भारत में सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच गर्मी से जुड़ी करीब 15,800 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। यह अनुमान शिकागो यूनिवर्सिटी की Climate Impact Lab ने 23 सितंबर 2026 को जारी अपनी रिपोर्ट में दिया है, जिसमें मौजूदा तेज़ अल-नीनो को वजह बताया गया है।
क्या है यह चौंकाने वाला अनुमान?
Climate Impact Lab की रिपोर्ट "451,000 at Risk: Where Action Can Save Lives During the Super El Niño" के मुताबिक दुनियाभर में सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच करीब 451,000 अतिरिक्त गर्मी से जुड़ी मौतें हो सकती हैं। भारत का अनुमानित आंकड़ा 15,800 है, जिसमें करीब ±1,600 का त्रुटि-दायरा (margin of error) बताया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार यह तुलना 1996 से 2025 तक के सामान्य वर्षों के औसत से की गई है, यानी यह उतनी "अतिरिक्त" मौतें हैं जो किसी सामान्य साल में शायद न होतीं। संस्था खुद साफ कहती है कि यह आंकड़ा भविष्य का अनुमान है, न कि कोई तय मृत्यु-दर।
असली नतीजा तापमान के असली रुझान और सरकारों-समुदायों की तैयारी पर निर्भर करेगा। इसलिए रिपोर्ट का शीर्षक भी मौतों की गिनती पर नहीं, बल्कि "कहां कार्रवाई से जानें बचाई जा सकती हैं" पर टिका है।
भारत बनाम बाकी दुनिया: कौन सबसे ज्यादा प्रभावित
Hub News की रिपोर्ट के अनुसार इस अवधि में सबसे ज्यादा अतिरिक्त मौतों वाले देशों में नाइजीरिया, इंडोनेशिया और सूडान के बाद भारत चौथे नंबर पर है। नीचे कुछ प्रमुख अनुमान दिए गए हैं:
| देश/क्षेत्र | अनुमानित अतिरिक्त मौतें (सितंबर 2026-फरवरी 2027) |
|---|---|
| साहेल क्षेत्र (अफ्रीका, ~10 देश) | 66,800 |
| इंडोनेशिया | 19,300 |
| फिलीपींस, वियतनाम, थाईलैंड, कंबोडिया (मिलाकर) | 19,400 |
| भारत | 15,800 (±1,600) |
| ब्राज़ील | 13,300 |
हमारा आकलन है कि यह सूची भ्रामक लग सकती है क्योंकि साहेल में 10 देश मिलाकर गिने गए हैं, जबकि भारत अकेला एक देश है। फिर भी आबादी के हिसाब से देखें तो भारत में प्रति व्यक्ति खतरे का स्तर सूडान-नाइजीरिया जैसे अफ्रीकी देशों से कम आंका गया है।
रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की भूमि सतह का औसत तापमान इस दौरान सामान्य से करीब 1.2°C ज़्यादा रह सकता है, और सामान्य साल के मुकाबले करीब 44% ज़्यादा बेहद गर्म दिन दर्ज हो सकते हैं।
यह अनुमान आया कैसे?
Climate Impact Lab ने भारत सहित दुनिया भर के 24,378 इलाकों के लिए पहले से तैयार तापमान-मृत्यु दर के संबंध (temperature-mortality relationship) को इस सीज़न के तापमान अनुमानों पर लागू किया है। इसमें स्थानीय जलवायु, आबादी की संवेदनशीलता और अनुकूलन क्षमता (adaptive capacity) को भी शामिल किया गया है।
संस्था ने अभी वे सटीक गणितीय गुणांक (coefficients) सार्वजनिक नहीं किए हैं जो तापमान बढ़ने को मौतों की संख्या से जोड़ते हैं। पूरी वैज्ञानिक कार्यप्रणाली एक आने वाले पीयर-रिव्यूड शोधपत्र में दी जाएगी, इसलिए अभी बाहरी विशेषज्ञ इसे पूरी तरह स्वतंत्र रूप से जांच नहीं पाए हैं।
यह तरीका पूरी तरह नया भी नहीं है। इससे पहले भी शोधकर्ता तापमान और मृत्यु दर के ऐतिहासिक आंकड़ों से ऐसे मॉडल बनाते रहे हैं, पर इस बार पैमाना बहुत बड़ा है और अनुमान अल-नीनो के दौरान ही सार्वजनिक किया गया है, जब तैयारी का समय अभी बचा है।
भारत के लिए मतलब: कब और कहां ज्यादा खतरा
रिपोर्ट के मुताबिक भारत की अनुमानित 15,800 मौतों में से लगभग आधी, यानी करीब 7,400, दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच होने की आशंका है। यानी खतरा सिर्फ आने वाले हफ्तों तक सीमित नहीं, बल्कि सर्दियों तक फैला हुआ माना जा रहा है।
इसी दौर में भारत का दक्षिण-पश्चिम मानसून विदाई (withdrawal) के चरण में है। 22 सितंबर 2026 तक देश की बारिश सामान्य से करीब 15% कम रही, दक्षिण और पूर्वी भारत में यह कमी और ज्यादा रही।
हमने अल-नीनो 2026-27 के मॉनसून-गर्मी पर असर वाली अपनी पिछली रिपोर्ट में इसका मौसमी पहलू पहले ही बताया था, और चावल उत्पादन पर मानसून की कमी के असर को भी अलग से कवर किया था। यह नई रिपोर्ट उसी मौसम की सेहत पर पड़ने वाली कीमत गिनने की कोशिश है।
Climate Impact Lab अपने Adaptation Inventory के ज़रिए बताता है कि समय रहते चेतावनी तंत्र, कूलिंग सेंटर और बाहर काम करने वाले मज़दूरों की सुरक्षा जैसे कदम मौतें घटा सकते हैं। रिपोर्ट का जोर आंकड़ा डराने पर नहीं, बल्कि अभी तैयारी का समय बचा होने पर है।
जो अभी पता नहीं
रिपोर्ट के तापमान-मृत्यु दर वाले सटीक गुणांक अभी सार्वजनिक नहीं हैं, इसलिए बाहरी विशेषज्ञ अभी इस आंकड़े की स्वतंत्र जांच नहीं कर पाए हैं। यह भी साफ नहीं कि भारत के भीतर किन राज्यों या शहरों पर असर सबसे ज्यादा पड़ेगा, क्योंकि रिपोर्ट में देश-स्तर का ही आंकड़ा दिया गया है, राज्यवार ब्यौरा नहीं।
वैज्ञानिक अभी यह भी जांच रहे हैं कि आने वाले महीनों में यह अल-नीनो कितना तेज़ रहेगा। तापमान के असली आंकड़े और सरकारी तैयारी के हिसाब से असली मृत्यु दर अनुमान से कम या ज़्यादा, दोनों हो सकती है।
अगली खबर पर नज़र
तीन चीज़ों पर नज़र रखनी होगी। पहला, Climate Impact Lab का आने वाला पीयर-रिव्यूड शोधपत्र, जो पूरी कार्यप्रणाली सामने लाएगा। दूसरा, दिसंबर-फरवरी के दौरान भारत के अलग-अलग राज्यों से आने वाले असली तापमान और स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े।
तीसरा, केंद्र और राज्य सरकारों के हीट एक्शन प्लान में इस रिपोर्ट के बाद कोई बदलाव होता है या नहीं, यह भी देखने लायक होगा। खासकर उन शहरों में जहां पहले से गर्मी से जुड़ी मौतें दर्ज होती रही हैं।
क्या ये 15,800 मौतें अभी हो चुकी हैं?
नहीं। यह एक मॉडल-आधारित अनुमान है कि सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच कितनी अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं, सामान्य साल की तुलना में। यह पहले से दर्ज कोई मृत्यु-आंकड़ा नहीं है।
क्या यह सीधे जलवायु परिवर्तन का नतीजा है?
रिपोर्ट अल-नीनो को मुख्य वजह बताती है, जो खुद जलवायु परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है, पर किसी एक मौसम घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ना जल्दबाज़ी होगी। वैज्ञानिक अभी इसके अलग-अलग पहलुओं की जांच कर रहे हैं।
यह आंकड़ा किसी तय भविष्य की घोषणा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि तैयारी का समय अभी बचा है। अगले कुछ महीनों की सर्दियों में असली स्थिति कैसी रहती है, यह इसी तैयारी पर काफी हद तक निर्भर करेगा।
स्रोत: Climate Impact Lab, Down To Earth, The Bridge Chronicle, Hub News, The Hans India