क्या Vihaan चिप बनने के बाद भारत चिप-मामलों में आत्मनिर्भर हो गया? नहीं। यह एक शुरुआती डिज़ाइन-सफलता है, असली फ़र्क तब आएगा जब कोई फ़ैब्रिकेशन प्लांट बड़े पैमाने पर ऐसे चिप्स बनाकर बाज़ार में भेजे, और वह अभी दूर है।

हर हफ़्ते कोई न कोई घोषणा आती है: नया processor, नया fab, नया target। इतनी खबरों के बीच चार बड़ी ग़लतफ़हमियाँ बार-बार दोहराई जाती हैं। आइए एक-एक करके तथ्यों से जाँचते हैं।

भ्रम पहला: 'Vihaan/Vega बन गया, यानी अब हम पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं'

Wikipedia के VEGA Microprocessors पेज के अनुसार VEGA परिवार C-DAC ने Digital India RISC-V (DIR-V) कार्यक्रम के तहत बनाया है, जिसमें 32-बिट और 64-बिट, सिंगल और मल्टी-कोर डिज़ाइन शामिल हैं। THEJAS32 (VEGA ET1031) को मलेशिया में और THEJAS64 को SCL मोहाली में फ़ैब्रिकेट किया गया।

IIT मद्रास की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार संस्थान के निदेशक V. Kamakoti ने खुद कहा कि SHAKTI और VEGA जैसे प्रोसेसर 'जनरेशन माइनस वन', यानी नवीनतम विदेशी चिप्स से एक पीढ़ी पीछे बेंचमार्क करते हैं। EngineersGarage के अनुसार जनवरी 2026 तक इनकी तैनाती ज़्यादातर प्रोटोटाइप और डेवलपमेंट बोर्ड तक सीमित है।

अब तक की पूरी पाइपलाइन को एक जगह देखें तो तस्वीर साफ़ होती है।

प्रोसेसरसंस्थामुख्य इस्तेमाल
SHAKTI (2018)IIT मद्रासरणनीतिक, स्पेस, डिफ़ेंस
AJIT (2018)IIT बॉम्बेइंडस्ट्रियल, रोबोटिक्स
VIKRAM 3201 (2025)ISRO-SCLस्पेस मिशन, नेविगेशन
VEGA/THEJAS (2025)C-DACब्रॉडबैंड, इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन
DHRUV64 (2025)C-DACएम्बेडेड कंप्यूटिंग

भ्रम दूसरा: 'Dholera फ़ैब से अगले महीने Made-in-India चिप मिलने लगेगी'

Blitz India Media के अनुसार Tata-PSMC का Dholera फ़ैब भारत का पहला front-end फ़ैब है, जिसमें 50,000 wafer starts प्रति माह और 28-नैनोमीटर नोड का लक्ष्य है। 'पहली सिलिकॉन' दिसंबर 2026 तक आने का लक्ष्य कई रिपोर्टों में दर्ज है।

पर Tech Times के अनुसार असल कमर्शियल प्रोडक्शन 90nm नोड पर मध्य-2028 तक ही शुरू होगा। Business Connect Magazine के अनुसार खुद कोई तय तारीख मौजूद नहीं है और सही समय-सीमा की पुष्टि सिर्फ़ Tata Electronics कर सकती है। यानी 'अगले महीने चिप मिलेगी' वाली बात सरासर ग़लत है।

भ्रम तीसरा: 'ये Taiwan और China जैसे advanced चिप्स होंगे'

Dholera का 28-110 नैनोमीटर नोड ऑटोमोटिव चिप्स, इंडस्ट्रियल माइक्रोकंट्रोलर, AI एक्सेलेरेटर और डिस्प्ले ड्राइवर के लिए है, IMARC Engineering की रिपोर्ट के अनुसार। यह टिकाऊ, बड़े इस्तेमाल वाला 'legacy' नोड है, TSMC के 3-5 नैनोमीटर वाले फ़्लैगशिप नोड से कई पीढ़ी पीछे।

Business Connect के अनुसार केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव का लक्ष्य 2032 तक भारत को टॉप-6 सेमीकंडक्टर देश और 2047 तक टॉप-3 बनाना है। यानी सरकार खुद इसे दशकों का सफ़र मानती है, हफ़्तों का नहीं।

इसका मतलब यह नहीं कि 28-110nm नोड बेकार है। ऑटोमोटिव, IoT और डिफ़ेंस जैसे क्षेत्रों में यही 'मैच्योर' नोड सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होता है, और वहीं भारत के लिए सबसे बड़ा तत्काल बाज़ार भी है।

भ्रम चौथा: 'ये चिप्स मोबाइल फ़ोन में लगेंगे'

अभी जो तीन प्लांट चालू हैं, वे Micron, Kaynes Semicon और CG Power-Renesas के हैं, और तीनों OSAT/ATMP यानी असेंबली-टेस्टिंग-पैकेजिंग यूनिट हैं, Tech Times के अनुसार। ये कहीं और बने चिप्स को पैकेज करते हैं, नए चिप्स डिज़ाइन या फ़ैब्रिकेट नहीं करते।

SHAKTI, VEGA, DHRUV64 जैसे स्वदेशी प्रोसेसर भी अभी IoT, इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन, ब्रॉडबैंड डिवाइस और ISRO के Vikram जैसे स्पेस/डिफ़ेंस सिस्टम के लिए बने हैं, TechPowerUp के अनुसार। फ़्लैगशिप स्मार्टफ़ोन में इस्तेमाल होने वाले SoC अभी भी Qualcomm या MediaTek के ही हैं।

EE Times के अनुसार C-DAC के वैज्ञानिक Libin T.T. ने खुद DHRUV64 को 'जानबूझकर उठाया गया मध्यवर्ती कदम' बताया, कोई तकनीकी क्रांति नहीं। यानी कंपनी अपने कदम को भी सोच-समझकर, धीरे-धीरे बढ़ने वाला बता रही है, न कि अचानक बड़ी छलांग।

भारत पर इसका असर

Hello Entrepreneurs के अनुसार भारत के पास चिप-डिज़ाइन की काफ़ी काबिलियत पहले से है, पर सिर्फ़ डिज़ाइन से फ़ैब नहीं चलता। असेंबली-टेस्टिंग में भारत तेज़ी से आगे बढ़ा है, जबकि असल वेफ़र-फ़ैब्रिकेशन अभी शुरुआती चरण में है, और यही अगला बड़ा इम्तिहान है।

यह हमारा आकलन है: Micron, Kaynes और CG Power मिलकर रोज़ाना करीब 2.7 करोड़ चिप्स पैकेज करने की क्षमता की तरफ़ बढ़ रहे हैं, पर यह गिनती असेंबली की है, फ़ैब्रिकेशन की नहीं। जुलाई 2026 में मंज़ूर हुआ Semicon Mission 2.0 (₹1,27,500 करोड़) इसी कमी को भरने के लिए है — उपकरण, कच्चा माल और डिज़ाइन इकोसिस्टम पर।

IMARC Engineering के अनुसार भारत सरकार अब तक Semicon Mission के तहत ₹5,000 करोड़ बांट चुकी है, कुल मंज़ूर 12 परियोजनाओं के लिए तय रकम के मुक़ाबले। यह दिखाता है कि खर्च और निर्माण दोनों अभी शुरुआती चरण में हैं, अंतिम चरण में नहीं।

पहले VIHAAN चिप की कहानी में सिर्फ़ एक सफल डिज़ाइन दिखा था; अब असली सवाल यह है कि Dholera जैसे फ़ैब उसी डिज़ाइन को बड़े पैमाने पर सिलिकॉन में बदल पाते हैं या नहीं।

किन सवालों के जवाब बाकी हैं

Dholera की सही तारीख पर ही रिपोर्टें अलग-अलग हैं: कोई दिसंबर 2026 में 'पहली सिलिकॉन' कहता है, कोई मध्य-2028 में कमर्शियल प्रोडक्शन। दोनों सही हो सकते हैं अगर 'पहली सिलिकॉन' सिर्फ़ टेस्ट रन हो, बड़े पैमाने का उत्पादन बाद में आए, पर यह भेद अभी साफ़ नहीं किया गया है।

Dholera प्रोजेक्ट में चल रहा बोर्डरूम विवाद भी समय-सीमा पर असर डाल सकता है, पर यह असर कितना बड़ा होगा, अभी अनुमान ही है। यह भी साफ़ नहीं कि 12 मंज़ूर परियोजनाओं में से बाकी कितनी 2027 तक चालू हो पाएँगी।

आगे किन बातों पर नज़र रहे

तीन चीज़ें आने वाले महीनों में साफ़ करेंगी कि यह सफ़र कहाँ तक पहुँचा है:

  • Dholera से 'पहली सिलिकॉन' निकलने की पुष्टि, और वह टेस्ट है या असली उत्पादन।
  • DHANUSH64 और DHANUSH64+ जैसे अगली पीढ़ी के SoC का 2026-27 में तय टेप-आउट।
  • Semicon Mission 2.0 के तहत कितने नए fab या OSAT प्रोजेक्ट मंज़ूर होते हैं।

इनमें से हर एक मील का पत्थर यह तय करेगा कि 2032 और 2047 के सरकारी लक्ष्य कागज़ पर रहते हैं या ज़मीन पर उतरते हैं। अगले एक-दो साल में यही फ़र्क साफ़ होगा।

Vega प्रोसेसर एक अच्छी शुरुआत थी, मंज़िल नहीं। भारत का चिप-सफ़र डिज़ाइन जीत चुका है, अब फ़ैब्रिकेशन में जीतना बाकी है, और वह लड़ाई अभी बीच में है।

स्रोत: IIT Madras, TechPowerUp, EngineersGarage, Blitz India Media, Tech Times, Business Connect Magazine

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