T. rex का शरीर का तापमान लगभग 36°C था, यानी इंसान के तापमान के करीब। पहली बार इस डायनासोर का ठोस तापमान-आँकड़ा सामने आया है। 16 सितंबर 2026 को Science Advances में छपे UCLA के अध्ययन के अनुसार टायरेनोसॉरस रेक्स (Tyrannosaurus rex) गर्म-खून वाला (warm-blooded) शिकारी था, धूप में पड़े रहने वाला सुस्त सरीसृप नहीं। वैज्ञानिकों ने यह नतीजा उसके दाँत के इनेमल (enamel) में छिपे रासायनिक निशानों से निकाला है। आइए समझें कि तापमान कैसे मापा गया, इससे क्या बदलता है और अब भी क्या अनजाना है।
T. rex का शरीर का तापमान कितना था? अध्ययन क्या कहता है
UCLA (यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिल्स) की टीम ने T. rex के दाँतों के इनेमल की जाँच कर बताया कि उसके शरीर का औसत तापमान करीब 36.3°C (97.3°F) रहा होगा। यह अध्ययन पीयर-रिव्यू (peer-reviewed) पत्रिका Science Advances के खंड 12, अंक 38 में छपा है। पहले लेखक Randy Flores हैं और वरिष्ठ लेखक UCLA की आइसोटोप भू-रसायनज्ञ (isotope geochemist) Aradhna Tripati। टीम के अनुसार यह पहली बार है जब T. rex के तापमान का ठोस माप मिला है। इससे पहले बातें ज़्यादातर अंदाज़ों और परोक्ष सबूतों पर टिकी थीं।
दाँत से तापमान कैसे मापा गया?
तरीके का नाम है क्लम्प्ड आइसोटोप थर्मोमेट्री (clumped isotope thermometry)। इसका मूल विचार सीधा है। दाँत के इनेमल में कार्बन और ऑक्सीजन के कुछ दुर्लभ समस्थानिक (isotopes) आपस में जुड़कर बंधन बनाते हैं। ठंड में ऐसे बंधन ज़्यादा बनते हैं और गर्मी में कम। इसे यूँ समझिए: सर्दी की सुबह भरी बस में लोग एक-दूसरे से सटकर बैठते हैं, जबकि गर्मी में जितनी जगह मिले, दूर-दूर बैठ जाते हैं। बंधनों की गिनती देखकर बताया जा सकता है कि इनेमल किस तापमान पर बना था।
टीम ने ड्रिल से इनेमल का पाउडर निकाला और उसे फॉस्फोरिक एसिड (phosphoric acid) में घोला, ताकि इन बंधनों वाली CO2 गैस निकले। फिर मास स्पेक्ट्रोमीटर (mass spectrometer) से समस्थानिकों का अनुपात नापा गया। कम सामग्री में भी माप हो सके, इसके लिए गैस पर दबाव डालकर उसकी घनी धार बनाई गई।
इनेमल इसलिए चुना गया कि शरीर की हड्डियाँ लगातार टूटती-बनती रहती हैं, जबकि इनेमल के बड़े क्रिस्टल करोड़ों साल में भी रासायनिक बदलाव का सबसे ज़्यादा विरोध करते हैं। यह तरीका करीब एक दशक पहले हड्डियों के लिए विकसित हुआ था। दाँतों के लिए इसे इतना सुधारा गया कि ज़रूरी सामग्री लगभग 90% घट गई। इसी वजह से लॉस एंजिल्स के Natural History Museum ने T. rex के दाँतों के प्रदर्शन में न रखे गए छोटे हिस्से देना मंज़ूर किया।
क्या यह रीडिंग भरोसेमंद है? मगरमच्छ वाली जाँच
करोड़ों साल में चट्टान के भीतर रसायन बदल सकते हैं। इसलिए शोधकर्ताओं ने एक तुलना-नमूना (control) भी लिया: उसी जगह और उसी दौर के मगरमच्छ-वंशी जीवों (crocodilians) के दाँत। अगर भूगर्भीय बदलाव नतीजे बिगाड़ रहे होते, तो दोनों के आँकड़े एक जैसे आते। पर मगरमच्छ-वंशियों के दाँतों से औसतन करीब 30–31°C मिला, जो T. rex के 36°C से साफ़ कम है। यह अंतर इशारा करता है कि माप में दर्ज फ़र्क़ जैविक है, चट्टान की गड़बड़ी नहीं।
तुलना: T. rex किसके करीब था?
| जीव | शरीर का तापमान (लगभग) |
|---|---|
| T. rex (अध्ययन के अनुसार) | 36.3°C |
| T. rex के साथ रहने वाले मगरमच्छ-वंशी | 30–31°C |
| आज के ठंडे-खून वाले सरीसृप | 28–30°C |
| भारतीय हाथी | 36°C |
| अफ्रीकी हाथी | 36.2°C |
| ज़्यादातर पक्षी | 40–43°C |
सह-लेखक Robert Eagle के अनुसार T. rex का तापमान इंसान के लगभग बराबर था। यानी वह ठंडे-खून वाले सरीसृपों से ऊपर और पक्षियों से नीचे, बीच के इलाके में बैठता है। Eagle का कहना है कि उन्हें अंदाज़ा भी कुछ ऐसा ही था।
गर्म-खून वाला होने का मतलब क्या है?
गर्म-खून वाले (endotherm) जीव अपने शरीर के भीतर गर्मी बनाकर तापमान को लगभग स्थिर रखते हैं। थर्मोस्टैट वाला गीज़र इसका अच्छा उदाहरण है: बाहर मौसम कैसा भी हो, वह पानी को तय तापमान पर रखता है। बाल्टी में रखा पानी सर्दी में ठंडा और गर्मी में गुनगुना हो जाता है। मगरमच्छ बाल्टी जैसा है और T. rex गीज़र जैसा, हालाँकि पक्षियों जितना तेज़ गर्म नहीं।
ध्यान रहे कि गर्म-खून का मतलब यह नहीं कि T. rex स्तनधारी (mammal) था। UCLA के अनुसार वह अब भी शल्कों वाला, अंडे देने वाला सरीसृप ही था। शोधकर्ताओं के अनुसार ऐसे तापमान का मतलब यह हो सकता है:
- तेज़ उपापचय (metabolism), जो शिकार का पीछा करने या मरे जानवर खोजने की ऊर्जा देता है
- धूप पर निर्भर न रहना, यानी सुस्त धूप सेंकने वाला जीव नहीं
- ठंडे इलाकों में टिक पाना, जहाँ ठंडे-खून वाले जीव मुश्किल में पड़ते हैं
- पक्षियों की ओर विकास की राह में T. rex का ठंडे-खून वाले डायनासोरों से काफ़ी अलग हो चुका होना
T. rex अलास्का तक कैसे पहुँचा?
क्रेटेशियस (Cretaceous) काल आज से करीब 11–25°F (लगभग 6–14°C) ज़्यादा गर्म था। फिर भी University College London (UCL) के पैलियोन्टोलॉजिस्ट (paleontologist) Alessandro Chiarenza के अनुसार अलास्का की सर्दी ठंडे-खून वाले डायनासोर के लिए बहुत कठोर होती। दिलचस्प यह है कि उस दौर के अलास्का में छिपकली, कछुए या मगरमच्छ जैसे सरीसृपों के जीवाश्म नहीं मिले हैं, पर टायरेनोसॉर के मिले हैं। जलवायु मॉडलों (paleoclimate models) की मदद से टीम ने अनुमान लगाया कि 36°C शरीर वाला T. rex करीब 6.6 करोड़ साल पहले उत्तर अमेरिका में मेक्सिको से अलास्का तक टिक सकता था।
यह अध्ययन कौन सी पुरानी सोच बदलता है?
लंबे समय तक T. rex की छवि भारी, धीमे और धूप सेंकने वाले विशाल सरीसृप की रही। पिछले सालों में चलने की ऊर्जा-लागत, बढ़ने की रफ़्तार और भौगोलिक फैलाव जैसे सबूत गर्म-खून की ओर इशारा करते थे, पर तापमान का असली आँकड़ा नहीं था। 2006 में University of Florida की एक रिपोर्ट में T. rex का सामान्य तापमान लगभग 33°C बताया गया था। वह अनुमान था। अब पहली बार दाँत की रासायनिक जाँच से मापा गया मान आया है, जो उस अनुमान से कुछ ऊपर है।
भारत के लिए इसका मतलब
T. rex खुद भारत में नहीं मिलता, फिर भी इस खोज के कुछ मायने हमारे लिए हैं। पहला, तुलना: भारतीय हाथी का शरीर का तापमान करीब 36°C बताया जाता है, यानी T. rex का आँकड़ा आज के एक जाने-पहचाने भारतीय जानवर जैसा समझा जा सकता है। कक्षा में यह उदाहरण ‘ठंडे बनाम गर्म-खून’ की बहस को आसान बना सकता है।
दूसरा, मौके। गुजरात के बालासिनोर (Balasinor) के रैयोली (Raiyoli) में डायनासोर के जीवाश्म और अंडे मिले हैं। वहाँ मिला राजासॉरस नर्मदेन्सिस (Rajasaurus narmadensis) उत्तर-क्रेटेशियस (Late Cretaceous) का मांसाहारी एबेलिसॉरिड (abelisaurid) डायनासोर माना जाता है। दोनों मांसाहारी थेरोपॉड (theropod) हैं, पर राजासॉरस एबेलिसॉरिड परिवार का है जबकि T. rex टायरेनोसॉरिड परिवार का। सैद्धांतिक रूप से ऐसी तकनीक भारतीय जीवाश्मों पर भी आज़माई जा सकती है। यह अध्ययन का हिस्सा नहीं, हमारा अपना विश्लेषण है। Tripati के अनुसार इस तरीके में सिर्फ़ कुछ मिलीग्राम नमूना चाहिए, जो दुर्लभ जीवाश्मों के लिए राहत की बात है।
तीसरा, चुनौतियाँ। इसके लिए अच्छी तरह सुरक्षित इनेमल, खास मास स्पेक्ट्रोमीटर वाली प्रयोगशाला और संग्रहालयों की मंज़ूरी चाहिए। भारत में यह क्षमता कितनी उपलब्ध है, इस पर हमारे पास पक्की जानकारी नहीं है, इसलिए इसे संभावना ही मानें। हिंदी में ऐसी विज्ञान-खबरें कम मिलती हैं, इसलिए छात्रों तक सटीक जानकारी पहुँचाना अपने आप में एक अवसर है।
अभी क्या पता नहीं है
यह नतीजा दिलचस्प है, पर इसे अंतिम फ़ैसला न मानें। कुछ बातें अभी खुली हैं:
- नमूना छोटा है और एक ही इलाके (मोंटाना की हेल क्रीक चट्टानें) से आया है। हर T. rex, हर उम्र और हर मौसम के लिए यही तापमान होगा, यह साबित नहीं हुआ।
- 36.3°C औसत अनुमान है और हर माप की तरह इसकी एक त्रुटि-सीमा (margin of error) होती है।
- इनेमल अपने बनने के समय का तापमान दर्ज करता है। उम्र, मौसम या दौड़ने के समय तापमान कैसे बदलता था, यह पता नहीं।
- अध्ययन केवल T. rex पर है। बाकी डायनासोरों की अलग जाँच बाकी है।
- यह एक अध्ययन है। दूसरी टीमों द्वारा दोहराए जाने पर ही तस्वीर और पक्की होगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या T. rex सच में गर्म-खून वाला था?
अध्ययन के अनुसार हाँ। उसका औसत तापमान करीब 36.3°C रहा, जबकि उसी इलाके के मगरमच्छ-वंशियों के दाँत से करीब 30–31°C मिला। यह पाँच-छह डिग्री का अंतर बताता है कि T. rex अपने आसपास से ज़्यादा गर्म रहता था। फिर भी यह एक ही अध्ययन है, इसलिए आगे और पुष्टि का इंतज़ार रहेगा।
इतने पुराने दाँत से तापमान कैसे निकला?
दाँत के इनेमल में कार्बन और ऑक्सीजन के दुर्लभ समस्थानिकों के आपसी बंधनों की गिनती तापमान के साथ बदलती है। ठंड में बंधन ज़्यादा और गर्मी में कम बनते हैं। इनेमल का टिकाऊ क्रिस्टल यह रासायनिक निशान करोड़ों साल सँभाले रखता है, जिसे मास स्पेक्ट्रोमीटर से पढ़ा गया।
क्या T. rex इंसान जितना ही गर्म था?
करीब-करीब। Eagle के अनुसार उसका तापमान इंसान के लगभग बराबर था और किसी रोएँदार गर्म-खून वाले स्तनधारी जैसा। पर वह ज़्यादातर पक्षियों से ठंडा था, जो 40–43°C तक जाते हैं। साथ ही वह शल्कों वाला, अंडे देने वाला सरीसृप ही था, स्तनधारी नहीं।
क्या सभी डायनासोर गर्म-खून वाले थे?
यह नहीं कहा जा सकता। यह अध्ययन सिर्फ़ T. rex पर है। रिपोर्टों के अनुसार सबूत बढ़ रहे हैं कि कम से कम कुछ डायनासोर, खासकर बड़े थेरोपॉड, अपनी गर्मी खुद बनाते थे। पर हर प्रजाति की अलग जाँच बाकी है, इसलिए सबको एक ही खाँचे में रखना जल्दबाज़ी होगी।
कुल मिलाकर
दाँत के इनेमल ने करोड़ों साल पुराने एक शिकारी का तापमान बता दिया: करीब 36°C, यानी इंसान और हाथी जैसे बड़े गर्म-खून वाले जानवरों के पास। इससे T. rex की धीमे सरीसृप वाली पुरानी छवि कमज़ोर पड़ती है। पर यह नतीजा एक इलाके और सीमित नमूनों पर टिका है। आगे के अध्ययन बताएँगे कि यह तस्वीर बाकी डायनासोरों पर कितनी लागू होती है।
स्रोत: UCLA Newsroom, Sci.News, Phys.org, Deposits Magazine