26 सितंबर 2026 को बेंगलुरु में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की मौजूदगी में एक ऐलान हुआ। IIT Madras, उसका Research Park और Unicorn India Ventures तीनों मिलकर एक ऐसा फंड बना रहे हैं जो सीधे लैब में पड़ी तकनीक को स्टार्टअप में बदलने के लिए पैसा देगा। यह किसी आम स्टार्टअप फंडिंग की खबर जैसी लग सकती है, पर इसका ढांचा सामान्य वेंचर कैपिटल से काफी अलग है।

क्या हुआ: तीन महीने में ₹450 करोड़ का पहला Close

IITM Unicorn Frontier Fund I को फरवरी 2026 में लॉन्च किया गया था, और SEBI से मंज़ूरी मिलने के ठीक तीन महीने बाद इसने अपना पहला क्लोज़ ₹450 करोड़ (करीब $46.9 मिलियन) पर पूरा किया। कई रिपोर्ट्स के अनुसार यह भारत के डीपटेक फंड इकोसिस्टम में अब तक का सबसे तेज़ पहला क्लोज़ है।

फंड का कुल लक्ष्य ₹1,000 करोड़ (करीब $104.4 मिलियन) है, जिसमें ₹600 करोड़ का मूल कोष और ₹400 करोड़ का ग्रीनशू विकल्प शामिल है। अंतिम क्लोज़ दिसंबर 2026 तक होने की उम्मीद है, और अभी तक का पैसा IIT Madras के पूर्व छात्रों और फैमिली ऑफिसों से आया है।

यह पैसा कहां गया: चार शुरुआती दांव

फंड ने अब तक करीब ₹55 करोड़ चार स्टार्टअप्स में लगाए हैं: Hathor Rocket (स्पेस), Quanstra (क्वांटम तकनीक), Triolt Energy (बैटरी) और Carbelim (कार्बन कैप्चर)। यह दिखाता है कि पहला पैसा किसी एक सेक्टर में नहीं, बल्कि कई अलग डीपटेक क्षेत्रों में बंटा है।

यह ऐलान ऐसे साल में आया है जब भारत के स्पेसटेक स्टार्टअप्स पहले ही रिकॉर्ड फंडिंग जुटा चुके हैं, यानी डीपटेक में पैसा आना कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि एक बड़े ट्रेंड का हिस्सा है।

Unicorn India Ventures के प्रबंध भागीदार के अनुसार फंड आमतौर पर अपने कुल कोष का 20% हिस्सा पहले चेक के तौर पर लगाता है, और बाकी पैसा उन्हीं कंपनियों में आगे के दौर के लिए बचाकर रखता है जो शुरुआती नतीजे दिखाती हैं। यानी 25 में से जो कंपनियां आगे बढ़ेंगी, उन्हें दोबारा बड़ा निवेश मिल सकता है।

आम VC फंड और Deep-Tech Patient Capital में फर्क

ज़्यादातर स्टार्टअप निवेशक ऐसी कंपनी ढूंढते हैं जिसका प्रोडक्ट पहले से बाज़ार में बिक रहा हो। IITM Unicorn Frontier Fund इसका उल्टा करता है: यह टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल यानी TRL 3-4 पर निवेश करता है, यानी वह चरण जहां तकनीक लैब में साबित तो हो चुकी है, पर अभी प्रोडक्ट के तौर पर बाज़ार में नहीं उतरी।

पहलूआम Early-Stage VCIITM Frontier Fund
निवेश का चरणबाज़ार में मौजूद या तैयार प्रोडक्टTRL 3-4, लैब में साबित तकनीक
चेक साइज़अलग-अलग, अक्सर छोटा शुरुआती दौर₹15-25 करोड़ प्रति स्टार्टअप
धैर्य (होल्ड पीरियड)आमतौर पर 4-7 साललंबा, हार्डवेयर-आधारित रिसर्च के हिसाब से
फोकस क्षेत्रज़्यादातर सॉफ्टवेयर, कंज्यूमररक्षा, स्पेस, सेमीकंडक्टर, क्वांटम, हेल्थटेक

IIT Madras के डायरेक्टर प्रो. कामकोटि वीज़िनाथन के अनुसार संस्थान ने ऐसा इकोसिस्टम बनाया है जो लगातार ऊंचे TRL वाली डीपटेक कंपनियां तैयार कर सकता है, और अब उन्हें ऐसी पूंजी चाहिए जो जल्दी रिटर्न की जल्दी में न हो।

Unicorn India Ventures का सफर: पहले फंड से यहां तक

Unicorn India Ventures के लिए यह कोई पहला फंड नहीं है। कंपनी के अपने आंकड़ों के अनुसार उसने ₹100 करोड़ के पहले फंड से 17 कंपनियों में निवेश किया था, जिनमें SmartCoin और Sequretek शामिल हैं। दूसरे फंड का आकार ₹300 करोड़ था और उससे 20 कंपनियों को पैसा मिला।

यानी हर फंड के साथ आकार करीब तीन गुना बढ़ता गया, और अब IIT Madras के साथ मिलकर यह पहली बार सीधे हार्डवेयर-भारी डीपटेक की तरफ बड़ा कदम है, जिसमें VIHAAN जैसी स्वदेशी चिप परियोजनाओं जैसे सेमीकंडक्टर क्षेत्र भी शामिल हैं।

कंपनी ने इसके अलावा एक ₹1,200 करोड़ का तीसरा फंड भी बनाया है जो सामान्य शुरुआती दौर के स्टार्टअप्स में लगता है। यानी अब Unicorn India Ventures के पास एक साथ दो तरह के फंड हैं, एक आम टेक स्टार्टअप्स के लिए और दूसरा सिर्फ हार्डवेयर-भारी डीपटेक के लिए, जो निवेश की रणनीति को साफ तौर पर बांटता है।

TRL 3-4 का मतलब: लैब से बाज़ार तक की दूरी

  • TRL 1-2: सिर्फ वैज्ञानिक सिद्धांत और शुरुआती कॉन्सेप्ट।
  • TRL 3-4: लैब में तकनीक का प्रोटोटाइप या प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट साबित, पर असली परिस्थितियों में परीक्षण बाकी।
  • TRL 7-9: असली माहौल में परीक्षण पूरा, उत्पादन और बिक्री के लिए तैयार।

फंड जिस स्तर पर पैसा लगा रहा है, वह ठीक वही जगह है जहां ज़्यादातर भारतीय डीपटेक आइडिया पैसे की कमी से अटक जाते हैं, क्योंकि यह चरण न तो शुद्ध रिसर्च ग्रांट के लायक माना जाता है, न आम VC के जोखिम के दायरे में आता है।

हमारा अंदाज़ा है कि यही वजह है कि भारत में कई अच्छे रिसर्च आइडिया कागज़ पर ही रह जाते हैं, क्योंकि सरकार की रिसर्च ग्रांट प्रोटोटाइप के बाद रुक जाती है, और निजी निवेशक बिना बिके प्रोडक्ट वाली कंपनी में पैसा लगाने से हिचकते हैं। ठीक इसी खाई को पाटने के लिए इस तरह के 'पेशेंट कैपिटल' फंड की ज़रूरत बताई जा रही है।

भारत के लिए मतलब, अनजान बातें और आगे क्या

भारत के लिए इसका मतलब है कि IIT जैसे संस्थानों की रिसर्च अब सिर्फ पेपर या पेटेंट पर नहीं रुकेगी, बल्कि सीधे कंपनी बनने तक जा सकती है, बशर्ते इस तरह के फंड टिके रहें और ऐसे कई और संस्थान इस मॉडल को दोहराएं।

अभी यह साफ नहीं है कि Hathor Rocket, Quanstra, Triolt Energy और Carbelim जैसी कंपनियां TRL 3-4 से आगे बढ़कर असली ग्राहक और राजस्व तक पहुंच पाएंगी या नहीं। यह कहानी सिर्फ पैसा मिलने से पूरी नहीं होती, अगले 2-3 साल में ही साफ होगा।

आगे तीन चीज़ों पर नज़र रखनी होगी: दिसंबर 2026 तक ₹1,000 करोड़ का अंतिम क्लोज़ पूरा होता है या नहीं, फंड अपने वादे के 25 स्टार्टअप्स तक कैसे पहुंचता है, और इनमें से कोई कंपनी अगले फंडिंग राउंड या असली ऑर्डर तक कब पहुंचती है।

यह भी देखना दिलचस्प होगा कि क्या इंस्टीट्यूशनल निवेशक और बैंक, जो अभी तक इस फंड से नहीं जुड़े हैं, अंतिम क्लोज़ तक जुड़ते हैं या नहीं। अगर बड़े संस्थागत निवेशक भी इस मॉडल पर भरोसा करते हैं, तो यह सिर्फ एक फंड की कहानी नहीं, बल्कि भारत में डीपटेक निवेश के तरीके में बदलाव का संकेत होगा।

₹450 करोड़ जुटना एक शुरुआत भर है। असली परीक्षा तब होगी जब इनमें से कोई प्रयोगशाला का आइडिया किसी फैक्ट्री या मैदान तक पहुंचेगा।

स्रोत: Inc42, Business Standard, YourStory, dtNext

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