बेंगलुरु की GalaxEye को 24 सितंबर 2026 को RDI Fund से ₹63.84 करोड़ की मदद का समझौता मिला है, ताकि वह OptoSAR तकनीक वाला स्वदेशी सैटेलाइट बना सके। मानसून के दिनों में किसी शहर के ऊपर से गुज़रता ऑप्टिकल सैटेलाइट अक्सर सिर्फ सफेद बादल देख पाता है। नीचे बाढ़ हो या सड़क पर काफिला, तस्वीर में कुछ नहीं दिखता। यही खाली जगह भरने की कोशिश है यह प्रोजेक्ट।

OptoSAR क्या है, और बादलों के बीच यह क्यों काम आता है?

OptoSAR दो तरह की इमेजिंग को जोड़ता है: सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल (EO) कैमरा। Inc42 के अनुसार ऑप्टिकल तस्वीर बादलों और रोशनी से बिगड़ सकती है, जबकि SAR बादलों के आर-पार और बिना दिन की रोशनी के भी तस्वीर ले सकता है। दोनों को मिलाकर हर मौसम में साफ तस्वीर का लक्ष्य है।

प्रोजेक्ट का निशाना 0.5 मीटर से बेहतर रेज़ोल्यूशन है, यानी तस्वीर में ज़मीन का आधे मीटर से भी छोटा हिस्सा एक बिंदु के रूप में दिखेगा। GKToday के अनुसार इस सैटेलाइट का इस्तेमाल बड़े इलाके की निगरानी, इंसान और गाड़ी की पहचान और टारगेट वर्गीकरण में सोचा गया है।

₹63.84 करोड़ किस रूप में मिले, और पूरा प्रोजेक्ट कितने का है?

APAC Media के अनुसार विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत आने वाले Technology Development Board (TDB) ने गुरुवार, 24 सितंबर को GalaxEye के साथ समझौते पर दस्तखत किए। मदद optionally convertible debentures (OCD) के रूप में है, यानी ऐसा कर्ज़ जिसे तय शर्तों पर शेयर में बदलने का विकल्प रहता है।

मदआंकड़ा
प्रोजेक्ट की कुल स्वीकृत लागत₹247.69 करोड़
TDB की मदद (RDI Fund, OCD के रूप में)₹63.84 करोड़
कुल लागत में इस मदद का हिस्साकरीब 25.8%
बाकी रकमकरीब ₹184 करोड़
लक्ष्य रेज़ोल्यूशन0.5 मीटर से बेहतर

यानी सरकारी पैसा पूरी लागत का एक-चौथाई के आसपास है (63.84 ÷ 247.69)। बाकी रकम कहां से आएगी, इसका ब्योरा अब तक की रिपोर्टों में नहीं है।

TRL 6 से TRL 9 का मतलब क्या है?

Technology Readiness Level यानी TRL, तकनीक की परिपक्वता का 1 से 9 तक का पैमाना है। TRL 6 पर प्रोटोटाइप किसी असली जैसे माहौल में दिखाया जा चुका होता है, और TRL 9 पर पूरा सिस्टम असली संचालन में साबित हो जाता है। Inc42 के अनुसार यह प्रोजेक्ट इसी पूरे सफर को कवर करेगा।

तुलना के लिए, IIT Madras और Unicorn India Ventures का नया फंड TRL 3-4 पर पैसा लगाता है, यानी लैब वाले शुरुआती चरण पर। GalaxEye का पैसा उससे कई सीढ़ियां आगे, प्रोटोटाइप से असली तैनाती के बीच लगेगा।

RDI Fund से और किन्हें मदद मिली है?

Newzchain की रिपोर्ट के अनुसार जुलाई 2025 में मंज़ूर ₹1 लाख करोड़ के RDI Fund के तहत TDB अब तक 22 प्रोजेक्ट मंज़ूर कर चुका है। इनकी कुल लागत ₹4,744 करोड़ है और RDI मदद ₹2,192 करोड़। मई में Dhruva Space को इसी योजना से ₹105 करोड़ मिले थे, एक मानकीकृत सैटेलाइट प्लेटफॉर्म के लिए।

निजी वेंचर पूंजी के साथ यह सरकारी पैसा अब स्पेसटेक की फंडिंग की दूसरी परत बनता दिख रहा है। फर्क यह है कि यहां पैसा उस चरण पर आता है जहां प्रोटोटाइप बन चुका है और असली तैनाती बाकी है।

भारत पर इसका असर क्या होगा?

यह हमें लगता है कि बादल भारत जैसे मानसून वाले देश में निगरानी और आपदा प्रबंधन की सबसे पुरानी रुकावटों में से एक हैं। हर मौसम में काम करने वाला घरेलू सैटेलाइट इन कामों के लिए विदेशी डेटा पर निर्भरता घटा सकता है। SiliconIndia के अनुसार GalaxEye के ग्राहक क्षेत्र ये हैं:

  • रक्षा और सीमा निगरानी
  • खेती और फसल आकलन
  • इंफ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
  • बाढ़ जैसी आपदाओं का प्रबंधन

TDB के सचिव राजेश कुमार पाठक के अनुसार यह समझौता स्वदेशी क्षमता बनाने और उसे व्यावसायिक रूप देने की उनकी कोशिश का हिस्सा है। असली कसौटी तब होगी जब सैटेलाइट कक्षा में पहुंचकर वही तस्वीरें दे, जो कागज़ पर तय हुई हैं।

अभी क्या पता नहीं है, और आगे क्या देखें?

अभी तीन बातें साफ नहीं हैं: बाकी करीब ₹184 करोड़ का स्रोत, इस सैटेलाइट के लॉन्च की तारीख, और अंतरिक्ष में मिलने वाला असली रेज़ोल्यूशन। 0.5 मीटर से बेहतर का आंकड़ा अभी लक्ष्य है, नतीजा नहीं।

आगे इन चीज़ों पर नज़र रखिए: GalaxEye की तरफ से लॉन्च कार्यक्रम की घोषणा, कंपनी का अगला फंडिंग राउंड, और RDI Fund के तहत TDB के नए मंज़ूर प्रोजेक्ट। तारीखें अभी तय नहीं बताई गई हैं।

₹63.84 करोड़ का चेक एक शुरुआत है, मंज़िल नहीं। बादलों के पार देखने वाला भारतीय सैटेलाइट कक्षा में पहुंचेगा या नहीं, यह अगले कुछ साल के इंजीनियरिंग नतीजे बताएंगे।

स्रोत: Inc42, APAC Media, UNI, SiliconIndia, Newzchain

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