बिहार-झारखंड जैसे धान इलाकों के कई खेतों में सितंबर के आखिरी हफ्ते में सिंचाई का पानी वक्त पर नहीं पहुंचा। इसी कमी का नतीजा है कि भारत का चावल उत्पादन 2026-27 में करीब एक दशक में पहली बार घट सकता है।

उद्योग के अनुमान के मुताबिक यह गिरावट लगभग 1 करोड़ टन तक जा सकती है। कम बारिश और अब देर से शुरू हुई मानसून की विदाई ने खेती और बाज़ार दोनों को सतर्क कर दिया है।

मानसून की विदाई शुरू, पर बारिश अब भी 15% कम

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के मुताबिक दक्षिण-पश्चिम मानसून की विदाई (withdrawal) 19 सितंबर 2026 को पश्चिमी राजस्थान से शुरू हुई, जो सामान्य तारीख 17 सितंबर से दो दिन बाद है। IMD अपने नियमों के अनुसार विदाई तभी घोषित करता है जब किसी इलाके में लगातार 5 दिन तक बारिश थम जाए, इसलिए यह तारीख हर साल थोड़ी आगे-पीछे होती रहती है।

मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से शुरू हुए इस मानसून सीज़न में देशभर में बारिश दीर्घावधि औसत से करीब 15% कम रही है। Business Today की रिपोर्ट के अनुसार कुछ प्रमुख चावल उत्पादक राज्यों में यह कमी 42% तक पहुंच गई। हमने मानसून 2026 की बारिश की कमी पर अपनी रिपोर्ट में इलाकावार असर पहले ही बताया था।

IMD की 22 सितंबर की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार बंगाल की खाड़ी में बना एक डिप्रेशन (कम दबाव का क्षेत्र) पूर्वी और मध्य भारत में अभी और बारिश ला सकता है। इसलिए पूरे देश से मानसून की विदाई में अभी वक्त लगेगा, और आखिरी हफ्तों की बारिश धान की बाकी बची फसल के लिए मायने रखती है।

2009-10 और 2026-27: दो सूखे सालों का हिसाब

भारत में आखिरी बार चावल उत्पादन 2009-10 में इतनी बड़ी गिरावट के साथ घटा था, जब एल नीनो से जुड़े सूखे ने फसल को बुरी तरह प्रभावित किया था। उस साल पश्चिम बंगाल में सामान्य से 16%, बिहार में 25% और झारखंड में 48% कम बारिश दर्ज हुई थी, जिसके चलते इन तीनों राज्यों के दर्जनों ज़िलों को सूखाग्रस्त घोषित करना पड़ा था।

राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बी.वी. कृष्ण राव के हवाले से Business Today ने लिखा कि 2026-27 में उत्पादन पिछले साल के रिकॉर्ड 154 मिलियन टन से करीब 1 करोड़ टन घटकर लगभग 144 मिलियन टन रह सकता है, यानी करीब 6.5% की गिरावट। यह 2009-10 के बाद की सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है।

पैमाना2009-102026-27 (अनुमान)
राष्ट्रीय बारिश की कमी23%करीब 15%
चावल उत्पादन में गिरावट99.18 से 89.13 मिलियन टन154 से ~144 मिलियन टन
गिरावट (%)करीब 10%करीब 6.5%
धान का बुवाई क्षेत्रकरीब 20% कमकरीब 4% कम (11 सितंबर तक)

हमारा आकलन है कि दोनों साल टनों में गिरावट लगभग बराबर (करीब 1 करोड़ टन) दिख रही है, पर प्रतिशत और बुवाई क्षेत्र में कमी 2026-27 में काफी छोटी है।

वजह साफ है: आज उत्पादन का आधार (154 मिलियन टन) 2008-09 के मुकाबले (99 मिलियन टन) कहीं बड़ा है, इसलिए वही टनेज गिरावट अब अनुपात में हल्की दिखती है। आंकड़े डरावने लग सकते हैं, पर खेती की बुनियाद 2009 से कहीं बड़ी और स्थिर हो चुकी है।

USDA और उद्योग के अनुमान में फर्क क्यों?

अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) ने अगस्त की रिपोर्ट में 2026-27 के लिए 150 मिलियन टन चावल उत्पादन का अनुमान दिया था, जिसे सितंबर की रिपोर्ट में घटाकर 147 मिलियन टन कर दिया, यानी सिर्फ 3 मिलियन टन की कटौती। यह Reuters को दिए उद्योग के 10 मिलियन टन वाले अनुमान से काफी कम है।

यह फर्क सामान्य है क्योंकि सरकारी एजेंसियां आमतौर पर बुवाई क्षेत्र और शुरुआती पैदावार के आधिकारिक आंकड़ों पर टिकती हैं, जबकि व्यापार संघ खेतों से मिल रही ताज़ा जानकारी और मौसम के हालिया रुझान को ज्यादा वज़न देते हैं।

असली आंकड़ा कृषि मंत्रालय के अगले अग्रिम अनुमान (advance estimate) से ही साफ होगा, इसलिए फिलहाल दोनों संख्याओं को सीमा (range) की तरह देखना बेहतर है, किसी एक को अंतिम सच मानना नहीं।

भारत के लिए मतलब: किसान, कीमत और भंडार

पैदावार घटने का मतलब किसानों के लिए एक ही तरह का असर नहीं है। कम आपूर्ति से खुले बाज़ार में धान का भाव बेहतर मिल सकता है, पर जिनकी उपज खुद ही कम रही, उनकी कमाई पर दबाव भी रहेगा। सरकार का भंडार इस बार मज़बूत तकिया साबित हो रहा है:

  • 1 सितंबर तक सरकारी गोदामों में चावल और बिना पिसा धान मिलाकर करीब 5.96 करोड़ टन स्टॉक था।
  • बड़े बफर स्टॉक (सुरक्षित भंडार) के चलते घरेलू आपूर्ति और निर्यात, दोनों पर फिलहाल कोई तत्काल खतरा नहीं दिख रहा।
  • खुले बाज़ार में किसानों को बेहतर दाम मिलने की उम्मीद जताई जा रही है, खासकर जहां उपज ज्यादा नहीं गिरी।
  • 2009-10 में भी करीब 5.5 करोड़ टन का भंडार मौजूद था, जिसने तब भी घरेलू संकट को टाला था।

अनसुलझे सवाल

कृषि मंत्रालय का पहला आधिकारिक अग्रिम अनुमान अभी जारी नहीं हुआ है, इसलिए 144 या 147 मिलियन टन जैसे आंकड़े फिलहाल अनुमान ही हैं, अंतिम नहीं। यह भी साफ नहीं कि पूर्वी और मध्य भारत में बाकी बची बारिश आखिरी नुकसान की भरपाई कितनी करेगी।

रबी सीज़न में सिंचित धान की खेती खरीफ की कमी को कुछ हद तक संतुलित कर सकती है, पर इसका असर अभी संख्याओं में नहीं आया है, और यह भी तय नहीं कि आने वाले महीनों में एल नीनो की तीव्रता कैसी रहेगी।

आगे क्या देखें

तीन चीज़ों पर नज़र रखनी होगी। पहला, कृषि मंत्रालय का खरीफ 2026-27 का पहला अग्रिम अनुमान, जो असली गिरावट का आंकड़ा साफ करेगा। दूसरा, IMD की मानसून की पूरी विदाई की आधिकारिक घोषणा, जो आमतौर पर अक्टूबर के मध्य तक आती है।

तीसरा, रबी सीज़न के लिए तय 17.77 करोड़ टन के अनाज लक्ष्य पर मौसम का असर, जिसमें चावल का हिस्सा भी शामिल है। हमने अल-नीनो 2026-27 के आगे के असर पर एक अलग रिपोर्ट में भी विस्तार से लिखा है।

क्या चावल की कीमत आम लोगों के लिए बढ़ेगी?

बड़े सरकारी भंडार के चलते राशन और खुले बाज़ार में तुरंत कमी की आशंका कम है, पर स्थानीय स्तर पर कुछ किस्मों के दाम में मामूली बढ़त संभव है। असली तस्वीर अगले अग्रिम अनुमान के बाद ही साफ होगी।

क्या भारत चावल का निर्यात रोक सकता है?

अभी ऐसा कोई सरकारी संकेत नहीं है। बड़े बफर स्टॉक और पिछले साल के रिकॉर्ड उत्पादन के चलते विशेषज्ञ मानते हैं कि निर्यात फिलहाल पहले जैसा जारी रह सकता है, हालांकि यह आगे के आंकड़ों पर निर्भर करेगा।

क्या यह गिरावट पूरी तरह अल नीनो के कारण है?

बारिश की कमी और एल नीनो के बीच संबंध जताया जा रहा है, पर वैज्ञानिक अभी अलग-अलग कारणों की जांच कर रहे हैं। किसी एक मौसम घटना को सीधे अकेला कारण मान लेना जल्दबाज़ी होगी।

चावल के मामले में भारत के पास टनेज और भंडार, दोनों का सहारा है, इसलिए घबराने वाली बात फिलहाल नहीं है। पर 2009-10 और 2026-27 का यह मिलता-जुलता पैटर्न बताता है कि मानसून की छोटी सी देरी भी खेती के गणित को हिला सकती है।

स्रोत: IMD, Business Today, USDA, Reuters, Kisan India

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