क्या फोटॉन और आयन की तरह आवाज़ के सबसे छोटे कण भी अचानक एक ऊर्जा स्तर से दूसरे में कूद सकते हैं? यही सवाल भौतिकविदों को सौ साल से उलझाए हुए था। Stanford University के शोधकर्ताओं ने अब इसका जवाब सीधे प्रयोग से दे दिया है, और यह जर्नल Science में सितंबर 2026 में प्रकाशित हुआ है।

पहले क्या पता था: सौ साल पुरानी थ्योरी, सिर्फ आयन और फोटॉन में देखी गई

क्वांटम जंप यानी एक ऊर्जा स्तर से दूसरे में अचानक कूदना, इसकी थ्योरी 1900 के दशक की शुरुआत से मौजूद है। Stanford Report के अनुसार वैज्ञानिकों ने पहली बार 1986 में trapped ions में यह जंप देखा, और 2007 में photons (रोशनी के कण) में।

लेकिन phonon, यानी आवाज़ या कंपन का सबसे छोटा क्वांटम यूनिट, में यह जंप अब तक किसी ने रीयल-टाइम में नहीं देखा था। खाली Space में Light बदलने वाली एक और सौ साल पुरानी पहेली भी हाल में सुलझी थी, वह हमारी Magnetar वाली स्टोरी में पढ़ी जा सकती है।

ऐसा क्यों नहीं हो पाया था? Stanford Report बताती है कि यांत्रिक कंपन (mechanical vibration) में आयन या फोटॉन जैसी सफाई नहीं होती — आसपास की गर्मी और शोर बहुत तेज़ी से क्वांटम अवस्था बिगाड़ देते हैं। यही वजह थी कि फोनोन का जंप पकड़ना बाकी दोनों से कहीं ज़्यादा मुश्किल रहा।

खाली Space में Light बदलने वाली एक और सौ साल पुरानी पहेली भी हाल में सुलझी थी, वह हमारी Magnetar वाली स्टोरी में पढ़ी जा सकती है।

अब क्या बदला: फोनोन का जंप रीयल-टाइम में पकड़ा गया

Amir Safavi-Naeini की टीम ने चिपमेकिंग तकनीक से एक बेहद छोटा mechanical resonator बनाया। यह असल में एक सूक्ष्म ट्यूनिंग फोर्क जैसा उपकरण है, जो हिलने पर आवाज़ जैसी कंपन पैदा करता है।

Stanford Report के अनुसार टीम ने इस resonator को एक सुपरकंडक्टिंग क्यूबिट से जोड़ा। क्यूबिट ने बिना resonator की क्वांटम अवस्था बिगाड़े, बार-बार जांच की कि अंदर फोनोन ऊर्जा स्तर 1 पर है या 0 पर। इसी जांच से जंप का ठीक पल पकड़ में आया।

यह कैसे मुमकिन हुआ: चिप जितना छोटा पुर्जा, घंटों जैसी लंबी घंटी

यह resonator सिर्फ 2 मिलीसेकंड तक 'बजता' रहा, पर सूक्ष्म पैमाने पर यह बहुत लंबा समय है। Stanford के अनुसार अगर सामान्य आकार का ट्यूनिंग फोर्क इतनी ही देर तक बजता रहे, तो वह कई घंटों तक गूंजता रहेगा।

टीम ने यह resonator thin-film lithium niobate नाम की सामग्री से, चिप बनाने वाली तकनीक से ही तैयार किया। इतना छोटा आकार होने से एक ही चिप पर ऐसे कई resonator साथ में फिट किए जा सकते हैं।

इस लंबी 'घंटी' ने क्यूबिट को करीब 170 बार जांच करने का मौका दिया, जब तक कि आखिरी फोनोन गायब न हो जाए। एक आसान उदाहरण से समझें: यह वैसा ही है जैसे कोई मंदिर की घंटी बजने के बाद भी हर सेकंड ध्यान से सुनता रहे कि आवाज़ आखिर किस पल पूरी तरह गायब हुई, बजाय यह मानने के कि वह धीरे-धीरे बस कम होती चली गई।

सुपरकंडक्टर से जुड़े क्वांटम प्रयोगों पर हमारी एक और स्टोरी क्वांटम इमेजिंग वाली स्टोरी में भी है, जहां सुपरकंडक्टर का इस्तेमाल अलग तरीके से हुआ था।

आगे क्या फायदा: गलती पकड़ने से लेकर सेल के प्रोटीन तक

क्वांटम कंप्यूटिंग में क्वांटम जंप अक्सर एक गलती (error) की तरह गिना जाता है, पर उसे सही समय पर पकड़ना मुश्किल रहा है। हमारी Silicon Quantum Chip वाली स्टोरी में क्यूबिट बढ़ाने की चुनौती पर बात हुई थी; यह नई तकनीक उसी गलती-सुधार (error correction) में मदद कर सकती है।

Stanford Report के अनुसार यह जोड़ी, resonator और क्यूबिट, बेहद बारीक मापन में भी काम आ सकती है — जैसे mass, force, acceleration या strain। Safavi-Naeini की टीम Caltech के साथ मिलकर इसी तरीके से कोशिका (cell) के अंदर प्रोटीन पहचानने पर भी काम कर रही है।

भारत के लिए मतलब: National Quantum Mission और आगे की राह

भारत सरकार ने 2023 में National Quantum Mission को ₹6,003.65 करोड़ के बजट के साथ मंज़ूरी दी थी, जो 2023 से 2031 तक चलेगा। इसके हब IIT गुवाहाटी, IIT दिल्ली, IISc बेंगलुरु, IIT बॉम्बे और TIFR मुंबई में बने हैं।

बेंगलुरु की स्टार्टअप QpiAI ने अप्रैल 2025 में 25-क्यूबिट का QpiAI-Indus कंप्यूटर भी बनाया था। हमें लगता है कि Stanford जैसी sound-आधारित तकनीक भारत के लिए एक सस्ता, कम resource-भारी रास्ता भी खोल सकती है, हालांकि अभी भारत में ऐसा कोई प्रयोग सामने नहीं आया है।

चुनौती भी साफ है: China जैसे देश क्वांटम रिसर्च पर भारत से कहीं ज़्यादा खर्च कर रहे हैं। भारत के लिए मौका यही है कि Stanford जैसे बुनियादी भौतिकी प्रयोगों से सीखकर अपने hub में सस्ते और असरदार तरीके आज़माए जाएं।

किन सवालों के जवाब बाकी हैं

  • यह अभी सिर्फ एक लैब डिवाइस पर, एक ही फोनोन के लिए दिखाया गया है; बड़े क्वांटम सिस्टम में इसे जोड़ना अभी बाकी है।
  • असली गलती-सुधार (error correction) सिस्टम में यह तरीका कैसे और कब जुड़ेगा, इसकी कोई तारीख अभी तय नहीं है।
  • सेल के प्रोटीन नापने वाला Caltech के साथ का काम अभी शुरुआती दौर में है, नतीजे अभी प्रकाशित नहीं हुए।

आवाज़ के क्वांटम जंप से जुड़े सीधे सवाल

क्या यह जंप हम कान से सुन सकते हैं?

नहीं। यह जंप एक सूक्ष्म resonator के भीतर क्वांटम स्तर पर होता है, इंसानी कान या आम उपकरण इसे पकड़ नहीं सकते। इसे पकड़ने के लिए खास सुपरकंडक्टिंग क्यूबिट चाहिए।

क्या इससे तुरंत बेहतर क्वांटम कंप्यूटर बन जाएंगे?

अभी नहीं। यह एक बुनियादी पहला कदम है, जिससे आगे की रिसर्च को दिशा मिलती है, तुरंत कोई तैयार प्रोडक्ट नहीं बनता।

क्या स्मार्टफोन जैसी चीज़ों पर भी असर होगा?

Stanford टीम के अनुसार लंबी अवधि में हां, आवाज़ पर बेहतर नियंत्रण से स्मार्टफोन और दूसरे साउंड-आधारित उपकरण बेहतर बन सकते हैं, पर यह अभी दूर की बात है।

अगली रिसर्च में क्या देखा जाएगा?

टीम इसी तकनीक को क्वांटम एरर करेक्शन और सेल के अंदर प्रोटीन पहचानने वाले सेंसर में आगे बढ़ाना चाहती है, यह अभी जारी काम है।

तो अगली बार जब कोई घंटी बजे और आवाज़ धीरे-धीरे गायब होती लगे, याद रखिए कि क्वांटम स्तर पर वह गायब होना धीरे-धीरे नहीं, बल्कि एक अचानक कूद में होता है। और अब वैज्ञानिकों ने पहली बार इस कूद को सीधे अपनी आंखों के सामने पकड़ लिया है।

स्रोत: Stanford University, Science Journal, ScienceDaily

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