24 जनवरी 1986 को Voyager 2 ने उड़ते-उड़ते Uranus के चांद Ariel की सिर्फ एक करीबी तस्वीर खींची थी, जो आज तक की इकलौती तस्वीर है। अब उसी तस्वीर की दरारों को दोबारा पढ़कर वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि Ariel के अंदर कभी 170 किलोमीटर तक गहरा एक समुद्र (subsurface ocean) रहा होगा।
Planetary Science Institute (PSI) के अनुसार यह अध्ययन Icarus जर्नल में छपा है, और यह किसी सीधे मापन का नतीजा नहीं, बल्कि सतह के निशानों से किया गया एक ठोस अंदाज़ा है।
Ariel क्या है, और अचानक चर्चा में क्यों आया?
Ariel Uranus का सबसे चमकीला और दूसरा सबसे नज़दीकी चांद है, व्यास करीब 1,159 किमी, यानी पूरे Uranus सिस्टम में चौथा सबसे बड़ा। यह सूरज से करीब 2.9 अरब किमी दूर है और 1851 में William Lassell ने इसे खोजा था। PSI के मुताबिक इसकी सतह पर बेहद पुराने crater के ठीक बगल में एकदम जवान, चिकने इलाके भी मौजूद हैं।
शोधपत्र के पहले लेखक Caleb Strom के अनुसार ये चिकने हिस्से cryovolcanism से बने हो सकते हैं, यानी पिघला हुआ पत्थर नहीं बल्कि पानी या बर्फ अंदर से बाहर निकलना। सतह पर बड़ी-बड़ी दरारें, कगार और grabens भी हैं, जो Solar System के सबसे बड़े दर्ज ढांचों में गिने जाते हैं।
वैज्ञानिकों ने बिना Uranus तक गए समुद्र का सुराग कैसे लगाया?
कोई spacecraft अभी तक Ariel की सतह के अंदर नहीं झांक सका। PSI के सह-लेखक Alex Patthoff के अनुसार टीम ने पहले सतह की बड़ी संरचनाओं को नक्शे पर उतारा, फिर मॉडल से समझा कि Uranus का चक्कर लगाते वक्त Ariel का आकार फुटबॉल जैसा खिंचता-सिकुड़ता होगा, जिससे tidal stress बनता है। ऐसी ही tidal-based तकनीक मंगल के अंदर की गर्मी मापने में भी इस्तेमाल हो चुकी है।
इसी tidal stress को सतह की दरारों से जोड़कर टीम ने Ariel की पुरानी कक्षा और समुद्र की मोटाई का अंदाज़ा लगाया। Patthoff के अनुसार इतनी बड़ी दरारें बनाने के लिए या तो बहुत पतली बर्फ के नीचे बहुत बड़ा समुद्र चाहिए, या ज़्यादा eccentricity के साथ एक छोटा समुद्र, पर हर हाल में समुद्र होना ज़रूरी है।
यह समुद्र कितना बड़ा और गहरा था?
PSI के अनुसार यह समुद्र कभी 170 किलोमीटर तक गहरा रहा होगा। तुलना के लिए, धरती के प्रशांत महासागर की औसत गहराई सिर्फ करीब 4 किलोमीटर है। एक अलग स्टडी (Eos पत्रिका के अनुसार) का अंदाज़ा है कि यह समुद्र कभी Ariel के कुल आयतन का करीब 55% हिस्सा रहा होगा।
| चीज़ | आंकड़ा |
|---|---|
| Ariel का व्यास | करीब 1,159 किमी |
| अनुमानित समुद्र की गहराई | करीब 170 किमी |
| बर्फ की परत (crust) | करीब 30 किमी |
| अंदरूनी core का व्यास | करीब 740 किमी |
हमारा आकलन: 170 किमी की यह गहराई धरती की सबसे गहरी जगह मारियाना ट्रेंच (करीब 11 किमी) से लगभग 15 गुना ज़्यादा बैठती है, यानी Ariel का पुराना समुद्र किसी भी सामान्य महासागर से कहीं ज़्यादा गहरा रहा होगा। ग्रहों और चांदों के अंदरूनी हिस्से समय के साथ कैसे बदलते हैं, इसका एक और उदाहरण सिकुड़ता हुआ Mercury भी है।
Ariel की कक्षा पहले इतनी अलग क्यों थी?
शोध के मुताबिक Ariel की orbital eccentricity पहले करीब 0.04 रही होगी, यानी आज के मुकाबले करीब 40 गुना ज़्यादा। इतनी eccentricity पर भी कक्षा देखने में लगभग गोल ही लगती, पर Uranus का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव कहीं ज़्यादा तेज़ होता।
PSI के अनुसार यह पुरानी कक्षा Jupiter के चांद Europa से भी करीब चार गुना ज़्यादा eccentric रही होगी। Europa की बर्फीली सतह आज भी लगातार खिंचने-सिकुड़ने से बुरी तरह टूटी-फूटी है, इसलिए Ariel पर भी वैसा ही असर मानना तर्कसंगत लगता है।
क्या Uranus के पास दो ओशियन वर्ल्ड हैं?
यह Ariel वाला अध्ययन उसी टीम की एक कड़ी है। पिछले साल इसी समूह ने Uranus के चांद Miranda के लिए भी करीब-करीब ऐसे ही नतीजे दिए थे।
Johns Hopkins APL के सह-लेखक Tom Nordheim के अनुसार दोनों नतीजे मिलाकर संकेत मिलता है कि Uranus सिस्टम में जुड़वां ओशियन वर्ल्ड रहे हो सकते हैं। हालांकि Voyager 2 ने 1986 में सिर्फ दोनों चांदों के दक्षिणी हिस्से ही देखे थे, उत्तरी हिस्सा आज भी अनदेखा है। दूर के ग्रहों पर पानी खोजने की ऐसी ही कोशिश LHS 1140 b के वायुमंडल वाली खोज में भी दिखी थी।
भारत पर इसका असर क्या होगा?
भारत का फिलहाल Uranus या उसके चांदों तक कोई सीधा मिशन नहीं है, इसलिए इस खोज का तुरंत कोई व्यावहारिक असर नहीं दिखेगा। पर Physical Research Laboratory (PRL), Ahmedabad जैसे संस्थान ग्रहों और चांदों के अंदरूनी ढांचे पर लंबे समय से काम करते रहे हैं, और Mangalyaan जैसे मिशन दिखा चुके हैं कि भारत सीमित बजट में भी गहरे अंतरिक्ष तक पहुंच सकता है।
सतह की दरारों से अंदरूनी समुद्र का अंदाज़ा लगाने जैसी यह विधि भारतीय planetary scientists के लिए भी सीखने लायक है। Chandrayaan और Aditya-L1 जैसे मिशनों के बाद भारत में space science पढ़ने वालों की दिलचस्पी बढ़ी है, और ऐसी दूर की अनोखी खोजें अगली पीढ़ी को ग्रहों और चांदों के विज्ञान की तरफ खींचने में मदद कर सकती हैं।
अभी क्या राज़ है, और आगे क्या होगा?
वैज्ञानिकों को अब भी नहीं पता कि यह समुद्र ठीक कब बना, कितने समय तक टिका रहा और कब जमकर ठोस हो गया। PSI के अनुसार यह अध्ययन सिर्फ आगे की रिसर्च के लिए एक शुरुआती बुनियाद है।
Voyager 2 के बाद कोई भी spacecraft दोबारा Uranus सिस्टम में नहीं गया, इसलिए Ariel और Miranda के उत्तरी हिस्से आज भी अनदेखे हैं। अमेरिका के 2022 के Planetary Decadal Survey ने Uranus Orbiter and Probe नाम के मिशन को अगले दशक की सबसे बड़ी प्राथमिकता बताया था, जिसके 2031 के आसपास लॉन्च होने का प्रस्ताव है।
- समुद्र कब बना और कब जमा, तारीख अब भी तय नहीं
- Ariel और Miranda के उत्तरी हिस्से की तस्वीरें अब तक नहीं मिलीं
- प्रस्तावित Uranus Orbiter and Probe मिशन से मॉडल की सीधी जांच बाकी है
1986 की एक झलक से 2026 के इस अंदाज़े तक पहुंचने में वैज्ञानिकों को चार दशक लग गए। Ariel का समुद्र आज भले मौजूद न हो, पर उसकी दरारें अब भी वो कहानी सुनाती हैं जो शायद किसी नई यात्रा से ही पूरी हो सकेगी।
स्रोत: Planetary Science Institute, Icarus, Johns Hopkins APL, Eos, ScienceDaily