कनाडा के क्यूबेक प्रांत में एक कैंपिंग ट्रिप की तैयारी के दौरान मिला 25 किलोमीटर चौड़ा गोल गड्ढा असल में करीब 39 करोड़ साल पुराना उल्कापिंड इम्पैक्ट क्रेटर निकला। NASA Earth Observatory के अनुसार वैज्ञानिकों ने Uhackatik नाम के इस ढांचे की पुष्टि अक्टूबर 2025 की एक बेहद मुश्किल फील्ड यात्रा के बाद की। यह 2018 के बाद मिला अब तक का सबसे बड़ा इम्पैक्ट क्रेटर है।

कैंपिंग स्पॉट ढूंढते हुए मिला सुराग

2024 में शौकिया खगोलशास्त्री Joël Lapointe क्यूबेक के दूरदराज Côte-Nord इलाके में कैंपिंग ट्रिप की तैयारी कर रहे थे। ऑनलाइन सैटेलाइट मैप पर Lake Marsal के पास उन्हें एक अजीब गोल आकृति दिखी। शक होने पर उन्होंने यूरोप और उत्तर अमेरिका के विशेषज्ञों से संपर्क किया।

उनकी जानकारी से फ्रांसीसी शोधकर्ताओं ने 2024 में Meteoritical Society की एक बैठक में इस जगह को क्यूबेक का संभावित 11वां इम्पैक्ट स्ट्रक्चर बताया। इससे Western University के भूवैज्ञानिक Gordon Osinski की दिलचस्पी बढ़ी, जो Impact Earth नाम का वैश्विक क्रेटर डेटाबेस भी चलाते हैं।

ज्वालामुखी नहीं, टक्कर का निशान

पहले हुए भूगर्भीय सर्वे में इलाके की breccia चट्टानों को diatreme यानी ज्वालामुखी विस्फोट से बनी संरचना माना गया था। Osinski शुरुआत में शंकालु थे, फिर भी उन्होंने अक्टूबर 2025 में टीम के साथ इस दूरदराज इलाके का दौरा तय किया।

फ्लोटप्लेन झील के किनारे तक नहीं पहुंच सका, इसलिए टीम को सामान लादे हुए 50 मीटर गहरे पानी से गुजरना पड़ा। दलदली, कीड़ों से भरी और घनी झाड़ियों वाली जमीन को Osinski ने छह महाद्वीपों के अपने अनुभव में सबसे मुश्किल बताया।

दूसरे ही दिन टीम को कई चट्टानों में shatter cones मिले। ये निशान टक्कर की पुष्टि करने वाला वह इकलौता सबूत हैं जिसे मैदान में नंगी आंखों से पहचाना जा सकता है। इसी से साफ हुआ कि यह ढांचा ज्वालामुखी नहीं, बल्कि असली इम्पैक्ट क्रेटर है।

टकराने वाली चीज़ इतनी ताकतवर थी कि उसने बीचोंबीच एक central uplift और columnar jointing वाली ऊंची चट्टानी दीवारें बना दीं, जो पूरे 25 किमी के complex crater ढांचे का हिस्सा हैं। Osinski के मुताबिक आज ऐसी टक्कर हो तो यह बड़े शहरों को मिटाने और दुनिया भर के मौसम पर असर डालने जितनी ताकतवर होगी।

Uhackatik बनाम भारत का Lonar Crater

भारत के पास भी अपना एक जाना-पहचाना इम्पैक्ट क्रेटर है, महाराष्ट्र का Lonar crater. दोनों की तुलना से अंदाजा लगता है कि क्यूबेक वाला ढांचा आकार और उम्र में कितना अलग है।

पहलूUhackatik (क्यूबेक)Lonar (भारत)
चौड़ाईकरीब 25 किमीकरीब 1.8 किमी
अनुमानित उम्रकरीब 39 करोड़ सालकरीब 35,000-50,000 साल (स्टडी अलग-अलग)
कैसे पता चला2024 में सैटेलाइट मैप पर नजर1823 में सतह पर सीधे देखा गया
मान्यता का दर्जाMeteoritical Society से पुष्टि बाकी1979 से National Geological Monument

यानी Uhackatik चौड़ाई में Lonar से करीब 14 गुना बड़ा है और उम्र में लाखों साल आगे। यह हमारी राय में यह फर्क इसलिए भी दिखता है क्योंकि Lonar जैसे छोटे, हाल के क्रेटर धरती के कटाव से जल्दी मिट जाते हैं, जबकि करोड़ों साल पुराने बड़े ढांचे अक्सर गहरे दबे मिलते हैं।

भारत पर इसका असर

भारत के पास पुष्ट इम्पैक्ट क्रेटर सिर्फ एक ही है, Lonar. दुनिया भर में अभी तक करीब 200 क्रेटर की ही पुष्टि हुई है, जबकि भूवैज्ञानिकों का अनुमान है कि सैकड़ों और अभी भी अनदेखे पड़े हैं। भारत का Deccan Plateau और मध्य भारत का पुराना चट्टानी इलाका इस लिहाज से ठीक से नहीं खंगाला गया है।

ISRO के NISAR सैटेलाइट मिशन जैसी high-resolution इमेजरी अब आम लोगों तक भी पहुंचती है। Lapointe जैसा कोई भी शौकिया भारत में सैटेलाइट मैप खंगालकर किसी नई भूगर्भीय संरचना का पहला सुराग दे सकता है।

Lonar के अलावा भारत में कुछ और गोल आकृतियों को कभी-कभी संभावित क्रेटर बताया गया है, पर उनकी पुष्टि अभी नहीं हुई है। Uhackatik की कहानी दिखाती है कि ऐसी पुष्टि में सालों लग सकते हैं और मौके पर जाकर shatter cones ढूंढना ही आखिरी कसौटी है, सिर्फ सैटेलाइट तस्वीर काफी नहीं होती।

किन सवालों के जवाब बाकी हैं

Osinski की टीम मानती है कि Uhackatik का इम्पैक्ट मूल लगभग तय हो चुका है, लेकिन Meteoritical Society की Impact Cratering कमेटी इसे अपनी अगली बैठक में ही औपचारिक मान्यता देगी। उम्र का अनुमान भी अभी सिर्फ चट्टान के नमूनों पर टिका है, हर दिशा से डेटिंग पूरी तरह पक्की नहीं हुई है।

ठीक वैसे ही जैसे हाल में Uranus के चांद Ariel में समुद्र का सुराग भी सीधे माप से नहीं, बल्कि परोक्ष सबूतों से निकाला गया था। दोनों मामलों में असली सबूत परत-दर-परत बाद में जुड़ते गए।

यह भी साफ नहीं है कि Uhackatik ने असल में टक्कर के वक्त धरती पर कितना बड़ा असर डाला होगा, क्योंकि 39 करोड़ साल में कटाव और चट्टानों की हलचल ने काफी सबूत मिटा दिए हैं। Osinski की टीम आगे और नमूने जुटाकर टक्कर करने वाली चीज़ के आकार और स्रोत का पक्का अंदाजा लगाने की कोशिश करेगी।

आगे किन बातों पर नज़र रहे

  • Meteoritical Society committee का Uhackatik पर औपचारिक फैसला (तारीख अभी तय नहीं)
  • क्रेटर के गहरे और उत्तरी हिस्सों से आने वाले नए नमूने
  • क्या फ्रांसीसी टीम ने 2024 में जिन बाकी संभावित 11 structures की बात कही थी, उनमें से कोई और भी पुष्ट होता है

अंत

यह कहानी दिखाती है कि धरती के पुराने राज अब भी सैटेलाइट मैप और किसी आम इंसान की सतर्क नजर से खुल सकते हैं। Lapointe की एक कैंपिंग ट्रिप की तैयारी आखिरकार एक बड़ी वैज्ञानिक खोज बन गई, ठीक वैसे ही जैसे बुध ग्रह के सिकुड़ने का सुराग भी धीरे-धीरे जुड़ते डेटा से मिला था।

Uhackatik नाम कहां से आया?

वैज्ञानिकों ने स्थानीय Innu Council of Ekuanitshit से सलाह के बाद यह नाम रखा। यह क्षेत्र के मूल निवासी समुदाय से जुड़ाव दिखाने का तरीका है।

क्या यह अब तक का सबसे बड़ा इम्पैक्ट क्रेटर है?

नहीं, यह सिर्फ 2018 में मिले 31 किमी चौड़े Hiawatha structure के बाद मिला अब तक का सबसे बड़ा क्रेटर है, धरती का सबसे बड़ा क्रेटर नहीं।

क्या आम लोग भी ऐसी खोज कर सकते हैं?

हां, NASA के Daily Minor Planet और Impact Flash जैसे citizen science प्रोजेक्ट में कोई भी शौकिया हिस्सा लेकर असल शोध में मदद कर सकता है।

क्या यहां अंतरिक्ष यात्री ट्रेनिंग लेंगे?

नहीं, जगह इतनी दुर्गम है कि Osinski के मुताबिक इसकी जगह Labrador के ज्यादा सुलभ Kameshtashtan crater में ही आगे भी जियोलॉजी ट्रेनिंग होती रहेगी।

स्रोत: NASA Earth Observatory, ScienceDaily, Western University