ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि ग्लेशियर सिर्फ ध्रुवों या हिमालय-आल्प्स जैसे ठंडे, ऊंचे पहाड़ों में ही होते हैं। पर भूमध्य रेखा से सिर्फ करीब 450 किलोमीटर दूर, इंडोनेशिया के पापुआ में भी हज़ारों साल पुरानी 'शाश्वत बर्फ' थी। अब वह लगभग खत्म हो चुकी है। BBC की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक पुंचक जया की बर्फ 2000 के दशक की शुरुआत से 2025 तक करीब 95% तक सिकुड़ चुकी है, और अगले एक-दो साल में पूरी तरह गायब हो सकती है।
भूमध्य रेखा के पास बर्फ आखिर टिकी कैसे रहती है?
जवाब है ऊंचाई। पुंचक जया की चोटी समुद्र तल से 4,884 मीटर ऊंची है, यह पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे ऊंची चोटी है। इतनी ऊंचाई पर हवा इतनी ठंडी हो जाती है कि भूमध्य रेखा के पास होने के बावजूद बर्फ जम सकती है और सदियों तक टिक भी सकती है।
इसी वजह से चेक ग्लेशियर वैज्ञानिक मैरी शाबात्स्का इसे दुनिया की सबसे अनोखी बर्फ बताती हैं, यह एंडीज़ और हिमालय के बीच बची आखिरी उष्णकटिबंधीय (tropical) बर्फ है, बाकी किसी भी ग्लेशियर तंत्र से हज़ारों किलोमीटर दूर। एक सदी पहले तक पापुआ के सुदिरमान पर्वत शृंखला की चार प्रमुख चोटियों पर साल भर बर्फ रहती थी, यह शृंखला करीब 300 किलोमीटर लंबी है। आज सिर्फ पुंचक जया के आसपास कुछ छोटे टुकड़े बचे हैं, बाकी तीन चोटियां पूरी तरह नंगी हो चुकी हैं।
ग्लेशियर बनता कैसे है, और पिघलता कैसे है?
इसे एक बैंक खाते की तरह समझें। हर साल बर्फबारी से खाते में 'जमा' होता है, और गर्मी व धूप से बर्फ पिघलकर 'निकासी' होती है। जब तक जमा, निकासी से ज़्यादा या बराबर रहे, ग्लेशियर बना रहता है, भले ही हर साल थोड़ा ऊपर-नीचे होता रहे।
पुंचक जया में अब यह हिसाब बुरी तरह बिगड़ चुका है। El Niño जैसी घटनाओं के दौरान इलाका ज़्यादा सूखा और गर्म हो जाता है, ऊंचाई पर बर्फबारी कम होती है और पिघलना ज़्यादा। यानी जमा लगातार घट रहा है और निकासी बढ़ रही है, ठीक उस खाते जैसा जिसमें सिर्फ पैसे निकल रहे हों, नई जमा राशि आ ही नहीं रही।
2026 में जो सुपर अल-नीनो बनता दिख रहा है, वह इस हिसाब को और बिगाड़ सकता है, क्योंकि इसमें सूखे और गर्म मौसम की अवधि लंबी खिंचने का अनुमान है। पापुआ जैसी जगह के लिए, जहां बर्फ की मात्रा पहले से ही बेहद कम बची है, हर बड़ा El Niño एक-एक दिन अहम बना देता है।
कोलंबिया क्लाइमेट स्कूल की रिपोर्ट के अनुसार पुंचक जया अब तक अपनी छह में से चार बर्फ की परतें (glaciers) पूरी तरह खो चुका है। बचे हुए हिस्से भी अलग-थलग टुकड़ों में बंट गए हैं, जो जुड़े हुए एक बड़े ग्लेशियर से कहीं ज़्यादा तेज़ी से पिघलते हैं, क्योंकि छोटे टुकड़ों के किनारे ज़्यादा धूप और गर्म हवा के संपर्क में आते हैं।
यह हिसाब कब से बिगड़ने लगा?
19वीं सदी में पुंचक जया के आसपास करीब 1,900 हेक्टेयर इलाके में बर्फ फैली थी। डेनिश शोधकर्ता क्लाउस थाइमन के मुताबिक 2000 के दशक की शुरुआत से 2025 तक ग्लेशियर वाला इलाका 95% तक सिकुड़ चुका है।
| समय | बर्फ का इलाका | स्थिति |
|---|---|---|
| 19वीं सदी (करीब 1850) | लगभग 1,900 हेक्टेयर | चार प्रमुख चोटियों पर स्थायी बर्फ |
| 2000 के दशक की शुरुआत | पहले से काफी घट चुकी | सिर्फ पुंचक जया के आसपास ही बर्फ बची |
| 2025 (अब) | करीब 16 हेक्टेयर | अगले 1-2 साल में पूरी तरह गायब होने का अनुमान |
यानी करीब सवा सौ साल में बर्फ का इलाका अपने मूल आकार के 1% से भी कम रह गया है। बर्फ के अंदर जमी परतें सैकड़ों साल पुरानी हवा और मौसम का रिकॉर्ड रखती हैं, जिसे वैज्ञानिक 'ice core' कहते हैं, और यही रिकॉर्ड अब हमेशा के लिए खो सकता है।
भारत के लिए इसका मतलब क्या है?
पुंचक जया की बर्फ में जमी परतें पश्चिमी प्रशांत महासागर के गर्म पूल (Western Pacific Warm Pool) से जुड़े पुराने मौसम पैटर्न का रिकॉर्ड रखती हैं, यही तंत्र दक्षिण एशिया के मॉनसून चक्र को भी प्रभावित करता रहा है। वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि इन नमूनों से मॉनसून के पुराने उतार-चढ़ाव को समझा जा सकेगा, जो भारत जैसे मॉनसून पर निर्भर देश के लिए काम की जानकारी होती।
भारत के अपने हिमालय के ग्लेशियर भी इसी तरह जमा-निकासी के गड़बड़ाते हिसाब से जूझ रहे हैं, बस पैमाना बहुत बड़ा है और रफ्तार अभी उतनी तेज़ नहीं। पुंचक जया की कहानी दिखाती है कि यह हिसाब कितनी तेज़ी से बिगड़ सकता है अगर गर्मी और सूखा साथ आ जाएं, और इसलिए भारत में हिमालय की निगरानी को लेकर बार-बार यह चेतावनी दोहराई जाती है।
अभी वैज्ञानिकों को क्या नहीं पता?
- बर्फ ठीक कब पूरी तरह गायब होगी, यह अनुमान (एक-दो साल) है, पक्की तारीख नहीं
- El Niño का असर कितना तेज़ करेगा, यह अभी साफ माप में नहीं आया
- बचे ice core नमूनों से मॉनसून इतिहास का कितना हिस्सा निकाला जा सकेगा, यह ड्रिलिंग टीम की रफ्तार पर निर्भर
- क्या दुनिया में कोई और उष्णकटिबंधीय पर्वत ऐसी ही तेज़ी से बर्फ खो रहा है, इसका पूरा तुलनात्मक डेटा अभी नहीं है
आगे क्या देखें?
इंडोनेशिया की मौसम एजेंसी BMKG अपनी निगरानी रिपोर्ट में यह अपडेट करती रहेगी कि बर्फ का बचा हिस्सा कितनी तेज़ी से घट रहा है। क्लाउस थाइमन की ड्रोन और 3D मैपिंग टीम भी आने वाले महीनों में और डेटा जारी कर सकती है, जिससे बर्फ के आखिरी टुकड़ों का सटीक नक्शा मिलेगा।
यह दुनिया भर में बर्फ के पिघलने के पैटर्न को समझने की बड़ी कोशिश का हिस्सा है। आर्कटिक में भी बर्फ पिघलने के मौसम पर ऐसी ही बारीक निगरानी चल रही है, बस वहां कहानी अभी ठहराव की है, यहां पापुआ में कहानी पूरी तरह खत्म होने की तरफ बढ़ रही है। अगर इंडोनेशिया अपनी बर्फ पूरी तरह खो देता है, तो वह वेनेज़ुएला और स्लोवेनिया जैसे उन गिने-चुने देशों में शामिल हो जाएगा जिन्होंने अपने सारे ग्लेशियर गंवा दिए हैं।
पुंचक जया की बर्फ हज़ारों साल जीवित रही, पर इंसानी गतिविधियों से गर्म हुई धरती को झेलने में बस कुछ दशक लगे। पापुआ के मूल निवासियों के लिए यह सिर्फ बर्फ का खत्म होना नहीं, एक पवित्र पहाड़ के हमेशा के लिए बदल जाने जैसा भी है।
स्रोत: BBC Indonesia, Seasia.co, Columbia Climate School, BMKG