क्या कोई सैटेलाइट बादलों, धुएं और अंधेरे के आर-पार देखकर भी किसी दूरदराज ज्वालामुखी को महीनों तक लगातार ट्रैक कर सकता है? भारत और अमेरिका के साझा मिशन NISAR ने अब इसका सीधा जवाब दिया है, रूस के एक 500 साल से सोए ज्वालामुखी की पूरी टाइम-लैप्स वीडियो के जरिए।

Krasheninnikov ज्वालामुखी: 500 साल की चुप्पी अचानक कैसे टूटी

30 जुलाई 2025 को रूस के कमचटका प्रायद्वीप के पास समुद्र में 8.8 तीव्रता का बड़ा भूकंप आया। NASA के अनुसार इसी भूकंप ने जैसे पास के Krasheninnikov ज्वालामुखी जोड़े को झकझोर दिया। कुछ दिन बाद इसका उत्तरी ज्वालामुखी करीब 500 साल में पहली बार फटा, यानी आखिरी बार यह करीब सन 1550 के आसपास सक्रिय हुआ था।

तभी से यह ज्वालामुखी लगातार पूर्व दिशा में पिघली चट्टान और मलबे की एक धारा उगल रहा है। इतने लंबे समय बाद जागा कोई ज्वालामुखी वैज्ञानिकों के लिए दुर्लभ मौका होता है, क्योंकि इसका कोई हालिया रिकॉर्ड डेटा मौजूद नहीं था।

पहले: दूरदराज ज्वालामुखियों की निगरानी कितनी मुश्किल थी

कमचटका में दर्जनों ज्वालामुखी हैं, लेकिन ज्यादातर बार-बार फटने वाले ज्वालामुखियों पर ही जमीनी उपकरण लगे हैं। Krasheninnikov जैसा शांत ज्वालामुखी इस निगरानी से बाहर रहा, क्योंकि यह इलाका दूरदराज है और यहां अक्सर बादल छाए रहते हैं या लंबी ध्रुवीय रातें होती हैं।

आम ऑप्टिकल सैटेलाइट तस्वीरें बादलों के पार नहीं देख पातीं, इसलिए ऐसी जगहों पर लगातार निगरानी लगभग नामुमकिन रही है। किसी दूरस्थ ज्वालामुखी के जागने का पता अक्सर तभी चलता था जब स्थानीय लोग धुआं या राख देखते, यानी घटना शुरू होने के काफी बाद।

अब: NISAR हर 12 दिन में दो बार वहां वापस क्यों जाता है

NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar यानी NISAR सैटेलाइट पृथ्वी से करीब 747 किलोमीटर ऊपर चक्कर लगाता है। इसने 25 दिसंबर 2025 को Krasheninnikov की पहली तस्वीर ली, ठीक उसी समय जब सैटेलाइट अपने लॉन्च के बाद के आखिरी टेस्ट पूरे कर रहा था।

इसके बाद से यह हर 12 दिन में दो बार, एक बार दक्षिण से उत्तर और एक बार उत्तर से दक्षिण जाते हुए, ठीक उसी जगह की रडार तस्वीर लेता रहा है। इसे ऐसे समझें: यह वैसा ही है जैसे कोई डॉक्टर मरीज का हर 12 दिन में एक ही एंगल से एक्स-रे ले और धीरे-धीरे हो रहे बदलाव को ट्रैक करे।

कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के भूभौतिकीविद और NISAR साइंस टीम के सदस्य मैथ्यू प्रिचर्ड के अनुसार यही निरंतरता सबसे अहम बात है, क्योंकि इससे प्राकृतिक खतरों की करीबी निगरानी का भरोसा मिलता है।

17 तस्वीरों से बनी टाइम-लैप्स में क्या दिखा

शोधकर्ताओं ने दिसंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच की 17 रडार तस्वीरें जोड़कर एक टाइम-लैप्स वीडियो बनाई। इसमें लावा पहले एक छोटे भीतरी कैल्डेरा को भरता दिखता है, फिर एक बड़े गड्ढे में बहता है, और आखिर में पूरब की तरफ पंखे जैसी शक्ल में फैल जाता है।

वीडियो में उत्तर-पश्चिम की तरफ एक दूसरी लावा धारा भी दिखती है, जो शायद NISAR की पहली तस्वीर से भी पहले बन चुकी थी। हर 12 दिन का यह अंतराल इतना छोटा है कि लावा के धीरे-धीरे फैलने का लगभग हर बड़ा चरण तस्वीरों में कैद हो गया, जो पहले किसी दूरदराज ज्वालामुखी के लिए मुमकिन नहीं था।

बिंदुपहले (परंपरागत निगरानी)अब (NISAR)
बादल/अंधेरे में निगरानीअक्सर मुमकिन नहींमाइक्रोवेव रडार से मुमकिन
दोहरावअनियमितहर 12 दिन में दो बार
पिक्सल रिजॉल्यूशनअक्सर मोटा अनुमानकरीब 10x10 मीटर

रडार तस्वीर में लावा चमकीला क्यों दिखता है

NISAR माइक्रोवेव सिग्नल भेजकर सतह से टकराई हुई गूंज को मापता है। पिघली चट्टान बर्फ या बंजर जमीन के मुकाबले इन माइक्रोवेव को ज्यादा तेज लौटाती है, इसलिए तस्वीरों में लावा हमेशा अपने आसपास से चमकीला दिखता है।

इसी वजह से रडार तस्वीरों में इंसान की आंख के बिना भी लावा की सीमा साफ पहचानी जा सकती है, और यह मौसम या दिन-रात पर निर्भर भी नहीं करता।

भारत पर इसका असर

NISAR कोई अकेला अमेरिकी मिशन नहीं, बल्कि ISRO और NASA का साझा रडार मिशन है। हमारा आकलन है कि Krasheninnikov जैसी दूर की घटना ट्रैक करने की यही क्षमता भारत के अपने भूकंप-प्रवण हिमालयी इलाकों और भूस्खलन-संभावित क्षेत्रों में भी उतनी ही काम आ सकती है, जहां बादल और दुर्गम भूगोल अक्सर निगरानी में रुकावट बनते हैं।

यह मिशन भारत के अपने EOS-05 जैसे इमेजिंग सैटेलाइट से इस मायने में अलग है कि EOS-05 मुख्यतः ऑप्टिकल-थर्मल इमेजिंग करता है, जबकि NISAR रडार के जरिए बादलों के आर-पार भी देख सकता है, दोनों मिलकर आपदा निगरानी की एक पूरी तस्वीर बनाते हैं।

भारत में मानसून के महीनों में अक्सर बादल छाए रहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कमचटका में सर्दियों में लंबी अंधेरी रातें होती हैं। ऐसे में NISAR जैसी रडार तकनीक भारतीय भूस्खलन और बाढ़ जैसी घटनाओं की निगरानी में भी उतनी ही उपयोगी साबित हो सकती है, जितनी यह रूस के दूरदराज ज्वालामुखी के लिए साबित हुई।

अभी क्या पता नहीं है और आगे क्या देखना है

यह अभी साफ नहीं है कि Krasheninnikov का यह विस्फोट कब तक जारी रहेगा, या यह आगे चलकर कमजोर पड़ेगा या तेज होगा। वैज्ञानिकों के पास इस ज्वालामुखी का लंबा ऐतिहासिक डेटा भी नहीं है, क्योंकि यह करीब 500 साल से शांत था, इसलिए इसके व्यवहार का अंदाजा लगाना अभी भी मुश्किल है।

  • NISAR के अगले 12-दिन के चक्रों में लावा प्रवाह कैसे बदलता है
  • क्या यह ज्वालामुखी आने वाले महीनों में और तेज हो सकता है
  • क्या इसी तकनीक से भारत के अपने संवेदनशील इलाकों की नियमित निगरानी शुरू होती है

Krasheninnikov की कहानी बताती है कि 500 साल पुरानी चुप्पी को समझने के लिए अब हमें सैकड़ों साल इंतजार नहीं करना पड़ता, बस हर 12 दिन में लौटता एक रडार सैटेलाइट काफी है।

स्रोत: NASA, JPL, Phys.org, Daily Galaxy, Newsbeep

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