फ़्यूज़न रिएक्टर को बस ज़्यादा गर्म और घना कर देने से 'जलने' की स्थिति नहीं मिल जाती। Princeton Plasma Physics Laboratory (PPPL) के सैद्धांतिक मॉडल के अनुसार दीवार से आया दस हज़ार में एक हिस्सा tungsten भी फ़्यूज़न इग्निशन के लिए ज़रूरी दबाव को करीब दोगुना कर सकता है। यह शोध Physical Review Letters में 10 सितंबर 2026 को छपा।

अक्टूबर में यह खबर 'शॉर्टकट' की सुर्खियों के साथ फिर घूम रही है। नीचे क्रम है: क्या हुआ, क्यों हुआ और आगे क्या, और बीच में भारत के ITER-IPR काम से मिलान।

क्या हुआ: 70 साल पुराने नियम में चार नई शर्तें

PPPL की विज्ञप्ति (5 अक्टूबर 2026) के अनुसार Luis Delgado-Aparicio, Masayuki Ono और Jonathan Menard ने 1950 के दशक के Lawson मापदंड को नए सिरे से लिखा। यह मापदंड परखता है कि प्लाज़्मा इतना गर्म, इतना घना और इतनी देर तक है या नहीं कि बाहरी गर्मी बंद करने पर भी जलता रहे। इस अवस्था को इग्निशन (ignition) कहते हैं।

प्लाज़्मा के एक और रूप की झलक चांद की सतह के पास प्लाज़्मा में भी है। वहां चांद की सतह पर प्लाज़्मा को सीधे नापा गया था।

पुराना सूत्र 'आदर्श', यानी शुद्ध ईंधन वाला प्लाज़्मा मानता था। टीम ने चार असली बातें जोड़ीं: हीलियम की राख, दीवार से आई हल्की और भारी अशुद्धियां, इलेक्ट्रॉनों का synchrotron विकिरण और प्लाज़्मा से बाहर बहती गर्मी। शोध-पत्र का नाम 'Generalized Lawson-Cordey-Mills Accessibility of Fusion Ignition' है।

सबसे ज़्यादा चर्चा क्रम की है। विज्ञप्ति के अनुसार कई कंपनियां पहले घनत्व बढ़ाकर फिर गर्मी देने की योजना बनाती हैं, पर PPPL की गणना में पहले गर्म करना और फिर घनत्व बढ़ाना कम ऊर्जा वाला रास्ता निकला। शुद्ध प्लाज़्मा में यह रास्ता Cordey saddle नाम के बिंदु से गुज़रता है, जहां फ़्यूज़न से मिली शक्ति डाली गई गर्मी का करीब पांच गुना होती है।

क्यों हुआ: एक लाख कणों में सिर्फ़ 10 tungsten

दस हज़ार में एक यानी 0.01%। सीधी गणना करें तो एक लाख कणों में सिर्फ़ 10 tungsten के। PPPL के अनुसार एक दर्जन से ज़्यादा अगली पीढ़ी की फ़्यूज़न मशीनों ने अंदरूनी दीवार के लिए tungsten चुना है, क्योंकि यह धातु सूर्य के केंद्र से ज़्यादा तापमान झेल सकती है। यानी दीवार की सबसे मज़बूत धातु ही प्लाज़्मा में पहुंचकर मुश्किल बन सकती है।

Daily Beirut की रिपोर्ट के अनुसार tungsten का परमाणु-क्रमांक ऊंचा है, इसलिए थोड़ी-सी मात्रा भी विकिरण के रूप में काफ़ी ऊर्जा बहा देती है। रोज़ की भाषा में: नल की धार धीमी हो और बाल्टी में छोटा छेद हो तो पानी भरना कठिन हो जाता है। यहां अशुद्धि छेद है और बाहरी गर्मी नल की धार। यह उदाहरण हमारा है।

PPPL के अनुसार यह गणना दो आयामों में है। तीन आयामों में जाने पर इग्निशन के लिए ज़रूरी दबाव इतना बढ़ सकता है कि प्लाज़्मा स्थिर ही न रहे। यानी 'दोगुना' अंतिम आंकड़ा नहीं, एक शुरुआती संकेत है।

समाधान के संकेत और एक अनपेक्षित सुरक्षा

विज्ञप्ति के अनुसार शोध-पत्र दीवार पर तरल लिथियम की परत को एक रास्ता बताता है। यह tungsten को प्लाज़्मा में जाने से रोक सकती है और गर्मी भी बेहतर रोकती है। PPPL यह तरीका कई साल से परख रहा है। दूसरा सुझाव स्पिन-ध्रुवित (spin-polarized) ईंधन का है, जिसमें नाभिक पहले एक दिशा में सजाए जाते हैं और फ़्यूज़न की दर बढ़ती है।

एक अनपेक्षित नतीजा भी है। फ़्यूज़न डिज़ाइनर 'थर्मल रनअवे' से डरते रहे हैं, जिसमें फ़्यूज़न की गर्मी और फ़्यूज़न बढ़ाती है। विज्ञप्ति के अनुसार जो नुकसान इग्निशन को कठिन बनाते हैं, वही इस चक्र को पीछे भी धकेलते हैं, और मिलकर जलते प्लाज़्मा को स्थिर रख सकते हैं।

विज्ञप्ति यह भी कहती है कि फ़िशन संयंत्र के उलट फ़्यूज़न सिस्टम में एक बार में सिर्फ़ सेकंड-भर का ईंधन होता है। इसलिए नियंत्रण खोने पर प्लाज़्मा ठंडा होकर बुझ जाता है, कुछ बदतर नहीं होता।

भारत के लिए क्या मायने

शोध में किसी भारतीय मशीन या संस्था का ज़िक्र नहीं है। हमें ऐसा कोई स्रोत भी नहीं मिला जिसमें यह मॉडल भारतीय टोकामाक पर परखा गया हो। फिर भी भारत इस दौड़ से बाहर नहीं है।

Nuclear Engineering International के अनुसार ITER के निर्माण-काम का करीब 9% भारत के हिस्से है। IPR की साइट के अनुसार ITER का क्रायोस्टैट भारत का योगदान है, जिसे L&T हज़ीरा ने 54 टुकड़ों के रूप में बनाया। बड़े अंतरराष्ट्रीय उपकरणों में भारत की भागीदारी की एक और मिसाल CERN के LHC और भारत का पुराना नाता में हमने देखी थी।

हमारा आकलन है कि ऐसे सैद्धांतिक नतीजों का भारत के लिए असली काम ITER-India और IPR की डिज़ाइन-जांच में है, जैसे दीवार की धातु चुनते समय अशुद्धि की सीमा पहले तय करना। यह हमारी राय है, शोध का निष्कर्ष नहीं।

जो अभी पता नहीं

सबसे ज़रूरी बात यह है कि पूरा नतीजा कागज़ पर है, मशीन पर नहीं। कुछ और खुले सवाल:

  • PPPL के अनुसार आज कोई प्रयोग उन तापमानों तक नहीं पहुंचता जहां Cordey pass बैठता है, इसलिए यह गणना मापन से नहीं जांची जा सकी।
  • 'दोगुना' का आंकड़ा दो आयामों का है, और तीन आयामों में स्थिरता की सीमा टूटने का संकेत मिलता है।
  • लिथियम की दीवार और स्पिन-ध्रुवित ईंधन के फ़ायदे इसी शोध में सुझाए गए हैं, मशीन पर साबित नहीं हुए।
  • ZME Science ने 20 अक्टूबर 2026 को इसे 'शॉर्टकट' कहकर छापा। PPPL की विज्ञप्ति इसे सबसे कम ऊर्जा वाला रास्ता बताती है, और वही विज्ञप्ति tungsten से बढ़ती कठिनाई भी गिनाती है। 'शॉर्टकट' शब्द उन सीमाओं को ढक देता है।
  • विज्ञप्ति के अनुसार लिथियम की दीवार पर PPPL खुद सालों से काम कर रहा है, इसलिए स्वतंत्र समूहों के दोहराव का इंतज़ार रहेगा।

आगे क्या देखें

  • PPPL के अनुसार टीम 'हीट-फ़र्स्ट' रास्ते को परखने के लिए डिजिटल प्रयोग करेगी।
  • तीन आयामों में यही गणना और उससे निकली स्थिरता की सीमा।
  • दूसरी प्रयोगशालाओं या कंपनियों से इस मॉडल की स्वतंत्र जांच। अभी इसकी घोषणा नहीं मिली।

फ़िलहाल खबर इतनी है: फ़्यूज़न का सबसे पुराना सूत्र अब असली मशीन की गड़बड़ियों के साथ दोबारा लिखा गया है, और एक छोटी-सी अशुद्धि का असर उसमें बड़ा दिखा। 'शॉर्टकट' शब्द इस शोध पर पूरा नहीं बैठता। इसे नक्शे की तरह पढ़ना बेहतर है, जिसमें रास्ता और खड्डे दोनों दर्ज हैं।

स्रोत: Physical Review Letters, Princeton Plasma Physics Laboratory (EurekAlert), ZME Science, Daily Beirut, IPR, Nuclear Engineering International