आम धारणा है कि हर दिन ठीक 24 घंटे का होता है, न एक सेकंड कम, न ज़्यादा। असल में ऐसा नहीं है। धरती की घूमने की रफ़्तार दशकों के दौरान कुछ मिलीसेकंड तक बदलती रहती है। Nature journal में 23 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक स्टडी ने अब इसकी असली वजह बता दी है।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में यह फर्क किसी को महसूस नहीं होता, पर समय मापने वाले सबसे सटीक परमाणु घड़ियों और सैटेलाइट नेविगेशन जैसे सिस्टम के लिए यह मायने रखता है।

क्या हुआ: 30 साल पुरानी गुत्थी आखिर सुलझी

University of Alberta के Huifeng Zhang और Mathieu Dumberry ने एक मॉडल बनाया। 30 से ज़्यादा साल से वैज्ञानिक जानते थे कि धरती की कोर और मेंटल के बीच घूर्णन-ऊर्जा (angular momentum) का आना-जाना होता है, पर यह ठीक किस तरीके से होता है, यह साफ नहीं था।

Dumberry के अनुसार यह लंबे समय से तय था कि दशकों में होने वाले बदलावों के लिए कोर ही ज़िम्मेदार है। सवाल सिर्फ यह था कि कोर और मेंटल के बीच यह असर आता कैसे है।

1988 में हुए एक पुराने शोध ने पहली बार यह जोड़ा था कि कोर और मेंटल के बीच घूर्णन-ऊर्जा का आना-जाना धरती के घूमने की रफ़्तार बदल सकता है। पर पिछले करीब 38 साल में कोई भी मॉडल इस आना-जाने का ठीक तरीका साबित नहीं कर पाया था।

असली वजह क्या निकली: तीन मुमकिन ताकतें, जीती सिर्फ एक

Nature की रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिक तीन तरह की ताकतों पर शक करते थे:

  • इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कपलिंग: धरती के चुंबकीय क्षेत्र से जुड़ी ताकत
  • टोपोग्राफिक कपलिंग: कोर और मेंटल की सीमा पर मौजूद भौतिक असमानियां
  • ग्रैविटेशनल कपलिंग: कोर और मेंटल के घने हिस्सों के बीच सीधा गुरुत्व खिंचाव

टीम ने पाया कि ग्रैविटेशनल कपलिंग ही मुख्य वजह है। धरती की ठोस भीतरी कोर पूरी तरह गोल नहीं है। जब बाहरी तरल कोर में बहाव इसे मेंटल के घने हिस्सों से थोड़ा इधर-उधर घुमा देता है, तो गुरुत्व इसे वापस सीध में लाने की कोशिश करता है, और इसी खिंचाव से मेंटल की रफ़्तार थोड़ी बदल जाती है।

इसे एक आसान उदाहरण से समझें: जैसे दो चुंबक एक-दूसरे को सीध में लाने की कोशिश करते हैं, वैसे ही कोर का भारी हिस्सा मेंटल के भारी हिस्से के पास आने की कोशिश करता है। जब बहाव इसे हल्का सा हटा देता है, तो यह खिंचाव एक हल्का धक्का या रोक लगाने जैसा काम करता है।

यह मॉडल कैसे टेस्ट हुआ

टीम ने seismic तरंगों से कोर के घूमने का अंदाज़ा, और चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव से बाहरी कोर के बहाव का अंदाज़ा जोड़कर एक गणितीय मॉडल बनाया। The Debrief के अनुसार इस मॉडल से निकले टॉर्क की तुलना 1964 से 2019 तक के सही किए गए दिन-लंबाई आंकड़ों से की गई, और दोनों आपस में मेल खा गए।

ScienceDaily के अनुसार यह नतीजा मेंटल की सबसे नीचे वाली परत, जिसे वैज्ञानिक D′′ (डी-डबल-प्राइम) परत कहते हैं, की बनावट के बारे में भी नए सुराग देता है। यह परत घनत्व में बाकी मेंटल से अलग और कुछ जगहों पर लोहे से भरपूर मानी जाती है।

दिन छोटा-बड़ा होने की बाकी वजहों से यह कैसे अलग है

वजहअसर का समयदिन पर असर
चांद का ज्वारीय खिंचाव (tidal friction)लाखों-करोड़ों सालधीरे-धीरे दिन को लंबा करता है
हवा, समुद्र, मौसमदिन से सीज़न तकबहुत छोटे, तेज़ बदलाव
कोर-मेंटल ग्रैविटेशनल टॉर्क (नई वजह)दशकोंकुछ मिलीसेकंड का घटना-बढ़ना

यानी यह नई वजह सिर्फ उस बीच के समय-पैमाने को समझाती है, जो चांद के असर और मौसम के असर के बीच खाली था। तीनों वजहें एक साथ मिलकर ही धरती की असली, थोड़ी अनियमित रफ़्तार बनाती हैं।

भारत के लिए मतलब: Leap Second और NPL की घड़ी

धरती की रफ़्तार में ऐसे ही छोटे बदलावों की वजह से दुनिया भर की परमाणु घड़ियों में कभी-कभी एक 'Leap Second' जोड़ना पड़ता है। भारत में Indian Standard Time (IST) का कानूनी संरक्षक CSIR-National Physical Laboratory (NPL), नई दिल्ली है, जो संसद के एक कानून के तहत यह ज़िम्मेदारी निभाता है।

जनवरी 2017 में जब दुनिया भर में 37वां Leap Second जोड़ा गया, तो भारत में यह IST 05:29:59 बजे जोड़ा गया था। हमारी राय में इस तरह की बुनियादी रिसर्च आगे भी तय करती रहेगी कि समय मापने वाली ऐसी घड़ियों में कब बदलाव ज़रूरी होगा।

धरती के भीतर झांकने वाली ऐसी रिसर्च सिर्फ धरती तक सीमित नहीं है। Mars के अंदर भी ऐसी छिपी गर्मी का सुराग मिला था, जिसकी बात हमारी Mars के अंदरूनी तापमान वाली स्टोरी में हुई थी। उसी तरह Mercury के सिकुड़ने के पीछे की वजह भी ग्रह के अंदर से जुड़ी थी, जो हमारी Mercury वाली स्टोरी में बताई गई है।

जो अभी साफ नहीं

  • क्या दशकों वाला यह बदलाव किसी तय चक्र में दोहराता है, जैसे करीब 70 साल का कोई पैटर्न, यह अभी साफ नहीं है।
  • कोर के अंदर नीचे मौजूद परतों की सटीक बनावट अभी भी सीधे नहीं मापी जा सकती, सिर्फ अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
  • क्या इलेक्ट्रोमैग्नेटिक और टोपोग्राफिक कपलिंग का भी कोई छोटा हिस्सा इसमें शामिल है, यह अभी पूरी तरह खारिज नहीं हुआ।

आगे क्या देखा जाएगा

Dumberry और उनकी साथी वैज्ञानिक के अनुसार अगला कदम यह होगा कि बेहतर होते हुए रोटेशन और कोर-मोशन के आंकड़ों को इस मॉडल के साथ जोड़ा जाए, ताकि धरती की गहरी परतों की और साफ तस्वीर बन सके। कोई भी यंत्र सीधे कोर के भीतर नहीं जा सकता, क्योंकि यह धरती की सतह से करीब 5,150 से 6,371 किलोमीटर नीचे है, इसलिए दिन की लंबाई में यह मिलीसेकंड भर का बदलाव ही अभी सबसे भरोसेमंद सुराग है।

Zhang और Dumberry यह भी देखना चाहते हैं कि क्या इसी तरीके से बुध और मंगल जैसे दूसरे ग्रहों के घूमने में होने वाले छोटे बदलावों को भी समझा जा सकता है, जिनके अंदर भी धरती जैसी ठोस और तरल परतें मौजूद हैं।

तो अगली बार जब घड़ी ठीक आधी रात 12 बजे का इंतज़ार करें, याद रखिए कि वह इंतज़ार धरती के अंदर करीब 6,371 किलोमीटर नीचे हो रही एक धीमी, अनदेखी रस्साकशी पर भी टिका है।

स्रोत: Nature Journal, University of Alberta, ScienceDaily, The Debrief, CSIR-NPL

यह भी पढ़ें