पहले कई अध्ययनों से यह डर फैला कि mammogram से पकड़े गए 30-50% breast cancer शायद ऐसे हों, जो जीवन भर कभी नुकसान न करते। अब University of Southern Denmark की टीम ने JNCI (Journal of the National Cancer Institute) में आठ बड़े ट्रायल दोबारा जांचे हैं। उनके अनुसार पुराने आंकड़े समय के हिसाब से अधूरे थे, और असली overdiagnosis 5% से कम हो सकता है।
आठ पुराने ट्रायल दोबारा क्यों खोले गए
Sisse Helle Njor, Elsebeth Lynge और Matejka Rebolj समेत पांच शोधकर्ताओं ने mammography के सभी आठ randomized ट्रायल एक साथ जोड़कर देखे। इनमें New York HIP, Malmö, Two-County, Edinburgh, Canadian NBSS, Stockholm, Gothenburg और UK Age शामिल हैं।
University of Southern Denmark के अनुसार इनका मिलान Denmark के दो क्षेत्रीय screening कार्यक्रमों से किया गया। वहां कुछ इलाकों में organized screening दूसरों से 17 साल पहले शुरू हुई थी, इसलिए यह देखना आसान था कि screening के बाद कैंसर के मामले समय के साथ कैसे चढ़ते-उतरते हैं।
टीम ने तीन बातों को हिसाब में लिया:
- क्या control group की महिलाओं ने बाद में खुद screening करवाई
- दोनों समूहों को screening के कितने राउंड मिले
- फॉलो-अप कितने साल चला
30-50% का आंकड़ा फूला हुआ क्यों दिखा
Lynge के अनुसार screening शुरू होते ही diagnoses बढ़ते हैं, क्योंकि कैंसर पहले पकड़ में आने लगते हैं। बाद में गिरावट आनी चाहिए, क्योंकि इनमें से कई कैंसर वैसे भी आगे चलकर पकड़े जाते। अगर स्टडी इस गिरावट के दिखने से पहले खत्म हो जाए, तो शुरुआती उछाल को overdiagnosis मान लिया जाता है।
इसे त्योहार की ट्रेन-टिकट बुकिंग से समझें। खिड़की कई महीने पहले खुले, तो शुरू के हफ्तों में बुकिंग अचानक बढ़ी दिखेगी और बाद में घटेगी, क्योंकि वही लोग पहले बुक कर चुके हैं। सिर्फ पहला महीना गिनने वाला मान लेगा कि यात्री बढ़ गए, जबकि कुल संख्या वही थी, बस समय आगे खिसक गया।
Matejka Rebolj के अनुसार कुछ पुराने ऊंचे अनुमान उस समय बने, जब ट्रायल का डेटा पूरी तरह परिपक्व नहीं हुआ था। पूरे समय-संदर्भ में देखने पर ट्रायल का डेटा 5% से कम overdiagnosis के अनुरूप है, 50% के करीब वाले अनुमानों के नहीं। इन अनुमानों ने अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं और guidelines को प्रभावित किया था, इसलिए यह फर्क सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है।
| आंकड़ा | क्या है |
|---|---|
| पुराने कुछ अनुमान | 30-50% |
| नए विश्लेषण के अनुरूप | 5% से कम |
| दोबारा जांचे गए randomized ट्रायल | 8 |
| Denmark में क्षेत्रों के बीच screening का फर्क | 17 साल |
Overdiagnosis का असल मतलब क्या है
Overdiagnosis का मतलब गलत जांच रिपोर्ट नहीं है। यह ऐसा असली कैंसर है, जो महिला की पूरी उम्र में न लक्षण देता, न जान को खतरा बनता। University of Southern Denmark के अनुसार इसमें वे मामले भी गिने जा सकते हैं, जिनमें महिला की कैंसर पता चलने के तुरंत बाद किसी और वजह से मौत हो गई।
इसे false positive से अलग समझना ज़रूरी है। False positive में जांच में गड़बड़ दिखती है, पर आगे की जांच में कैंसर नहीं निकलता। Overdiagnosis में कैंसर असली निकलता है, पर वह जीवन भर चुपचाप पड़ा रहता, इसलिए उसके इलाज से महिला को कोई फायदा नहीं मिलता। यह विश्लेषण सिर्फ इसी दूसरी समस्या का हिसाब है।
टीम ने invasive कैंसर और DCIS (ductal carcinoma in situ) दोनों को देखा। Njor के अनुसार अब यह भरोसा किया जा सकता है कि जल्दी पहचान के फायदे, गैरज़रूरी इलाज के छोटे जोखिम से ज़्यादा हैं। यह शोधकर्ताओं का अपना निष्कर्ष है।
भारत के लिए मतलब: यहां बहस उल्टी दिशा की है
GLOBOCAN 2022 के हवाले से International Journal of Breast Cancer की एक समीक्षा के अनुसार भारतीय महिलाओं में सभी कैंसर के मामलों में 26.6% breast cancer के हैं। यही समीक्षा बताती है कि देर से पहचान और इलाज में देरी की वजह से भारत में जीवित रहने की दर पश्चिमी देशों से कम है।
World Cancer Research Fund के अनुसार 2022 में दुनिया भर में महिलाओं में breast cancer के करीब 23 लाख नए मामले आए, और सबसे ज़्यादा मामलों वाले देशों में चीन और अमेरिका के साथ भारत भी है। उसी समीक्षा में cervical cancer 17.7% के साथ भारतीय महिलाओं में दूसरे नंबर पर बताया गया है।
NFHS-5 के आंकड़ों के हवाले से Clinical and Experimental Obstetrics and Gynecology की एक समीक्षा में लिखा है कि सिर्फ 0.9% महिलाओं ने कभी breast cancer screening करवाई है। हमारी राय में overdiagnosis की चिंता उन देशों की समस्या है जहां बड़े पैमाने पर screening होती है। भारत में असली कमी जांच तक पहुंच और समय पर पहचान की है।
गांवों में जांच पहुंचाने की कोशिशों पर हमारी IIT Jodhpur की Edge AI Healthcare वाली स्टोरी भी पढ़ी जा सकती है। कैंसर से जुड़ी एक और हालिया खोज पर CRISPR वाली Blood Cancer स्टोरी है।
जो अभी पता नहीं: इस नतीजे की सीमाएं
- यह नया ट्रायल नहीं, पुराने ट्रायल के आंकड़ों का दोबारा विश्लेषण (meta-analysis) है।
- तुलना Denmark के आंकड़ों से की गई; भारतीय आबादी पर ऐसा कोई अनुमान इस विश्लेषण में नहीं है।
- International Journal of Breast Cancer की समीक्षा के अनुसार भारत में breast density ज़्यादा होने से mammography की अपनी सीमाएं भी हैं।
- आज की तकनीक, जैसे 3D mammography, पर ये आंकड़े सीधे लागू होंगे या नहीं, यह इस विश्लेषण से तय नहीं होता।
- क्या दूसरे शोध समूह भी इसी तरीके से यही नतीजा पाएंगे, यह अभी खुला सवाल है।
यह लेख किसी को screening करवाने या न करवाने की सलाह नहीं देता। यह सिर्फ एक अध्ययन के नतीजे का ब्योरा है।
अगली खबर पर नज़र
Rebolj के अनुसार पहले के कुछ ऊंचे अनुमानों ने screening guidelines और मरीज़ों को दी जाने वाली जानकारी को प्रभावित किया था। अब देखने वाली बात यह है कि guidelines बनाने वाली संस्थाएं इस विश्लेषण पर क्या रुख लेती हैं। भारत में भी अपनी आबादी पर ऐसे आंकड़े आना बाकी है।
एक और बात देखने लायक है कि भारत जैसे कम-screening वाले देश ऐसे शोध से सीधे सबक लेते हैं, या पहले अपने आंकड़ों का इंतज़ार करते हैं।
तो 30-50% से 5% से कम तक का यह फर्क किसी नई मशीन या दवा से नहीं आया, बल्कि पुराने आंकड़ों को सही समय-रेखा में रखने से आया। भारत के लिए फिलहाल बड़ा सवाल यह है कि जांच पहले हो पाए, इतनी पहुंच बने।
स्रोत: JNCI, University of Southern Denmark, ScienceDaily, GLOBOCAN 2022, NFHS-5