Blood cancer के इलाज में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जिस प्रोटीन पर दवा हमला करती है, वही प्रोटीन कैंसर कोशिकाओं और मरीज की सेहतमंद डोनर स्टेम सेल दोनों पर मौजूद होता है। WashU Medicine के 30-मरीज ट्रायल में वैज्ञानिकों ने CRISPR से डोनर सेल में से वह प्रोटीन — CD33 — पहले ही हटा दिया, ताकि दवा सिर्फ कैंसर कोशिकाओं पर हमला करे।
Nature Medicine में 25 सितंबर 2026 को छपे इस phase 1/2 ट्रायल के नतीजे बताते हैं कि यह तरीका Acute Myeloid Leukemia (AML) और Myelodysplastic Syndrome (MDS) जैसे कठिन blood cancer में CAR-T थेरेपी को ज़्यादा सुरक्षित बना सकता है।
आखिर समस्या क्या थी?
WashU Medicine के अनुसार, CAR-T थेरेपी कई blood cancer में बहुत असरदार रही है, पर Acute Myeloid Leukemia (AML) और Myelodysplastic Syndrome (MDS) में उतनी कारगर नहीं रही। वजह यह है कि AML-MDS कोशिकाओं पर मौजूद कई प्रोटीन सेहतमंद माइलॉइड कोशिकाओं — यानी डोनर स्टेम सेल — पर भी होते हैं।
John F. DiPersio (WashU Medicine) के मुताबिक अगर CAR-T सेल उस साझा प्रोटीन पर हमला करने के लिए बनाई जाए, तो वह सेहतमंद स्टेम सेल को भी साथ में तबाह कर सकती है, जिससे खतरनाक सूजन और इलाज कमजोर पड़ने का खतरा रहता है।
यह नुकसान दोहरा होता है: सेहतमंद कोशिकाएं तबाह होने से मरीज को गंभीर सूजन का खतरा रहता है, और बड़ी तादाद में CAR-T सेल सेहतमंद कोशिकाओं में उलझ जाने से असली कैंसर कोशिकाओं पर हमला कमजोर पड़ जाता है। इसी वजह से AML-MDS में अब तक असरदार CAR-T थेरेपी बनाना मुश्किल रहा है।
कदम 1: डोनर स्टेम सेल से CD33 हटाना
इसे एक वर्दी से समझें: अगर कैंसर कोशिका और सेहतमंद कोशिका दोनों एक जैसी 'वर्दी' (CD33 प्रोटीन) पहने हों, तो उस वर्दी पर निशाना साधने वाला हमला दोनों को मार देगा। ट्रांसप्लांट से पहले वैज्ञानिकों ने CRISPR-Cas9 से डोनर स्टेम सेल की यह 'वर्दी' ही हटा दी।
इस तरह तैयार सेल प्रॉडक्ट को tremtelectogene empogeditemcel (trem-cel) नाम दिया गया, जिसे Vor Biopharma कंपनी ने बनाया और इसी ट्रायल को फंड भी किया। CD33 को इसलिए चुना गया क्योंकि यह सिर्फ खून बनाने वाली कोशिकाओं पर होता है, और जिन लोगों में यह प्रोटीन जन्म से नहीं होता उनमें कोई सेहत संबंधी दिक्कत नहीं देखी गई है।
ट्रांसप्लांट के बाद सिद्धांत यह है कि शरीर में जो कोशिकाएं अब भी CD33 'वर्दी' पहने रहेंगी, वे मुख्यतः बची हुई कैंसर कोशिकाएं ही होंगी। इससे बाद में दी जाने वाली CD33-टारगेटेड दवा सिर्फ कैंसर को निशाना बना पाएगी, डोनर की सेहतमंद कोशिकाओं को छोड़कर।
कदम 2: ट्रांसप्लांट के बाद क्या हुआ?
यह phase 1/2 ट्रायल Siteman Cancer Center समेत अमेरिका-कनाडा के 15 केंद्रों पर हुआ, जिसमें AML या MDS के 30 वयस्क मरीज शामिल थे, जिन्हें दोबारा बीमारी लौटने का ज़्यादा खतरा था। Nature Medicine में छपे नतीजों के अनुसार सभी 30 मरीजों में 28वें दिन तक engraftment हो गया, यानी ट्रांसप्लांट की गई सेल बोन मैरो तक पहुंचकर खून बनाने लगीं।
प्लेटलेट उत्पादन औसतन 16वें दिन तक लौट आया — यह रिकवरी सामान्य स्टेम सेल ट्रांसप्लांट जैसी ही रही।
DiPersio के अनुसार, 'CD33-हटाई गई स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के नतीजे सामान्य ट्रांसप्लांट जैसे ही दिखे' — यानी सिर्फ प्रोटीन हटाने से ट्रांसप्लांट की सामान्य कार्यक्षमता पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा।
कदम 3: CD33-टारगेटेड दवा से टेस्ट
यह जांचने के लिए कि CD33-हटाई गई सेल टारगेटेड दवा झेल सकती हैं या नहीं, 19 मरीजों को gemtuzumab ozogamicin (GO) की खुराक दी गई — यह FDA से मंजूर एक एंटीबॉडी दवा है जो CD33 को पहचानकर सीधे कैंसर-रोधी असर पहुंचाती है।
- अलग-अलग खुराक पर मरीजों का खून-कोशिका स्तर बना रहा
- सामान्य ट्रांसप्लांट के बाद जो भारी गिरावट देखी जाती है, वह यहां नहीं दिखी
- इससे एक सुझाई गई खुराक तय करने में मदद मिली
यह जांच अहम थी क्योंकि gemtuzumab ozogamicin आम तौर पर लिवर को नुकसान और खून-कोशिकाओं में भारी गिरावट जैसे साइड इफेक्ट के लिए जाना जाता है। अगर CD33-हटाई गई डोनर सेल इस दवा से बची रहीं, तो इसका मतलब है कि सुरक्षा-कवच काम कर रहा है।
नतीजे क्या दिखे, क्या सीमाएं रहीं?
साइड इफेक्ट सामान्य ट्रांसप्लांट जैसे ही रहे — खून की कमी, कम प्लेटलेट, बुखार, संक्रमण और graft-versus-host disease। ट्रायल में 7 मरीजों की मौत हुई, जिनमें से 4 कैंसर बढ़ने से और 3 ट्रांसप्लांट से जुड़ी जटिलताओं (किडनी फेल्योर, लिवर टॉक्सिसिटी, सेप्सिस) से हुईं। औसत जीवित रहने की अवधि करीब 14 महीने रही।
यह एक छोटा, बिना तुलनात्मक (control) समूह वाला phase 1/2 ट्रायल है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि यह तरीका मानक ट्रांसप्लांट से बेहतर है — अभी सिर्फ यह दिखा है कि यह उतना ही सुरक्षित है। Vor Biopharma ने ही स्टडी को फंड किया और कुछ सह-लेखक कंपनी के कर्मचारी भी रहे, जो पढ़ते वक्त ध्यान रखने लायक बात है।
भारत पर इसका असर क्या होगा?
भारत के पास पहले से अपनी indigenous CAR-T थेरेपी NexCAR19 है, जिसे IIT Bombay और Tata Memorial Centre ने मिलकर बनाया, और जो CD19-लक्षित है, CD33-लक्षित नहीं। इसकी कीमत अमेरिकी CAR-T थेरेपी के मुकाबले करीब दसवां हिस्सा है।
| पहलू | अमेरिकी CAR-T (आम तौर पर) | भारत का NexCAR19 |
|---|---|---|
| टारगेट | अलग-अलग प्रोटीन (जैसे CD19, CD33) | CD19 |
| अनुमानित लागत | करीब 4 लाख डॉलर | करीब 50,000 डॉलर (₹30-35 लाख) |
| विकासकर्ता | अलग-अलग वैश्विक कंपनियां | IIT Bombay + Tata Memorial Centre |
नई CD33-डिलीटेड ट्रांसप्लांट तकनीक अभी अमेरिका के ट्रायल में है, भारत में इसके लिए CRISPR-आधारित सेल-प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए होगा जो अभी सीमित है। शरीर के अंदर सीधे इलाज पहुंचाने वाली Bengaluru की targeted treatment तकनीक जैसे भारतीय प्रयोग दिखाते हैं कि टारगेटेड थेरेपी पर देश में काम तो चल रहा है, पर यह अभी शुरुआती चरण में है।
आगे तीन चीज़ों पर नज़र रहेगी: यही सेल प्रॉडक्ट CD33-टारगेटेड CAR-T के साथ मिलाकर बड़े ट्रायल में टेस्ट होना, नियामकों से आगे की मंजूरी मिलना, और लंबी अवधि में मरीजों का सर्वाइवल डेटा आना। अभी किसी की तारीख तय नहीं है।
फिलहाल यह नतीजे एक शुरुआती सबूत हैं कि CD33 हटाना सुरक्षित रास्ता हो सकता है, कोई मंजूर इलाज नहीं। यह किसी मरीज के लिए व्यक्तिगत इलाज सलाह नहीं है — असली फैसला हमेशा डॉक्टर की सलाह से ही होना चाहिए।
स्रोत: Nature Medicine, WashU Medicine, ScienceDaily, ImmunoACT/IIT Bombay