसानी से फिट हो जाता है, जबकि सीधे उत्सर्जन पर आधारित दावे अक्सर संघीय कानून से टकरा जाते हैं।

बोल्डर का यह भी कहना है कि कोलोराडो का टोर्ट कानून (नुकसान की भरपाई से जुड़ा कानून) यहां लागू होता है, और वह चाहता है कि Suncor और दूसरी कंपनियां इस नुकसान की भरपाई करें, ठीक उस तरह जैसे कोई स्थानीय कंपनी किसी और नुकसान के लिए ज़िम्मेदार ठहराई जाती है।

ऊर्जा कंपनियां और ट्रंप प्रशासन का क्या तर्क है?

कंपनियों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन एक राष्ट्रीय मुद्दा है, जिसे कांग्रेस को तय करना चाहिए, छिटपुट स्थानीय मुकदमों से नहीं। ट्रंप प्रशासन ने भी कंपनियों के पक्ष में अदालत में एक 'एमिकस ब्रीफ' दाखिल किया है, यह चिंता जताते हुए कि अगर बोल्डर जीत गया, तो दुनिया भर में किसी पर भी, जलवायु में किसी भी योगदान के लिए, हर स्थानीय निकाय मुकदमा कर सकेगा।

दूसरी तरफ जलवायु अर्थशास्त्रियों के एक ब्रीफ में कहा गया है कि कंपनियों से मुआवज़ा मांगने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था अस्थिर हो जाएगी, इस दावे का कोई ठोस आर्थिक आधार नहीं है। यानी दोनों तरफ से आर्थिक असर को लेकर भी राय बंटी हुई है, अदालत के बाहर भी यह बहस जारी है।

इस फैसले का असर सिर्फ Boulder तक सीमित क्यों नहीं रहेगा?

अमेरिका में अलग-अलग राज्यों, काउंटियों और शहरों के दो दर्जन से ज़्यादा समान मुकदमे पहले से अदालतों में लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला सीधे उन सभी मामलों की दिशा तय करेगा, चाहे वे किसी भी राज्य में दाखिल हुए हों।

यह हमारा हिसाब है, कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं: अगर कम से कम 24 और मुकदमे इस फैसले से सीधे प्रभावित होते हैं, तो इस एक केस का फैसला खुद से करीब 25 गुना ज़्यादा मामलों पर असर डालेगा। यानी अदालत सिर्फ बोल्डर का भाग्य नहीं, बल्कि अमेरिका में क्लाइमेट लिटिगेशन की पूरी दिशा तय कर रही है।

भारत पर इसका असर क्या होगा?

भारत में अभी ऐसे सीधे 'क्लाइमेट डिसेप्शन' मुकदमे आम नहीं हैं, पर्यावरण से जुड़े मामले ज़्यादातर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) जैसे मंचों में जाते हैं। भारत में NGT में पर्यावरण पक्ष की जीत की दर पहले ही बहुत कम पाई गई है, जो दिखाता है कि कानूनी रास्ते से जवाबदेही तय करना अमेरिका हो या भारत, आसान नहीं है।

अगर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट बोल्डर के पक्ष में फैसला देता है, तो यह दुनिया भर के उन देशों के लिए एक मिसाल बन सकता है जहां नागरिक समूह या सरकारें बड़ी ऊर्जा कंपनियों से 1.5°C की सीमा पार होने जैसे जलवायु नुकसान की भरपाई मांगना चाहती हैं। इसके उलट, अगर कंपनियां जीतती हैं, तो यह दुनिया भर में इस तरह के मुकदमों पर ठंडा असर डाल सकता है।

अभी क्या साफ नहीं है?

दो घंटे से ज़्यादा चली सुनवाई के बाद भी यह साफ नहीं है कि जज किस तरफ झुकेंगे, मीडिया रिपोर्ट्स इसे 'मिश्रित संकेत' बता रही हैं। जस्टिस सैमुअल अलीटो इस केस में हिस्सा नहीं ले रहे, जिससे बेंच में एक वोट की कमी है।

यह भी साफ नहीं कि अदालत केस के गुण-दोष पर फैसला देगी या सिर्फ इस तकनीकी सवाल पर कि क्या सुप्रीम कोर्ट को यह अपील सुनने का अधिकार भी है। जजों ने सुनवाई के दौरान इस अधिकार वाले सवाल पर अपेक्षा से कम समय दिया, जिसे कुछ पर्यवेक्षक एक संकेत मान रहे हैं, पर यह पक्का नहीं है।

आगे क्या देखें?

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आमतौर पर अगले साल जून तक आता है, यानी जवाब के लिए अभी महीनों का इंतज़ार बाकी है। इसी बीच लुइज़ियाना के प्लाकमिंस पैरिश बनाम शेवरॉन जैसे दूसरे क्लाइमेट मुकदमे भी इसी अदालती सीज़न में सुने जाने हैं, जो इस फैसले की दिशा से सीधे जुड़े होंगे।

क्लाइमेट इंटीग्रिटी से जुड़े एक वकील ने यह भी कहा है कि जनता को यह भी देखना चाहिए कि किसी जज के निजी निवेश किसी फैसले से जुड़े तो नहीं हैं, यह सवाल आने वाले महीनों में और उठ सकता है।

बोल्डर का यह मुकदमा 2018 में शुरू हुआ था, आठ साल बाद अब यह अमेरिका की सबसे बड़ी अदालत के सामने है। जलवायु को लेकर जवाबदेही तय करने की यह लड़ाई चाहे जिस तरफ जाए, इतना साफ है कि यह आखिरी ऐसा मुकदमा नहीं होगा।

स्रोत: SCOTUSblog, NBC News, The Washington Post, NPR

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