भारत का मानसून 2026 सीज़न 30 सितंबर को खत्म हुआ, और IMD के मुताबिक पूरे सीज़न में सिर्फ 759mm बारिश दर्ज हुई, जो 868.6mm के सामान्य औसत (LPA) से करीब 13% कम है। यह 2015 के बाद का सबसे कमज़ोर मानसून है।

मानसून 2026 का पूरा हिसाब: सामान्य से कितना कम?

IMD के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक सीज़न की 13% की कमी का मतलब है कि बारिश LPA के करीब 87% पर ही टिक गई। IMD खुद किसी भी साल को 90% से कम LPA पर 'अपर्याप्त' (deficient) मानसून मानता है, 2026 इस सीमा से भी नीचे रहा।

कमज़ोर मानसून के पीछे मुख्य वजह प्रशांत महासागर में बना El Niño बताया जा रहा है, जो Walker Circulation नाम के हवा के बड़े तंत्र को बिगाड़ देता है और भारत की तरफ नमी वाली हवा का बहाव कमज़ोर कर देता है। यह तंत्र कैसे काम करता है, इसे El Niño के असर वाले पहले के लेख में विस्तार से समझाया जा चुका है।

केरल में मानसून तय समय से तीन दिन देरी से, 4 जून को पहुंचा था, और उसके बाद भी पश्चिमी खेती वाले इलाकों में करीब दो हफ्ते तक आगे नहीं बढ़ा। यानी सीज़न की शुरुआत में ही बुवाई के लिए अहम समय बर्बाद हो गया था।

महीने दर महीने: जून बुरा, जुलाई ठीक, फिर अगस्त फिर बुरा

सीज़न की शुरुआत ही खराब रही। जून 2026 में सामान्य के मुकाबले करीब 40% कम बारिश हुई, 1901 के बाद यह पांचवां सबसे सूखा जून रहा। फिर जुलाई में हल्की राहत मिली, पर अगस्त फिर गहरी कमी में फिसल गया।

महीनाअसल बारिशसामान्य बारिशफर्क
जून 202699.5mm165.3mm-39.8%
जुलाई 2026290.3mm280.5mm+3.5%
अगस्त 2026213.9mm254.9mm-16.1%
पूरा सीज़न759mm868.6mmकरीब -13%

अगस्त 2026 1901 के बाद का सबसे गर्म अगस्त भी रहा, औसत तापमान 28.01°C दर्ज हुआ। गर्मी और कम बारिश की यह जोड़ी खेतों में नमी की कमी को और तेज़ी से बढ़ाती है। जुलाई की मामूली बढ़त भी इतनी छोटी और सीमित इलाकों तक रही कि वह जून के गहरे गड्ढे को भर नहीं पाई।

2015 बनाम 2026: दोनों सबसे कमज़ोर मानसून कैसे अलग हैं?

2015 भी El Niño का साल था और तब भी बारिश सामान्य से करीब 14% कम रही थी। 1951 के बाद से El Niño वाले करीब 60% साल भारत में कम या अपर्याप्त मानसून लेकर आए हैं, जिनमें 1972, 1982, 1987, 2002, 2009 और 2015 शामिल हैं। 2026 अब इसी सूची में जुड़ गया है।

पर एक अपवाद भी याद रखने लायक है: 1997 का बेहद तेज़ El Niño भारत में सूखा नहीं ला पाया था, क्योंकि उस साल हिंद महासागर में मज़बूत पॉज़िटिव IOD (Indian Ocean Dipole) बना था, जिसने Pacific के असर को काफी हद तक संतुलित कर दिया। 2026 में IOD सितंबर के आखिर तक ज़्यादातर तटस्थ रहा, और पॉज़िटिव होना बहुत देर से शुरू हुआ, तब तक नुकसान हो चुका था।

एक और दिलचस्प अपवाद 1926 का है: उस साल भी जून की बारिश 100mm से कम रही थी, फिर भी पूरा सीज़न आखिर में सामान्य से करीब 11% ज़्यादा बारिश के साथ बंद हुआ। यानी खराब जून हमेशा खराब पूरे सीज़न की गारंटी नहीं होता, पर 2026 में ऐसा नहीं हो सका।

कहां सबसे ज़्यादा असर, कहां सूखा घोषित हुआ?

पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में सबसे बड़ी कमी दर्ज हुई, सामान्य से करीब 26% कम बारिश। दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में यह आंकड़ा करीब 24% रहा। IMD के 36 मौसम उपखंडों में से 17 में बारिश की कमी दर्ज हुई, एक भी उपखंड में बड़ा अतिरिक्त (excess) नहीं मिला। रायलसीमा में सबसे बुरा हाल रहा, सामान्य से 43% कम बारिश।

  • महाराष्ट्र ने 26 सितंबर को 265 तहसीलों में सूखा घोषित किया
  • कर्नाटक में 177 से ज़्यादा तहसीलें सूखा-प्रभावित बताई गईं, संख्या अभी बढ़ रही है
  • आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और राजस्थान के कुछ हिस्सों में भी सूखे जैसे हालात
  • केंद्र की टीम 3 अक्टूबर को कर्नाटक का आकलन करने जाएगी

भारत के संदर्भ में यह क्यों मायने रखता है?

मानसून भारत की सालाना बारिश का करीब 70% हिस्सा लाता है और करीब आधी आबादी की आजीविका खेती पर टिकी है। सरकार ने 2026-27 के लिए अनाज उत्पादन का लक्ष्य 373.93 करोड़ टन रखा है, जो पिछले साल के असल उत्पादन 376.56 करोड़ टन से थोड़ा कम है। चावल उत्पादन में गिरावट का अनुमान पहले से ही लगाया जा चुका है, दाल और खाने के तेल पर दाम बढ़ने का दबाव सबसे ज़्यादा माना जा रहा है, जबकि चावल में सरकारी बफर स्टॉक से कुछ राहत मिल सकती है।

यह हमारा हिसाब है, कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं: कुल खरीफ बुवाई रकबा पिछले साल के मुकाबले सिर्फ करीब 1.2% घटा, जबकि बारिश 13% कम रही। यानी किसानों ने करीब-करीब उतनी ही ज़मीन पर फसल बोई, बस पानी कम मिला। इसका मतलब असली नुकसान रकबे में नहीं, बल्कि प्रति हेक्टेयर उपज में दिखेगा, जो अभी के आंकड़ों में साफ नहीं दिखता।

अभी क्या साफ नहीं है?

रबी सीज़न की सफलता मिट्टी की नमी, बांधों के पानी के स्तर और भूजल रिचार्ज पर निर्भर करती है, और तीनों फिलहाल सामान्य से नीचे हैं। यह कितना असर डालेगा, यह अभी के आंकड़ों से तय नहीं किया जा सकता।

IMD के नए AI-आधारित पूर्वानुमान मॉडल ने पूरे सीज़न की कमी को सही पकड़ा (29 मई के पूर्वानुमान में 90% LPA और 60% संभावना सही साबित हुई), पर महीने-दर-महीने, खासकर अगस्त की गंभीरता को कम आंका गया था। यह गैप आगे के पूर्वानुमान में कितना सुधरेगा, यह अभी साफ नहीं।

आगे क्या देखें?

El Niño साल के आखिर या 2027 की शुरुआत तक और तेज़ हो सकता है, इसका रबी सीज़न (गेहूं, सरसों, दाल) पर क्या असर पड़ता है, यह अगले कुछ महीनों में साफ होगा। कर्नाटक और महाराष्ट्र में केंद्रीय टीमों के आकलन के बाद राहत पैकेज का आकार भी तय होगा।

इतिहास बताता है कि तेज़ El Niño आमतौर पर साल के आखिर में चरम पर पहुंचते हैं और अगले मानसून से पहले कमज़ोर पड़ जाते हैं, पर 2027 के मानसून की तैयारी के लिए अभी से इस पर नज़र रखनी होगी।

मानसून 2026 का सीज़न आंकड़ों में बंद हो चुका है, पर असली परीक्षा अब शुरू होती है, मिट्टी, बांध और भूजल में बचे पानी से रबी की फसल कितनी सुरक्षित निकलती है।

स्रोत: IMD, SANDRP, Tech Times, Down To Earth

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