दस साल पहले तक पराली जलाने का मतलब था पंजाब और हरियाणा। अब कहानी बदल गई है। 15 सितंबर से 6 अक्टूबर 2026 के बीच मध्य प्रदेश में 118 पराली जलाने की घटनाएं दर्ज हुईं, जबकि पंजाब में सिर्फ 88, यह पंजाब के लिए इस मौसम के इस दौर का पिछले कई साल का सबसे कम आंकड़ा है।
इस साल का हिसाब: MP पहले नंबर पर, पंजाब और UP पीछे
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के सैटेलाइट डेटा के मुताबिक, इस सीज़न की शुरुआत में ही मध्य प्रदेश पराली जलाने की घटनाओं में पंजाब से आगे निकल गया है। Down To Earth की रिपोर्ट के अनुसार क्रम में मध्य प्रदेश पहले, पंजाब दूसरे और उत्तर प्रदेश तीसरे नंबर पर है।
यह अपने आप में हैरान करने वाला है, क्योंकि पराली जलाने की बात आते ही ज़्यादातर लोगों के दिमाग में सीधे पंजाब और हरियाणा का नाम आता है। पर यह बदलाव अचानक नहीं हुआ, पिछले साल भी मध्य प्रदेश लगातार दूसरे साल सबसे ऊपर रहा था। घटनाएं पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली और उत्तराखंड से रिपोर्ट हो रही हैं, पर रुझान साफ है, पारंपरिक हॉटस्पॉट पीछे खिसक रहे हैं।
अप्रैल 2026 में भी मध्य प्रदेश ने गेहूं की कटाई के बाद सिर्फ 14 दिनों में 12,600 से ज़्यादा पराली जलाने की घटनाएं दर्ज की थीं, जो देश के कुल आंकड़े का करीब 70% थीं। यानी मध्य प्रदेश की यह समस्या सिर्फ धान के सीज़न तक सीमित नहीं, गेहूं की कटाई के बाद भी दिखती है।
साल-दर-साल बदलाव: पंजाब में गिरावट, MP में बढ़त
| साल | पंजाब में कुल घटनाएं | रुझान |
|---|---|---|
| 2020 | 83,002 | आधार वर्ष |
| 2021 | 71,304 | गिरावट जारी |
| 2022 | 49,922 | तेज़ गिरावट |
| 2023 | 36,663 | सबसे कम दर्ज आंकड़ा |
2025 के पूरे सीज़न (15 सितंबर से 30 नवंबर) में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश में कुल 33,028 घटनाएं दर्ज हुई थीं, जिनमें से 17,067, यानी करीब आधी, सिर्फ मध्य प्रदेश में हुई थीं।
यह हमारा हिसाब है, कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं: इस साल अभी तक मध्य प्रदेश और पंजाब को मिलाकर जो 206 घटनाएं दर्ज हुई हैं, उनमें मध्य प्रदेश का हिस्सा करीब 57% है। यह पिछले साल के करीब 52% वाले हिस्से से भी थोड़ा ज़्यादा है, यानी मध्य प्रदेश की बढ़त इस साल और मज़बूत होती दिख रही है।
यह बदलाव आया क्यों?
मध्य प्रदेश में बदलाव की बड़ी वजह फसल का पैटर्न बदलना बताया जा रहा है। मौसम के अनिश्चित होने से कई किसान अब धान (paddy) की खेती की तरफ बढ़ रहे हैं, और धान की पराली को खेत से जल्दी हटाना ज़रूरी होता है, जिसके लिए जलाना सबसे आसान और सस्ता तरीका माना जाता है।
दूसरी तरफ पंजाब और हरियाणा में सालों से चल रहे सख्त एनफोर्समेंट, मशीनों पर सब्सिडी और जागरूकता अभियानों का असर दिख रहा है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस साल पंजाब में भारी बारिश और बाढ़ से धान की फसल को नुकसान पहुंचा, जिससे वहां जलाने लायक पराली की मात्रा भी घटी।
मध्य प्रदेश के शिओपुर ज़िले में Down To Earth की ज़मीनी रिपोर्टिंग में पहले भी पाया गया था कि यहां किसान खेत खाली करने की जल्दी में होते हैं, क्योंकि अगली फसल बोने का समय बहुत कम बचता है, ऐसे में मशीन से पराली हटाने में लगने वाला समय और खर्च दोनों किसानों को भारी लगते हैं।
एक तकनीकी पेंच भी है: मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में बादलों की वजह से सैटेलाइट ठीक से तस्वीर नहीं ले पा रहा, इसलिए असल घटनाएं दर्ज आंकड़ों से ज़्यादा भी हो सकती हैं।
भारत के संदर्भ में यह क्यों मायने रखता है?
पराली जलाने से निकलने वाला धुआं सीधे हवा की गुणवत्ता को बिगाड़ता है, और सर्दियों में दिल्ली-NCR जैसे इलाकों में यह धुआं पहले से मौजूद प्रदूषण में और मिल जाता है। गर्मी और PM2.5 प्रदूषण पर हुई रिसर्च बता चुकी है कि दोनों साथ मिलें तो सेहत पर असर कई गुना बढ़ जाता है, सर्दियों में ठंड और धुआं मिलकर भी कुछ वैसा ही जोखिम बनाते हैं।
अब तक पराली नियंत्रण की ज़्यादातर नीतियां पंजाब-हरियाणा केंद्रित रही हैं, मशीनों पर सब्सिडी और जागरूकता अभियान भी वहीं सबसे ज़्यादा चले। अगर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश स्थायी रूप से नए हॉटस्पॉट बनते हैं, तो इन्हीं योजनाओं का दायरा भी इन राज्यों तक बढ़ाना होगा, वरना सिर्फ भूगोल बदलेगा, समस्या नहीं घटेगी।
अभी क्या साफ नहीं है?
बादलों की वजह से सैटेलाइट डेटा में कमी के चलते, अभी के आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं दिखाते। यह भी साफ नहीं कि मध्य प्रदेश की बढ़त पूरे सीज़न (30 नवंबर तक) तक बनी रहेगी या बीच में बदल जाएगी, जैसा मौसम बदलने पर अक्सर होता है।
ज़मीनी स्तर पर कितनी घटनाएं छोटे पैमाने पर हो रही हैं और सैटेलाइट की नज़र से बच जाती हैं, इसका सही अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। बिहार के कम लागत वाले सेंसर जैसे प्रयोग दिखाते हैं कि ज़मीनी मॉनिटरिंग के बिना असली एक्सपोज़र का अंदाज़ा लगाना कितना मुश्किल है, पराली के मामले में भी यही बात लागू होती है।
आगे क्या देखें?
30 नवंबर 2026 तक का पूरा सीज़न डेटा यह तय करेगा कि मध्य प्रदेश की यह बढ़त अस्थायी झटका थी या स्थायी बदलाव। साथ ही, दिल्ली-NCR में सर्दियों की शुरुआत के साथ AQI पर इसका कितना असर पड़ता है, यह अगले कुछ हफ्तों में साफ होने लगेगा।
केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ से मध्य प्रदेश के लिए कोई नई विशेष योजना या सख्ती आती है या नहीं, यह भी देखने लायक रहेगा, खासकर जब राज्य लगातार दूसरे-तीसरे साल भी टॉप पर बना हुआ है।
पंजाब में मशीनों पर सब्सिडी और सख्ती के मॉडल ने कुछ हद तक काम किया है, सवाल यह है कि क्या वही मॉडल मध्य प्रदेश के किसानों की अलग ज़रूरतों और फसल चक्र पर भी उतनी ही आसानी से लागू हो पाएगा, या वहां कोई अलग तरीका अपनाना होगा।
पराली जलाने की तस्वीर अब सिर्फ पंजाब-हरियाणा तक सीमित नहीं रही। जैसे-जैसे खेती के पैटर्न बदल रहे हैं, प्रदूषण का भूगोल भी बदल रहा है, और नीति को भी उसी रफ्तार से बदलना होगा।
स्रोत: Down To Earth, IARI/CREAMS, Union Environment Ministry, The Tribune