दशकों से माना जाता था कि Vitamin D2 और D3, दोनों एक ही काम करते हैं, और डॉक्टर अक्सर दोनों को आपस में बदला जा सकने वाला मानते रहे। University of Surrey की एक नई मेटा-विश्लेषण स्टडी ने इस धारणा को चुनौती दी है: D2 लेने से शरीर में D3 का स्तर घट सकता है।
यह खबर उस देश के लिए खास मायने रखती है, जहां धूप भरपूर है, पर फिर भी ज़्यादातर लोग Vitamin D की कमी से जूझते हैं।
पहले क्या माना जाता था: 'Vitamin D वही है, चाहे D2 हो या D3'
Vitamin D दो रूपों में मिलता है: D2 (ergocalciferol), जो पौधों और मशरूम से आता है, और D3 (cholecalciferol), जो धूप में त्वचा खुद बनाती है। ScienceDaily के अनुसार दशकों तक दोनों को एक जैसा असरदार मानकर एक-दूसरे की जगह दिया जाता रहा।
National Institutes of Health के अनुसार यह लंबे समय से पता था कि D3, D2 के मुकाबले शरीर में Vitamin D का स्तर ज़्यादा बढ़ाता है और उसे ज़्यादा देर तक बनाए रखता है, पर D2 का D3 पर सीधा असर अब तक साफ नहीं था।
इसी वजह से प्रिस्क्रिप्शन में अक्सर दोनों को लगभग बदला जा सकने वाला मानकर लिखा जाता रहा, जैसे दो अलग ब्रांड का एक जैसा नमक, जबकि असल में उनकी बनावट अलग है।
अब क्या पता चला: D2 से D3 का स्तर घट सकता है
Nutrition Reviews journal में प्रकाशित इस नए विश्लेषण में 26 randomized controlled trial को जोड़कर देखा गया। लीड शोधकर्ता Emily Brown के अनुसार जिन लोगों ने D2 लिया, उनमें D3 का स्तर उन लोगों से भी नीचे गिर गया, जिन्होंने कोई सप्लीमेंट नहीं लिया था।
यानी D2 लेना सिर्फ कम फायदेमंद नहीं, बल्कि शरीर के अपने प्राकृतिक D3 को भी नीचे खींच सकता है। यह असर पहले से माना नहीं जाता था, इसलिए शोधकर्ता इसे 'पहले से अनजान' प्रभाव बता रहे हैं।
यह विश्लेषण उन ट्रायल पर आधारित था, जिनमें कुछ लोगों को D2 दिया गया और कुछ को बिल्कुल कोई सप्लीमेंट नहीं। दोनों समूहों के खून में D3 का स्तर मापकर तुलना की गई, और नतीजा हर बार एक जैसा निकला।
यह फर्क क्यों मायने रखता है: इम्यून सिस्टम पर असर
Frontiers in Immunology में प्रकाशित एक पहले की स्टडी में पाया गया था कि सिर्फ D3, न कि D2, शरीर के type I interferon सिस्टम को सक्रिय करता है, जो बैक्टीरिया और वायरस के खिलाफ पहली सुरक्षा पंक्ति का हिस्सा है।
यानी अगर D2 शरीर में D3 को भी घटा रहा है, तो यह सिर्फ हड्डियों के लिए कम फायदेमंद नहीं, बल्कि इम्यून सिस्टम के उस हिस्से को भी कमज़ोर कर सकता है, जो सिर्फ D3 से जागता है।
यह निष्कर्ष अभी यह साबित नहीं करता कि D3 सप्लीमेंट लेने से संक्रमण से बचाव पक्का हो जाता है; यह सिर्फ इतना दिखाता है कि दोनों रूप शरीर में अलग-अलग तरीके से काम करते हैं, और एक को दूसरे की जगह मान लेना जोखिम भरा हो सकता है।
भारत के लिए मतलब: यहां ज़्यादातर पर्चे किस फॉर्म के हैं
भारतीय बाज़ार की दवाओं पर हुई एक समीक्षा के अनुसार भारत में बिकने वाली ज़्यादातर Vitamin D दवाएं D3 यानी cholecalciferol के सैशे हैं, जिनमें हफ्ते में एक बार 60,000 IU दिया जाता है। D2 (doxercalciferol) वाली दवाएं बाज़ार में बहुत कम हैं, और वह भी बहुत छोटी मात्रा (20-100 IU) में।
हमारा आकलन है कि इस वजह से ज़्यादातर भारतीय मरीज़ों के लिए यह नई चिंता सीधे लागू नहीं होती, क्योंकि वे पहले से ही D3 ले रहे होते हैं। पर जो लोग विदेश से मंगाए गए मल्टीविटामिन या D2 वाले उत्पाद लेते हैं, उनके लिए यह जानकारी ज़रूर मायने रखती है। कुछ सस्ते मल्टीविटामिन टैबलेट में भी D2 का इस्तेमाल होता है, इसलिए पैकेट पर लिखा फॉर्म देखना समझदारी होगी।
भारत में वैसे भी 70-90% लोग Vitamin D की कमी से जूझते हैं
यह खबर भारत के लिए एक बड़े विरोधाभास के बीच आई है। कई अध्ययनों के अनुसार भरपूर धूप के बावजूद भारत की 70-90% आम आबादी Vitamin D की कमी से जूझती है, क्योंकि कपड़ों, धूप से बचाव की आदतों और दूध जैसे खाद्य पदार्थों में Vitamin D न मिलाए जाने जैसी वजहों से शरीर को पर्याप्त Vitamin D नहीं मिल पाता।
यह कमी रिकेट्स, हड्डियों के कमज़ोर होने, दिल की बीमारियों, डायबिटीज़ और यहां तक कि टीबी जैसे संक्रमणों के खतरे से भी जोड़ी जाती है। भारत में दूध जैसे रोज़मर्रा के खाद्य पदार्थों में Vitamin D मिलाने (fortification) का चलन भी बहुत सीमित है, जो अमेरिका जैसे देशों में आम है। कपड़ों की आदतें और धूप से बचने का चलन भी इस कमी की एक बड़ी वजह मानी जाती हैं।
स्वास्थ्य से जुड़े पुराने अंदाज़ों के गलत निकलने की ऐसी ही एक और मिसाल हमारी Mammogram वाली स्टोरी में भी मिलती है, जहां दशकों पुराना एक आंकड़ा नए विश्लेषण में बदल गया। शारीरिक गतिविधि को लेकर भी ऐसी ही एक धारणा हमारी एक और स्टोरी में टूटी थी।
अभी क्या पता नहीं, आगे क्या देखा जाएगा
- D2 ठीक किस तरह D3 के स्तर को घटाता है, इसका पूरा जैविक तरीका अभी साफ नहीं है।
- D2 कितनी मात्रा और कितने समय तक लेने पर यह असर दिखता है, इस पर अभी और डेटा चाहिए।
- भारत के अपने मरीज़ों पर D2-D3 के इस रिश्ते की कोई सीधी स्टडी अभी सामने नहीं आई है।
- क्या यह असर उम्र, लिंग या मौजूदा Vitamin D स्तर के हिसाब से अलग-अलग होता है, यह भी अभी साफ नहीं है।
शोधकर्ताओं का अगला सवाल यह है कि क्या बिना किसी खास वजह के D2 के बजाय हमेशा D3 को ही पहली पसंद बनाया जाना चाहिए, खासकर उन मरीज़ों के लिए जिन्हें D2 दिया जाता रहा है। यह लेख किसी को अपनी दवा बदलने की सलाह नहीं देता; किसी भी सप्लीमेंट में बदलाव से पहले डॉक्टर से बात करना ज़रूरी है।
यह नतीजा याद दिलाता है कि 'विटामिन तो विटामिन है' सोचना हमेशा सही नहीं होता। एक ही पोषक तत्व के दो रूपों में भी शरीर पर असर अलग निकल सकता है, और लेबल पर लिखा छोटा सा फॉर्म भी मायने रखता है।
स्रोत: ScienceDaily, Nutrition Reviews, National Institutes of Health, University of Surrey